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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c19: १३—तेलुगु-कनड़ी लिपि

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c19

Language
Hindi

१३—तेलुगु-कनड़ी लिपि

c19.1

ई. स. की पांचवीं शताब्दी से (लिपिपत्र ४३ से ५१).

c19.2

तेलुगु-कनड़ी लिपि का प्रचार बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में, मईसोर राज्य में तथा मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग में ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आसपास से पाया जाता है (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). इसमें समय के साथ परिवर्तन होते होते अक्षरों की गोलाई बढ़ने लगी और त्वरासे लिखने के कारण ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास इसके कितने एक अक्षर और १४ वीं शताब्दी के आसपास अधिकतर अक्षर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियों से मिलते जुलते बन गये. फिर उनमें थोड़ासा और परिवर्तन होकर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी लिपियां, जो परस्पर बहुत ही मिलती हुई हैं, बनीं; इसलिये इस लिपि का नाम तेलुगु-कनड़ी कल्पना किया गया है. यह लिपि पल्लवों, कदंबों, पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, गंगावंशियों, काकतीयों आदि कई राजवंशों तथा कई सामंतवंशों के शिलालेख तथा दानपत्रों में एवं कितने ही साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उक्त लेखादि की संख्या सैंकड़ों नहीं किंतु हजारों को पहुंच चुकी है, और वे ऍपिग्राफ़िआ इंडिका, ऍपिग्राफ़िआ कर्नाटिका, इंडियन ऍटिक्वेरी आदि प्राचीन शोधसंबंधी अनेक पुस्तकों में छप चुके हैं.

c19.3

१ ये मूल पंक्तियां महासुदेव के खरिआर के दानपत्र से हैं.

c19.4

लिपिपत्र ४३ वां.

c19.5

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् के उरुवुपल्लि२ के, तथा उसी वंश के राजा सिंहवर्मन् के पकिर३ और मंगलूर४ गांवों से मिले हुए दानपत्रों से तय्यार किया गया है. विष्णुगोपवर्मन् के दानपत्रों के अक्षरों के सिर मध्यप्रदेशी लिपि की नांई बहुधा चौकूंटे और भीतर से खाली हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम और गोलाईदार या खमदार लकीरवालों की अधिक है, तोभी इसकी लिपि मध्यप्रदेशी और पश्चिमी लिपि से बहुत कुछ मिलती हुई है. सिंहवर्मन्

c19.6

२ इं. ऍ; जि. ५, पृ. ५० और ५१ के बीच के प्लेटों से.

c19.7

३ पँ. इं; जि. ८, पृ. १६० और १६१ के बीच के प्लेटों से.

c19.8

४ इं. ऍ; जि. ५, पृ. १५४ और १५६ के बीच के प्लेटों से.

c19.9

के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे नहीं किंतु छोटी सी आड़ी लकीर से बने हुए हैं. इस लिपिपत्र की लिपियों का समय केवल अनुमान से ही लिखा है.

c19.10

लिपिपत्र ४३वें की मूल पंक्तियों का१ नागरी अक्षरांतर—

c19.11

जितं भगवता श्रीविजयपलक्कडस्थानात् परब्रह्म-
ण्यस्य स्वबाहुबलाज्जितोर्जितक्षात्रतपोनिधेः विहि-
तसर्व्वमर्य्यादस्य स्थितिस्थितस्यामितात्मनो महाराज-
स्य श्रीस्कन्दवर्म्मणः प्रपौत्रस्यार्चितशक्तिसिद्धिसम्पन्न-
स्य प्रतापोधनतराजमण्डलस्य महाराजस्य वसु-
धातलैकवीरस्य श्रीवीरवर्म्मणः पौत्रस्य देवद्विज-

c19.12

लिपिपत्र ४४ वां.

c19.13

यह लिपिपत्र देवगिरि से मिले हुए कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन्२ और काकुस्थवर्मन्३ के दान-पत्रों से तय्यार किया गया है. इनके अक्षरों के सिर चौकूंटे परंतु भीतर से भरे हुए हैं और कितने ही अक्षरों की आड़ी लकीरें विशेष कर खमदार बनती गई हैं (देखो, मृगेशवर्मन् के दानपत्रों में इ, ख, ज, ट, ड, ध, ब, भ, म, व और ह, और काकुस्थवर्मन् के दानपत्र में इ, रव, च, ढ, द, ल आदि).

