भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c19.2
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c19.2
- Language
- Hindi
c19.2
तेलुगु-कनड़ी लिपि का प्रचार बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में, मईसोर राज्य में तथा मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग में ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आसपास से पाया जाता है (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). इसमें समय के साथ परिवर्तन होते होते अक्षरों की गोलाई बढ़ने लगी और त्वरासे लिखने के कारण ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास इसके कितने एक अक्षर और १४ वीं शताब्दी के आसपास अधिकतर अक्षर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियों से मिलते जुलते बन गये. फिर उनमें थोड़ासा और परिवर्तन होकर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियां, जो परस्पर बहुत ही मिलती हुई हैं, बनीं; इसलिये इस लिपि का नाम तेलुगु-कनड़ी कल्पना किया गया है. यह लिपि पल्लवों, कदंबों, पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, गंगावंशियों, काकतीयों आदि कई राजवंशों तथा कई सामंतवंशों के शिलालेख तथा दानपत्रों में एवं कितने ही साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उक्त लेखादि की संख्या सैंकड़ों नहीं किंतु हजारों को पहुंच चुकी है, और वे ऍपिग्राफ़िआ इंडिका, ऍपिग्राफ़िआ कर्नाटिका, इंडियन ऍटिक्वेरी आदि प्राचीन शोधसंबंधी अनेक पुस्तकों में छप चुके हैं.