भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c15: ९—शारदा (कशमीरी) लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c15
- Language
- Hindi
९—शारदा (कशमीरी) लिपि
c15.1
ई. स. की १० वीं शताब्दी के आसपास से (लिपिपत्र २८ से ३१).
c15.2
२ चीरवा गांव के मंदिर की भीत में लगे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
c15.3
३ ये मूल पंक्तियां उपर्युक्त ओरिआ गांव के लेख से हैं.
c15.4
शारदालिपि पंजाब के अधिकतर हिस्से और कश्मीर में प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों४ तथा हस्तलिखित पुस्तकों में मिलती है. यह लिपि नागरी की नांई कुटिल लिपि से निकली है. ई. स. की ८ वीं शताब्दी के मेरुवर्मा के लेखों५ से पाया जाता है कि उस समय तक तो उधर कुटिल लिपि का ही प्रचार था, जिसके पीछे के स्वाइम् (सइ) गांव से मिली हुई भगवती की मूर्ति के आसन पर खुदे हुए सोमट के पुत्र राजानक भोगट के लेख६ की लिपि भी शारदा की अपेक्षा कुटिल से अधिक मिलती हुई है. शारदालिपि का सब से पहिला लेख सराहां की प्रशस्ति७ है जिसकी लिपि ई. स. की १०वीं शताब्दी के आसपास की है. यही समय शारदा लिपि की उत्पत्ति का माना जा सकता है.
c15.5
१ जोधपुर निवासी मेरे विद्वान् मित्र मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.
c15.6
४ कश्मीर के उत्पलवंशी राजाओं के सिक्कों में.
c15.7
५ देखो, लिपिपत्र २२ वां.
c15.8
६ फो; ऐं. चं. स्टे; पृ. १५२, प्लेट १३.
c15.9
७ देखो, लिपिपत्र २८ वां. कांगड़ा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) नामक शिवमंदिर में जालंधर (कांगड़े) के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि; जि. ४, पृ. १८०-८२; प्लेट ४२). फिर डॉ. वूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऍ. इं; जि. १, पृ. १०४-७; ११२-५) और पहिली का संवत् [लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान लिया (वू; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६=लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( ई. ऍ; जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऍ. चं. स्टे; पृ. ४३-४). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस ( रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के आधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४ ). ऐसी दशा में भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.
c15.10
पहिले शारदालिपि के लेख बहुत ही कम प्रसिद्धि में आये थे और ई. स. १८०४ तक तो एक भी लेख की प्रतिकृति प्रसिद्ध नहीं हुई थी, परंतु सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. फोजल ने ई. स. १८११ में बड़े श्रम के साथ चंबा राज्य के शिलालेख और दानपत्रों का बड़ा संग्रह कर 'ऍटिक्विटीज़ ऑफ़ चंबा स्टेट' नामक अपूर्व ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें प्राचीन लिपियों के अभ्यासियों के लिये शारदा लिपि की अमूल्य सामग्री है.
c15.11
लिपिपत्र २८ वां.
c15.12
यह लिपिपत्र सराहां की प्रशस्ति१ से तैयार किया गया है. इसमें 'ए' के लिये ए की सिर के स्थान की आड़ी लकीर की बाईं ओर [Figure:] चिह्न और जोड़ा है जो वास्तव में 'ए' की मात्रा का एक प्रकार का चिह्न है और कुटिल तथा नागरी लिपि के लेखों में ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं में भी कभी कभी मिलता२ है. पीछे से यही चिह्न लंबा होकर खड़ी लकीर३ के रूप में परिणत होगया (देखो, लिपिपत्र ३१ में बहादुरसिंह के दानपत्र का 'ए'). वर्तमान शारदा 'ए' में इस खड़ी लकीर के अतिरिक्त 'ए' के ऊपर भी नागरी की 'ए' की मात्रा सी मात्रा और लगाई जाती है (देखो, लिपिपत्र ७७). 'द' के मध्य में ग्रंथि लगाई है. 'श' और 'स' में इतना ही भेद है कि पहिले का सिर पूरे अक्षर पर है और दूसरे का दो अंशो में विभक्त है. 'त्' तथा 'म्' में मूल अक्षरों के चिह्न स्पष्ट नहीं रहे. 'ओ' की मात्रा का चिह्न कहीं [Figure:] भी है (देखो, 'यो'), 'औ' की मात्रा कहीं उक्त चिह्न के अतिरिक्त व्यंजन के सिर के अंत में [Figure:] चिह्न और जोड़ कर बनाई है (देखो, 'मौ') और रेफ पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लगाया है.
