भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c17: ११—पश्चिमी लिपि
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c17
- Language
- Hindi
११—पश्चिमी लिपि
c17.1
१ ये मूल पंक्तियां पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र से हैं.
c17.2
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ३६ से ४०).
c17.3
पश्चिमी लिपि का प्रचार गुजरात, काठियावाड़, नासिक, खानदेश तथा सतारा ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के कुछ अंशों और कोंकण आदि में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक रहा (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आसपास इसका कुछ कुछ प्रचार राजपूताना, मध्यभारत और मध्यप्रदेश में भी पाया जाता है (देखो, ऊपर पृ. ६०, टिप्पण २, ३, ४). यह लिपि गुप्तों२, वलभी के राजाओं३, भड़ौच के गुर्जरवंशियों४, बादामी और गुजरात के चालुक्यों५, त्रैकूटकों६, राष्ट्रकूटों७, गुजरात के कलचुरियों८ आदि९ राजवंशों के कितने एक शिलालेखों या दानपत्रों में तथा साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उत्तरी शैली की लिपियों के पड़ोस की लिपि होने से इसपर उनका प्रभाव पड़ा है.
c17.4
३ ऍ. इं; जि. ३, पृ. ३२०-२. जि. ८, पृ. १६०-६६. जि. ११, पृ. ८१-४; १०६-१७; १७८-८०. आ. स. इं; ई. स. १६०२-३, पृ. २३५-८. फ्ली; गु. इं; लेख संख्या ३८-३६.
c17.5
४ इं. ऍ; जि ७, पृ. ६६-८६. जि. ८, पृ. ३०१-३. जि. ६, पृ. २३८-६; आदि.
c17.6
७ ऍ. इं; जि. ३, पृ. ५१-२. इं. ऍ; जि. ७, पृ. १६३-४. जि. ८, पृ. ४५-६. जि. ६, पृ. १२४. जि. १६, पृ. ३०४-१०. ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १-३; आदि.
c17.7
दक्षिणी शैली की लिपियों में घ, प, फ, ष और स उनके पुराने रूपों के अनुसार ऊपर से खुले हुए होते हैं (देखो, लिपिपत्र २६-५८); ‘ल’ की खड़ी लकीर बहुधा ऊपर की तरफ़ से बाईं
c17.8
२ सी; गु. इं; लेख संख्या ५, १४, १८.
c17.9
५ ऍ. इं; जि. २ पृ. २०-२१. जि. ५, पृ. ३६-४१.
c17.10
६ इं. ऍ; जि. ४, पृ. ११३-४; जि. १५, पृ. ७७-६; आदि.
c17.11
८ ऍ. इं; जि. १० पृ. ५३. जि. ११, पृ. २२०-१. ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. ३४७. केव टेंपल्स ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८; आदि.
c17.12
६ ऍ. इं; जि. ३, पृ. ५४-७. जि. ८, पृ. १६५-६. इं. ऍ; जि. १२, पृ. १५८-६२. ज. बंब. ए. सो; जि. १६, पृ. १०६-११०; आदि.
c17.13
८ ऍ. इं; जि. ६, पृ. २६७-६. जि. १०, पृ. ७४-७५; आदि.
c17.14
६ ऍ. इं; जि. ११, पृ. १७-८.
c17.15
ओर मुड़ कर नीचे को झुकी हुई रहती है ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५७ ) और अ, आ, ई, क, ञ और र अक्षरों की खड़ी लकीरों तथा बहुधा उ, ऊ और ऋ की मात्राओं के नीचे के अंश बाईं तरफ मुड़ कर घुमाव के साथ ऊपर की ओर बढ़े हुए रहते हैं ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५८ ). यही ऊपर की ओर बढ़ा हुआ अंश समय के साथ और ऊपर बढ़ कर सिर तक भी पहुंचने लगा जिससे तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथ लिपियों में अ, आ, ई, क, झ और र की आकृतियां मूल अक्षरों से बिलकुल विलक्षण हो गईं. इसके अतिरिक्त दक्षिण के लेखक अपने अक्षरों में सुंदरता लाने के विचार से खड़ी और आड़ी लकीरों को वक्र या ख़मदार बनाने लगे जिससे ऊपर की सीधी आड़ी लकीर की आकृति बहुधा [Figure:], नीचे की सीधी आड़ी लकीर की [Figure:] और सीधी खड़ी लकीर की आकृति { ऐसी बनने लगी तथा इन लकीरों के प्रारंभ, मध्य या अंत में कहीं कहीं ग्रंथियां भी बनाई जाने लगी. इन्हीं कारणों, तथा कितने एक अक्षरों को चलती कलम से पूरा लिखने, से दक्षिण की लिपियों के वर्तमान अक्षर उनके मूल ब्राह्मी अक्षरों से बहुत ही विलक्षण बन गये.
