भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c14.62
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c14.62
- Language
- Hindi
c14.62
१२६४) के सूंधा नामक पहाड़ के लेख१ और मेवाड़ के गुहिलवंशी रावल समरसिंह के समय के चीरवा गांव से मिले हुए वि. सं. १३३० (ई. स. १२७३) के लेख२ से तय्यार किया गया है. ओरिआ गांव के लेख में ‘ध’ के सिर नहीं है परंतु ‘ध’ को ‘व’ से स्पष्ट रूप से भिन्न बतलाने के लिये व के ऊपर बाईं ओर ॱ ऐसी लकीर जोड़ दी है. यह रूप पिछले नागरी के लेखों तथा पुस्तकों में मिल आता है. सूंधा के लेख की लिपि जैन है. उसके ‘लु’, ‘ठ’ आदि अक्षरों को अब तक जैन लेखक वैसा ही लिखते हैं. ‘णण’ को, ‘ण’ लिखके बीच में आड़ी लकीर लगा कर बनाया है. यह रूप कई लेखों में मिलता है और अब तक कई पुस्तकलेखक उसको ऐसा ही लिखते हैं. चीरवा के लेख में ‘ग्ग’ को ‘ग्र’ का सा लिखा है और अन्य लेखों में भी उसका ऐसा रूप मिलता है, जिसको कोई कोई विद्वान् ‘ग्र’ पढ़ते भी हैं; परंतु उक्त लेख का लेखक बहुत शुद्ध लिखनेवाला था अत एव उसने भूल से सर्वत्र ‘ग्ग’ को ‘ग्र’ लिख दिया हो यह संभव नहीं. उसने उस समय का ‘ग्ग’ का प्रचलित रूप ही लिखा है जिसका नीचे का अंश प्राचीन ‘ग’ का ही कुछ विकृत रूप है, जैसे कोई कोई लेखक वर्तमान नागरी के ‘क्त’ और ‘क्र’ को ‘क्त’ और ‘क्र’ लिखते हैं जिनमें वर्तमान ‘क’ नहीं किंतु उसका प्राचीन रूप ही लिखा जाता है.