c15.13
१ फो; ऍ. चं. स्टे; प्लेट १५.
c15.14
३ यही खड़ी लकीर नागरी में 'पर्ह्रीमात्रा' (पृष्ठमात्रा) होकर ए, ऐ, ओ और औ की मात्रावाले व्यंजनों के पूर्व कभी कभी लगने लगी और बंगला, मैथिल तथा उड़िया लिपियों में दाहिनी तरफ़ नीचे गांठवाली वक्र रेखा के रूप में उसका अब तक प्रयोग होता है (देखो, लिपिपत्र ७८ और ७६ में उक्त लिपियों की वर्णमालाओं में के, कै, को और कौ).
c15.15
लिपिपत्र २८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c15.16
२ देखो, लिपिपत्र १८वें की मूल पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति में 'विधत्ते' का 'ते', उसी पंक्ति में 'शत्रुसैन्यं' का 'सै', और उसी लिपिपत्र में 'प्रो' और 'श्रौ'.
c15.17
किष्किन्ध्याकाधीपकुले प्रसूता सोमप्रभा नाम बभूव तस्य ।
देवी जगद्भूषणभूतमूर्तिस्त्रिलोचनस्येव गिरीशपुत्री ॥ अपूर्व-
मिन्दुम्प्रविधाय वेधास्सदा स्फुरत्कान्तिकलङ्कमुक्त... संपूर्णविम्बं (बिम्बं)
c15.18
वदंन यदीयैमभूत्तराङ्कएककिताङ्गयष्टिः ॥ नानाविधालङ्कृतिसंन्नि-
वेशविशेषरम्य| गुणशालिनी या । मनोहरत्वं सुतरा मवाप स-
चेतसां सत्कविभारतौव ॥ शृङ्गारसिन्द्यो× कि॑मियन्नु वेला किं वा
मनोभूरुहमञ्जरी स्यात् वसन्तराजस्य नु राज्यलक्ष्मीस्त्रैलोक्यसौन्दर्य-
c15.19
लिपिपत्र २६ वां.
c15.20
यह लिपिपत्र राजा विदग्ध के सुंगल गांव के दानपत्र१ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ङ' विलक्षण है, कहीं कहीं 'प' और 'म' में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' तथा 'ब' में भेद नहीं है, 'ए' की मात्रा तीन प्रकार से लगी है जिनमें से एक आड़ी लकीर है (देखो, 'णे' ) और 'र्थ', 'थै', 'स्था' और 'स्थि' में 'थ' का रूप विकृत मिलता है.
c15.21
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
c15.22
ओं स्वस्ति ॥२ श्रीचम्प(म्पा)कावासकात्परमभट्टारकमहाराजाधिराज-
परमेश्वरश्रीमद्युगाकरवर्मदेवपादानुध्यात[:] परमब्र(ह्म)ह्मण्यो निर्खि-
लसच्छासनाभिप्रवृत्तगुरुवृत्तदेवताभुरुत्तसमाधिगतशास्रकुशल-
तया समाराधितविद्वज्जनहृदयो नथानुगतपौरुषप्रयोगो-
वाप्तत्रिवर्गसिद्धिः सम्यगर्जिताभिकामिकगुणसहिततया फ-
लित इव मार्गतरु[:] । सर्वसत्वा(त्त्वा)श्रयनौ(णौ)यो मोषनाम्नाय३
आदित्यवड्शो(वंशो)द्भव[:] परममाहेश्वरो(रः) श्रीभोगमतीदेव्या(व्यां) समुत्पन्न[:]
c15.23
लिपिपत्र ३० वां.
c15.24
३ शुद्ध पाठ ‘मोषणान्वयः’ होना चाहिये.
c15.25
यह लिपिपत्र सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र४, चंबा से मिले हुए सोमवर्मा और आसट के दानपत्र५, राजानक नागपाल के देवीरीकोठी (देब्रिकोटी) के शिलालेख६, आरिगांव के शिलालेख७ तथा जालंधर के राजा जयच्चंद्र के समय की शक संवत् ११२६८=लौकिक संवत् ८० (ई. स. १२०४) की कांगडा ज़िले के कीरग्राम के वैजनाथ (बैद्यनाथ) के मंदिर की दो प्रशस्तियों८ से तय्यार किया गया है और इसमें मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. कुलैत के दानपत्र में 'च' के बाईं तरफ़ के अंश के नीचे के भाग में गांठ सी लगाई है और 'ढ' की खड़ी लकीर के मध्य में ग्रंथि बनाकर उसके और 'फ' के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है. वैजनाथ की प्रशस्तियों के 'ई' को, उक्त अक्षर के प्राचीन रूप में खड़ी
c15.26
१ फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट १७ से.