c17.16
लिपिपत्र ३६ वां.
c17.17
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा नरवर्मन्१ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ४६१ ( ई. स. ४०४ ) और वहीं से मिले हुए कुमारगुप्त२ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ५२६ ( ई. स. ४७२ ) के लेखों से तय्यार किया गया है. नरवर्मन् के समय के लेख में ‘य’ प्राचीन और नवीन ( नागरी का सा ) दोनों तरह का मिलता है. दक्षिणी शैली के अन्य लेखों में ‘य’ का दूसरा ( नागरी का सा ) रूप केवल संयुक्ताक्षर में, जहां ‘य’ दूसरा अक्षर होता है, प्रयुक्त होता है परंतु यह लेख उत्तरी भारत का है, इसलिए इसमें वैसे रूप का भी केवल ‘य’ के स्थान में प्रयोग हुआ है. ‘रु’ का दूसरा रूप ‘उ’ की मात्रा सहित ‘र’ को चलती कलम से लिखने से बना है, शुद्ध रीति से लिखा हुआ रूप तो पहिला ही है. ‘इ’ में दो बिंदियों के ऊपर की सीधी आड़ी लकीर को वक्र रेखा बना दिया है.
c17.18
लिपिपत्र ३६ वें की मूल पंक्तियों३ का नागरी अक्षरांतर—
c17.19
सिद्धम् सहस्रशिरसे तस्मै पुरुषायामितात्मने च-
तुस्समुद्रपर्य्यङ्कतोयनिद्रालवे नमः श्रीर्म्मालवगणाम्नाते
प्रशस्ते कृतसंज्ञिते एकषष्ठ्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्ट-
य(ये) प्रावृट्(ट्का)ले शुभे प्राप्ते मनस्तुष्टिकरे नृणाम् मघे(घे)
˙प्रवृत्ते शक्रस्य कृष्णास्यानुमते तदा निष्पन्नन्नौहियवसा
c17.20
लिपिपत्र ३७ वां.
c17.21
यह दानपत्र वलभी के राजा ध्रुवसेन४ के गुप्त सं. २१० ( ई. स. ५३६ ) के और धरसेन५ ( दूसरे ) के गुप्त सं. २५२ ( ई. स. ५७१ ) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. धरसेन ( दूसरे ) के दानपत्र में अनुस्वार और विसर्ग की बिंदियों के स्थान में आड़ी लकीरें बनाई
c17.22
१ मेरे विद्वान् मित्र देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
c17.23
२ फ्ली; गु. इं; प्लेट ११ से.
c17.24
३ ये मूल पंक्तियां नरवर्मन् के मंदसोर के लेख से हैं.
c17.25
४ पॅ. इं; जि. ११, पृ. ११० के पास के सेट से.
c17.26
५ इं. ऐं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के सेटों से.
c17.27
हैं ( देखो ‘णां’ और ‘दृः’ ) और हलंत अक्षर को उसके पहिले अक्षर के नीचे लिखा है ( देखो ‘पत्’ ‘शत्’ और ‘सेत्’ ).
c17.28
लिपिपत्र ३७वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—
c17.29
स्वस्ति वलभि(भौ)तः प्रसभप्रणतामित्राणां मैत्रकाणामतु-
लबलसपत्नमण्डलाभोगसंसक्तप्रहारशतलब्धप्रतापः
प्रतापः२ प्रतापोपनतदानमानाज़्र्व्वोपार्जितानुरागोऽनुरक्तमौ-
लभृतमित्रश्रेणीबलावाप्तराज्यश्रियः(श्रीः) परमम(मा)हेश्वरः श्रि(श्री)सेना-
पतिभटार्कस्तस्य सुतस्तत्पादरजोरुणावनतपविचि(त्री)कृतशिराः
c17.30
लिपिपत्र ३८ वां.
c17.31
यह लिपिपत्र पालीताना से मिले हुए गारुलक सिंहादित्य के गुप्त सं. २५५ ( ई. स. ५७४ ) के दानपत्र३ और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के गुप्त सं. ४०३ ( ई. स. ७२२ ) के दान-पत्र४ से तय्यार किया गया है. शीलादित्य के दानपत्र में ‘इ’ के चार टुकड़े किये हैं, जिनमें से नीचे की दो रेखाएं तो दो बिंदियों के स्थानापन्न हैं और ऊपर की दो तिरछी रेखाएं, सीधी आड़ी लकीर के खमदार रूप के ही हिस्से हैं जो जुड़े हुए होने चाहिये थे. ‘ए’ का रूप विलक्षण बना है परंतु वह लिपिपल ३७वें में दिये हुए ‘ए’ का त्वरा से लिखा हुआ विकृत रूप ही है. ‘ऐ’ में ऊपर की खमदार आड़ी रेखा का खम के पूर्व का हिस्सा ‘ए’ के अग्रभाग की बाईं ओर जुड़नेवाली रेखा का गोलाईदार रूप ही है और बाकी का भाग ‘ए’ का है. ‘ल्ल’ में ऊपर का आधा भाग ‘ल’ (दूसरे) का रूप है और नीचे का आधा भाग ‘ल’ (तीसरे) का कुछ विकृत रूप है. इस तरह दो प्रकार के ‘ल’ मिलकर यह रूप बना है.