c19.14

लिपिपत्र ४४वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—

c19.15

सिद्धम् ॥ जयत्युत्कृष्टलोकेशः सर्व्वभूतहिते रतः रागा-
द्यरहरोनन्तोऽनन्तज्ञानदृगीश्वरः ॥ स्वस्ति विजयवैज[य]न्त्या[:] स्वामिम-
हासेनेनमातृगणानुद्ध्या(ध्या)ताभिषिक्तानां५ मानव्यसगोत्राणां६ हारितिपु-
त्राणां(णां) प्रां(प्रों) गिरसां प्र.तकृतस्वाद्ध्या(ध्या)यचर्चकाना(नां) सद्धर्म्मसंदर्बाना(नां)
कदंबानां अनेकजन्मान्तरोपाज्जितविपुलपुण्यस्कन्धः स्वाहुवाज्जित-

c19.16

लिपिपत्र ४५ वां.

c19.17

यह लिपिपत्र चालुक्यवंशी राजा मंगलेश्वर के समय के शक सं. ५०० (ई.स. ५७८) के शिलालेख७, उसी वंश के राजा पुलुकेशिन् (दूसरे) के हैदराबाद (निज़ाम राज्य में) से मिले हुए शक सं. ५३४ (ई. स. ६१२) के दानपत्र८ और पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (विजयसिद्धि, मंगियुवराज) के राज्यवर्ष दूसरे (ई. स. ६७३) के दानपत्र९ से तय्यार किया गया है. मंगलेश्वर

c19.18

१ ये मूल पंक्तियां उरुवुपल्लि के दानपत्र से हैं.

c19.19

२ इं. ऐं; जि. ७, पृ ३५ के सामने के प्लेट से.

c19.20

३ इं. ऐं; जि. ६, पृ. २४ और २५ के बीच के प्लेटों से.

c19.21

४ ये मूल पंक्तियां मृगेशवर्मन् के दानपत्र से हैं.

c19.22

५ "षिक्तानां" के 'ना' के पीछे ठीक वैसा ही चिह्न है जैसा कि मृगेशवर्मन् के दानपत्र से दिये हुए अक्षरों में 'हिः' के विसर्ग के नीचे की बिंदी के स्थान में पाया जाता है. संभव है कि यह अनुस्वार का चिह्न हो (न कि 'म्' का) जो अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा हो. इस प्रकार का चिह्न उक्त दानपत्र में तीन जगह मिलता है, अन्यत्र अनुस्वार का नियत चिह्न सर्वत्र अक्षर के ऊपर ही धरा है.

c19.23

६ यहां भी ठीक वही चिह्न है जिसका विवेचन टिप्पण ८ में किया गया है.

c19.24

७ इं; ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास के भेट से.

c19.25

८ इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७२ और ७३ के बीच के प्लेटों से.

c19.26

९ ऐं. इं; जि. ८, पृ. २३८ और २३६ के बीच के प्लेटों से.

c19.27

के लेख की लिपि स्थिरहस्त से लिखी गई है. पुलकेशिन् के दानपत्र की लिपि में '**अ**' और '**आ**' की खड़ी लकीर को बाईं ओर मोड़ कर उक्त अक्षरों के सिरों तक ऊपर बढ़ा दिया है जिससे ये अक्षर मंगलेश्वर के लेख के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ भिन्न प्रतीत होने लगे हैं और इन्हीं के रूपांतर से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के '**अ**' और '**आ**' बने हैं (देखो, लिपिपत्र ८३ में कनड़ी लिपि की उत्पत्ति). '**इ**' अक्षर, जिसका प्रचार दक्षिण की भाषाओं. में मिलता है, पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है. सर्वलोकाश्रय के दानपत्र की लिपि में '**इ**' की दो बिंदियों के ऊपर की लकीर के प्रारंभ में ग्रंथि बनाई है और उसका घुमाव बढ़ा दिया है. इसीको चलती कलम से पूरा लिखने से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियों का '**इ**' बनता है (देखो, लिपिपत्र ८३). '**क**' की खड़ी लकीर को मोड़ कर मध्य तक और '**र**' की को सिरे तक ऊपर बढ़ा दिया है. इन्हीं रूपों में थोड़ा सा और परिवर्तन होने पर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के '**क**' और '**र**' बने हैं.

