भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c16: १०—बंगला लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c16
- Language
- Hindi
१०—बंगला लिपि
c16.1
ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आस पास से (लिबिपत्र ३२ से ३५).
c16.2
बंगला लिपि भारतवर्ष के पूर्वी विभाग अर्थात् मगध की तरफ़ की नागरी लिपि से निकली है और बिहार, बंगाल, मिथिला, नैपाल, आसाम तथा उड़ीसा से मिलनेवाले कितने एक शिलालेख, दानपत्र, सिक्कों या हस्तलिखित पुस्तकों में पाई जाती है. बंगाल के राजा नारायणपाल के समय, अर्थात् ई. स. की दसवीं शताब्दी तक तो उधर भी नागरी लिपि का ही प्रचार रहा. उक्त राजा के लेखों में केवल 'ए'१, 'ख'२ आदि कुछ अक्षरों में बंगला की ओर झुकाव नज़र आता है. ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पालवंशी राजा विजयपाल के देवपारा के लेख३ में ए, ख, ञ, त, म, र, ल और स में नागरी से थोड़ी सी भिन्नता है और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र४, आसाम से मिले हुए वल्लभेंद्र के दानपत्र५ और हन्नाकोल के लेख६ की लिपियों में से प्रत्येक को नागरी (लिबिपत्र २४-२७) से मिलाया जावे तो अ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ, ख, घ, झ, ञ, ट, थ, प, फ, र, श और ष में अंतर पाया जाता है. इस प्रकार लेखनशैली में क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी.
c16.3
१ देखो लिपिपत्र ३२.
c16.4
४ ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२ और ३५३ के बीच के ४ प्लेट.
c16.5
५ ऍ. इं; जि. २, पृ. १८४ और १८५ के बीच के २ प्लेट.
c16.6
६ ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १६०८, पृ. ४६२.
c16.7
लिपिपत्र ३२ वां.
c16.8
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा नारायणपाल के समय के बदाल के स्तंभ के लेख७ और विजयसेन के देवपारा के लेख८ से तय्यार किया गया है. बदाल के लेख से तो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये गये हैं. उनमें 'अ' और 'आ' की प्रारंभ की छोटीसी खड़ी लकीर न लगने से उनके रूप नागरी के 'ञ' से बन गये हैं. संभव है कि यह भिन्नता दानपत्र खोदनेवाले की ग़लती से हुई हो. देवपारा के लेख में अवग्रह की आकृति वर्तमान नागरी के 'इ' सी है, विसर्ग के ऊपर भी सिर की आड़ी लकीर लगाई है, 'प' तथा 'य' में विशेष अंतर नहीं है और 'व' और 'ब' में कोई भेद नहीं है.
c16.9
७ ऍ. इं; जि. २, पृ. १६१ के सामने का प्लेट.
c16.10
८ ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
c16.11
लिपिपत्र ३२वें की मूल पंक्तियों९ का नागरी अक्षरांतर—
c16.12
२ मेमॉयर्स ऑफ़ एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द ५, प्लेट २४ की अंतिम पंक्ति में 'वैशाख्यां' का 'ख'.
c16.13
३ ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
c16.14
९ ये मूल पंक्तियां देवपारा के लेख से हैं.
c16.15
तस्मिन् सेनान्ववाये प्रतिसुभटशतोत्सादनाद्व्र(ब्र)ह्मवादौ
स ब्र(ब्र)ह्मक्षत्रियाणांमजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे-
नः। यज्जीयन्ते यदीयाः स्खलदुदधिजलोल्लोलश्री-
तेषु सेतोः कच्चान्तेष्वप्सरोभिर्मृशमनन्यस्पर्शया
युद्धगाथाः ॥ यस्मिन् सङ्गरचत्वरे पटुरटत्तूर्येप-
c16.16
लिपिपत्र ३३ वां.
c16.17
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पंडिघी के दानपत्र१ से और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. उन दोनों में ‘इ’ और ‘ई’ में विशेष अंतर नहीं है. वैद्यदेव के दानपत्र का ‘ऐ’, ‘ए’ से नहीं, किंतु ‘इ’ में कुछ परिवर्तन करके बनाया है, अनुस्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है और उसके नीचे हलंत की सी तिरछी लकीर और लगाई है, ‘ऊ’ और ‘ऋ’ की मात्राओं में स्पष्ट अंतर नहीं है, ‘व’ और ‘ब’ में भेद नहीं है और सिर सीधी लकीर से नहीं किंतु ⦚ ऐसी लकीर से बनाये हैं, जिसका अधिक विकास उड़िया लिपि के सिरों में पाया जाता है.