c17.32
लिपिपत्र ३८ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
c17.33
ओं स्वस्ति फक्कप्रस्रवणात्प्रकृष्टकर्म्मारम्भोद्गताभ्युदया-
न्निभृताशेषदिषामनेकसमरशतसंपातात्यन्तविजयिना(नां)
प्रभूतयशःकौत्यर्लङ्कारालङ्कृतान्वयभुवां गारुलकानां
वंश्र्शा(वंशो)नुक्रमेणाविर्भूतो दीनानाथाश्रितार्त्तिबाध्यवजनो-
पजीव्यमानविभवविस्तरः तरुरिवाक्षीणफलच्छायतयैका-
c17.34
लिपिपत्र ३६ वां.
c17.35
यह लिपिपत्र त्रैकूटकवंशी राज दद्दसेन६ के कलचुरि संवत् २०७ ( ई. स. ४५६ ) के, गुर्जर-वंशी रणग्रह७ के कलचुरि सं. ३६१ ( ई. स. ६४० ) के और दद्द८ (दूसरे) के कलचुरि सं. ३६२ (ई. स. ६४१) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. रणग्रह के दानपत्र का 'ए' लिपिपत्र ३८ में दिये हुए वलभी के राजा शीलादित्य के दानपत्र के 'ए' से मिलता हुआ है.
c17.36
१ ये मूल पंक्तियां धरसेन (दूसरे) के दानपत्र से हैं.
c17.37
२ ‘प्रतापः’ शब्द यहां पर अनावश्यक है.
c17.38
३ ऍ. इं; जि. ११, पृ. १८ और १६ के बीच के प्लेटों से.
c17.39
४ ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३ के पास के प्लेट १ A. B. से.
c17.40
५ ये मूल पंक्तियां गारुलक सिंहादित्य के दानपत्र से हैं.
c17.41
६ ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५३ के पास के सेट से.
c17.42
७ ऍ. इं; जि. २, पृ. २१ के पास के सेट से.
c17.43
८ ऍ. इं; जि. ५, पृ. ४० और ४१ के बीच के सेटों से.
c17.44
लिपिपत्र ३९वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—
c17.45
इत्युक्तञ्च भगवता वेदव्यासेन व्यासेन षष्टिवरिष(वर्ष)-
सहस्राणि स्वर्गे मोदति भूमिद(दः) आच्छेत्ता चानुमन्ता
च तान्येव नरके वसे[त्] विन्ध्याटवीष्वतोयासु शुष्ककोटरवा-
सिन[:] क्रि(कृ)ष्णाश्यो हि जायन्ते भूमिदानापहारका[:]
c17.46
लिपिपत्र ४० वां.
c17.47
यह लिपिपत्र नवसारी से मिले हुए चालुक्य युवराज आश्रय (शीलादित्य) के कलचुरि सं. ४२१ (ई. स. ६७०) के दानपत्र२ और गुजरात के राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा कर्कराज (सुवर्णवर्ष) के शक सं. ७३४ (ई. स. ८१२) के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. कर्कराज के दानपत्र के 'ड' की आकृति नागरी के 'द' की सी है जिसमें, संभव है कि, ग्रंथि से नीचे निकला हुआ अंश 'ढ' से उक्त अक्षर को भिन्न बतलाने के लिये ही हो. 'ड' का ऐसा ही या इससे मिलता हुआ रूप लिपिपत्र ३७ और ३८ में भी मिलता है.
c17.48
३ इं. ऐं; जि. १२, पृ. १५८ और १६१ के बीच के सेटों से.
c17.49
लिपिपत्र ४०वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
c17.50
ओं स वोव्याद्वेधसा येन(धाम) यन्नाभिकमलङ्कृतं । हरश्च
यस्य कान्तेन्दुकलया स(क)मलङ्कृतं ॥ स्वस्ति स्वकीया-
न्वयवड्श(वंश)कर्त्ता श्रीराष्ट्रकूटामलवड्श(वंश)जन्मा । प्रदानशूरः
समरैकवीरो गोविन्दराजः क्षितिपो बभूव ॥ यस्या-
०००माचजयिनः प्रियसाहसस्य क्ष्मापालवेषफलमेव