c19.28

लिपिपत्र ४५वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—

c19.29

स्वस्ति ॥ श्रीस्वामिपादानुद्ध्या(ध्या)तानाम्मानव्यसगोत्राणाङ्गा(शां हा)रीतीपुत्राणाम् अ-
ग्निष्टोमाग्निचयनवाजपेयपौण्डरीकब हुसुवर्णाश्वमेधावभृथ-
स्रानपवित्रीकृतशिरसां चल्क्यानां वंशे संभूतः शक्तिचयसं-
पन्नः चल्क्यांशाम्व(पूण)चन्द्रः अनेकगुणगणालंकृतशरीर-

c19.30

लिपिपत्र ४६ वां.

c19.31

यह लिपिपत्र पश्चिमी चालुक्यवंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के केंडूरगांव से मिले हुए शक सं. ६७२ (ई. स. ७५०) के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि त्वरा से लिखी हुई (घसीट) है और कई अक्षरों में आड़ी या खड़ी लकीरें खमदार हैं (देखो, **इ**, **ए**, **घ**, **च**, **ज**, **ड**, **ढ**, **थ**, **द**, **ध**, **प**, **फ**, **ब**, **भ**, **म**, **व**, **ह**, **का** और **दा**). '**क**' को '**क**' के मध्य में दोनों तरफ बाहर निकली हुई वक्र रेखा जोड़ कर बनाया है.

c19.32

२ ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०४ और २०५ के बीच के प्लेटों से.

c19.33

लिपिपत्र ४६वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—

c19.34

तदागामिरस्मद्वंश्यैरन्यैश्च राजभिरायुरैश्वर्यादीनां वि-
लसितमचिरांशुचञ्चलमवगच्छद्भि <mark>...</mark> राचन्द्रार्कधराऽर्णवस्थिति-
समकालं यशश्चिचीषुभिस्स्वदत्तिनिर्विशेषं परिपालनीय-
मुक्तञ्च भगवता वेदव्यासेन व्यासेन बहुभिर्व्व-
सुधा भुक्ता राजभिस्सगरादिभिः यस्य यस्य य-
दा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलं स्वन्दातुं सु-
महच्छक्यं दुःखमन्यस्य पालनं दानं वा पा-

c19.35

लिपिपत्र ४७ वां.

c19.36

यह लिपिपत्र राष्ट्रकूट (राठौड़)वंशी राजा प्रभूतवर्ष (गोविंदराज तीसरे) के कडब गांव से मिले हुए शक सं. ७३५ (ई. स. ८१३) के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि भी

c19.37

१ ये मूल पंक्तियां मंगलेश्वर के समय के लेख से हैं.

c19.38

३ इं. ऐं; जि. १२, पृ. १४ और १५ के बीच के प्लेटो से

c19.39

घसीट है. ‘ई’ की दो बिंदियों के बीच की खड़ी लकीर को नीचे से बाईं ओर घुमा कर सिर तक ऊपर बढ़ाने से ही उक्त अक्षर का यह रूप बना है. ‘ळ’ (ऋग्वेद के ‘ळ्ह’ का स्थानापन्न) पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है जिसके मध्य भाग में एक आड़ी लकीर जोड़ने से दक्षिण की लिपियों का ‘र’ बना हो ऐसा प्रतीत होता है. इस दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में ‘ळ’, ‘ळ्ह’ और ‘ऴ’ अक्षर दिये हैं वे इस दानपत्र से नहीं हैं. ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ पूर्वी चालुक्य राजा विजयादित्य दूसरे के एडुरु के दानपत्र१ से और ‘ऴ’ उसी वंश के राजा अम्म (प्रथम) के मडुलपिटन (मसुलीपट्टम्, मद्रास इहाते के कृष्णा ज़िले में) के दानपत्र२ से है.

