भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c15.9
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c15.9
- Language
- Hindi
c15.9
७ देखो, लिपिपत्र २८ वां. कांगड़ा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) नामक शिवमंदिर में जालंधर (कांगड़े) के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि; जि. ४, पृ. १८०-८२; प्लेट ४२). फिर डॉ. वूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऍ. इं; जि. १, पृ. १०४-७; ११२-५) और पहिली का संवत् [लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान लिया (वू; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६=लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( ई. ऍ; जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऍ. चं. स्टे; पृ. ४३-४). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस ( रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के आधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४ ). ऐसी दशा में भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.