भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c17.15
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c17.15
- Language
- Hindi
c17.15
ओर मुड़ कर नीचे को झुकी हुई रहती है ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५७ ) और अ, आ, ई, क, ञ और र अक्षरों की खड़ी लकीरों तथा बहुधा उ, ऊ और ऋ की मात्राओं के नीचे के अंश बाईं तरफ मुड़ कर घुमाव के साथ ऊपर की ओर बढ़े हुए रहते हैं ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५८ ). यही ऊपर की ओर बढ़ा हुआ अंश समय के साथ और ऊपर बढ़ कर सिर तक भी पहुंचने लगा जिससे तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथ लिपियों में अ, आ, ई, क, झ और र की आकृतियां मूल अक्षरों से बिलकुल विलक्षण हो गईं. इसके अतिरिक्त दक्षिण के लेखक अपने अक्षरों में सुंदरता लाने के विचार से खड़ी और आड़ी लकीरों को वक्र या ख़मदार बनाने लगे जिससे ऊपर की सीधी आड़ी लकीर की आकृति बहुधा [Figure:], नीचे की सीधी आड़ी लकीर की [Figure:] और सीधी खड़ी लकीर की आकृति { ऐसी बनने लगी तथा इन लकीरों के प्रारंभ, मध्य या अंत में कहीं कहीं ग्रंथियां भी बनाई जाने लगी. इन्हीं कारणों, तथा कितने एक अक्षरों को चलती कलम से पूरा लिखने, से दक्षिण की लिपियों के वर्तमान अक्षर उनके मूल ब्राह्मी अक्षरों से बहुत ही विलक्षण बन गये.