c16.18
१ ऍ. इं.; जि. १२, पृ. ८ और ६ के बीच के सेटों से.
c16.19
२ ऍ. इं.; जि. २, पृ. ३५० और ३५३ के बीच के ५ सेटों से.
c16.20
लिपिपत्र ३३ वें की मूल पंक्तियों३ का नागरी अक्षरांतर—
c16.21
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ स्वस्ति ॥ अम्बर(म्बर)-
मानस्तम्भः कुम्भः संसारवौ(बौ)जरक्षायाः । हरिदन्तरमि-
तमूर्त्तिः क्रीडापोचो हरिज्ज(र्ज्ज)यति ॥ एतस्य दक्षिणदृशो
वंशे मिहिरस्य जातवान्(न्) पूर्व्वं(र्व्वं) ॥ विग्रहपालो नृप-
तिः सब्बा(र्ब्बा)कारद्धि(र्द्धि)संंसिद्धः ॥ यस्य वंशक्रमेणाभूत्सचि-
c16.22
लिपिपत्र ३४ वां.
c16.23
यह लिपिपत्र आसाम से मिले हुए वल्लभेंद्र के दानपत्र४ और हस्तलिखित पुस्तकों५ से तय्यार किया गया है. वल्लभेंद्र के दानपत्र में कहीं कहीं ‘न’ और ‘ल’ में, एवं ‘प’ और ‘य’ में, स्पष्ट अंतर नहीं है और ‘व’ तथा ‘ब’ में भेद नहीं है. विसर्ग की दोनों बिंदियों को चलती कलम से लिख कर एक दूसरे से मिला दिया है,
c16.24
लिपिपत्र ३४ वें की मूल पंक्तियों६ का नागरी अक्षरांतर—
c16.25
४ ऍ. इं.; जि. ५, पृ. १८२ और १८५ के बीच के ४ सेटों से.
c16.26
६ ये मूल पंक्तियां बल्लभेंद्र के दानपत्र से हैं.
c16.27
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ यज्गडमण्डैैैैलत-
टोपकटालिमालो वण्णावलीव खदले खलु मङ्क-
लस्य । लम्बो(म्बो)दरः स जगतां यशसां प्रसारमान-
न्दतां चुमखिना सह यावदिन्दुः ॥ पातालपल्वेल-
तलादिवमुत्पतिष्णोर्ब्बिष्णोः पुनातु कृतघृष्टितनोस्तनु-
c16.28
लिपिपत्र ३५ वां.
c16.29
३ ये मूल पंक्तियां वैद्यदेव के उपर्युक्त दानपत्र से हैं.
c16.30
५ बु; ई. पे; सेट ६, प्राचीन अक्षरों, की पंक्ति १०-११ से.
c16.31
यह लिपिपत्र हन्नाकोल से मिले हुए बौद्ध तांत्रिक शिलालेख७ तथा उड़ीसा के राजा पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र८ से तय्यार किया गया है. हन्नाकोल के लेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाये हैं, जिनके अनुस्वार निकाल कर यहां अक्षर ही दिये हैं. पुरुषोत्तमदेव के
c16.32
७ ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८०८, पृ. ४६२ से.
c16.33
८ इं. ऍ; जि. १, पृ. ३५४ के पास के सेट से.
c16.34
दानपत्र के अक्षरों में से अधिकतर के सिर ⌒ ऐसे हैं जिनकी उत्पत्ति वैद्यदेव के उपर्युक्त दानपत्र के अक्षरों के सिरों से हुई हो. वर्तमान उड़िया लिपि के अक्षरों के सिर पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र के सिरों से अधिक घुमाववाले हैं और उनका अंतिम भाग अधिक नीचा होता है परंतु वे सिरे उक्त दानपत्र के अक्षरों के सिरों ही के विकसित रूप हैं.
c16.35
लिपिपत्र ३५ वें की मूल पंक्तियों१ का अक्षरांतर—
c16.36
श्री जय दुर्गायै नमः । वीर श्रीगजपति
गउडेश्वर नवकोटिकर्नाटककलवर्गेश्वर
श्रीपुरुषोत्तमदेव महाराजाङ्कर । पोते-
श्वरभटङ्कु दान शासन पटा । ए ५
अङ्क मेष दि १० अं सोमवार ग्रहण-