c15.27
२ इन तीन लकीरों में से पहिली की आकृति ) ऐसी है और दूसरी व तीसरी खड़ी लकीरें हैं जिनमें स एक अनावश्यक है.
c15.28
४ फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट २५ से.
c15.29
५ फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट २४ से.
c15.30
६ फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट ३० से.
c15.31
७ ऍ. इं; जि. ६, पृ. ३०१ के पास के प्लेट से.
c15.32
८ इन प्रशस्तियों के समय के लिये देखो ऊपर पृ. ७३ टिप्पणी ७.
c15.33
९ बु; इं. पे; प्लेट ५, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति प्रथम से.
c15.34
लकीर के दोनों पार्श्व में लगनेवाली बिंदियों को उक्त लकीर के परिवर्तित रूप के ऊपर लगा कर, बनाया है और उसीसे वर्तमान शारदा का ‘ई’ बना है. ‘ते’ और ‘थै’ में ‘ए’ और ‘ऐ’ की मात्राएं क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें व्यंजन के ऊपर लगा कर बनाई हैं. टाकरी लिपि में ‘ए’ और ‘ऐ’ की मात्राएं अब तक ऐसी ही लगाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७७).
c15.35
ओं नमश्शिवाय ॥ जयति भुवनकारणं स्वयंभुज्जयति पुर-
न्दरनन्दनो सुरारि: [|] जयति गिरिसुता निरुद्धदेहो ⸫ रितभयाप-
हरो हरश्च देवः ॥ श्री चम्प (म्य) कावास कात्यर मन्त्रछ्याग्यो लला-
टतट घटित विकटभ्रुकुटिप्र कटकुटि (टि) त कट कसौम टिकङ्कत साना-
c15.36
लिपिपत्र ३१ वां.
c15.37
यह लिपिपत्र कुलू के राजा बहादुरसिंह के दानपत्र२, अथर्ववेद३ (पिप्पलादशाखा) और शाकुन्तल नाटक४ की हस्तलिखित पुस्तकों से तय्यार किया गया है. अथर्ववेद की पुस्तक के अक्षरों का ‘इ’ प्राचीन ‘इ’ के [Figure:] इस रूप को नीचे के अंश से प्रारंभ कर चलती कलम से पूरा लिखने से ही ऐसा बना है. उसीसे वर्तमान शारदा का ‘इ’ बना है. शाकुंतल नाटक से उद्धृत किये हुए अक्षरों में से अधिकतर अर्थात् अ, आँ, ई, ऊ, ऋ, ओ, औ, क, ख, घ, च, छ, झ, ञ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, म, य, र, श, ष, स और ह अक्षर वर्तमान कश्मीरी से मिलते जुलते ही हैं (उक्त अक्षरों को लिपिपत्र ७० में दी हुई वर्तमान शारदालिपि से मिला कर देखो).
c15.38
२ आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, प्लेट ७१ से.
c15.39
४ बु; इं. पे; प्लेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ६ से.
c15.40
लिपिपत्र ३१ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
c15.41
१ ये मूल पंक्तियां राजा सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र से हैं.
c15.42
३ हार्वर्ड ओरियंटल सिरीज में छपे हुए अथर्ववेद के अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ दी हुई उक्त पुस्तक के एक पत्रे की प्रतिकृति से.
c15.43
५ ये मूल पंक्तियां कुलू के राजा बहादुरसिंह के दान पत्र से हैं.
c15.44
ओं स्वस्ति ॥ रामरामरामपराक्रमपराक्रमणदक्षदक्षजा-
कांतनतांतचरणशरणकृतांतः करशरणविशारद शारदहि-
मकरानुकारियशःपूरपूरितदिगंतरपरमभट्टारकमहाराजाधिरा-
जश्रीमद्बहादुरसिंहदेवपादाः ॥ ॥ महाश्रीयुवराजप्रतापसिं-
हः महामंत्रिवर नारायणसिंहः ॥ श्री चंपकपुरस्थ महाप॑-
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