c19.40

लिपिपत्र ४७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—

c19.41

राष्ट्रकूटकुलामलगगनमृगलांञ्छनः बुधजनमुखक-
मलांशुमाली मनोहरगुणगणांलंकारभारः ककराज-
नामधेयः तस्य पुत्रः स्ववंशानेकदृप्तसंघातपरंप-
राभ्युदयकारणः परमशिष(षि)ब्राह्मणभक्तितत्पर्य्यकुश-
लः समस्तगुणगणां[ध्व्वो]नो(?ष्ठानं) विख्यातसर्व्वलोकनिरुप-
मस्थिरभावनि(वि)जितारिमण्डलः यस्यैम(?व)मासीत् ॥ जित्वा भू-
पारिवर्गेन्न(र्गेण)यकुशलतया येन राज्यं कृतं यः

c19.42

लिपिपत्र ४८ वां.

c19.43

यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा भीम दूसरे (ई. स. ९३४ से ९३५ तक) के पागनवरम् के दानपत्र३ से और उसी वंश के अम्म दूसरे (ई. स. ९४५ से ९७० तक) के एक दानपत्र४ से तय्यार किया गया है. इन दोनों दानपत्रों की लिपि स्थिरहस्त और सुंदर है.

c19.44

३ इं. ऍ; जि. १३, पृ. २१४ और २१५ के बीच के प्लेटों से.

c19.45

लिपिपत्र ४८वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—

c19.46

५ ये मूल पंक्तियां भीम (दूसरे) के दानपत्र से हैं.

c19.47

स्वस्ति श्रीमतां सकलभुवनसंस्तूय(य)मान-
मानव्यसगो(गो)त्राणां(णां) हारोतिपुत्राणां कौशिकोबरप्र-
सादलब्धराज्यानां मातृ(तृ)गणपरिपालितानां स्वा-
मि[म]हासेनपादानुध्यातानां भगवन्नारायणप्रसा-
दसमासादितवरवराहलांच(छ)नेक्षणक्षणवशीकृ-

c19.48

लिपिपत्र ४६ वां.

c19.49

यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा राजराज के कोरुमल्लिन से मिले हुए शक सं. ९४४ (ई. स. १०२२) के दानपत्र६ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि घसीट है और इसके अ, आ, इ, ई, उ, ख, ग, च, ज, ठ, ड, ढ, त, थ, ध, न, ब, य, र, ल और स वर्तमान कन्नड़ी या तेलुगु लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. अक्षरों के सिर बहुधा V ऐसे बनाये हैं और अनुस्वार

c19.50

१ ऍ. इं; जि. ५, पृ. १२० और १२१ के बीच के प्लेट की क्रमशः पंक्ति १२ और २० से.

c19.51

२ ऍ. इं; जि. ५. पृ. १३२ के पास के प्लेट की पंक्ति ३२.

c19.52

४ इं. ऍ; जि. १३, पृ. २४८ और २४६ के बीच के प्लेटों से.

c19.53

६ इं. ऍ; जि. १४, पृ. ५० और ५३ के बीच के प्लेटों से.

c19.54

को कहीं अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ और कहीं अक्षर के सामने मध्य में धरा है. इस दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में जो अ, आ, ख, र, ऊ, खा और उ अक्षर दिये हैं वे इस ताम्र-पत्र से नहीं है. उनमें से अ, आ, ख और र ये चार अक्षर जाह्नवी (गंगा)वंशी राजा अरिवर्मन् के जाली दानपत्र१ से लिये गये हैं. इस पुस्तक में जाली दानपत्रों से कोई लिपिपत्र नहीं बनाया गया परंतु उक्त अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र नहीं मिलते और उनका जानना भी आवश्यक होने से ये यहां दिये गये हैं. बाकी के तीन अक्षरों में से 'ऊ' और 'खा' पूर्वी चालुक्य राजा विष्णुवर्द्धन पांचवें (कलिबिष्णुवर्द्धन) के दानपत्र से२ और अंतिम 'उ'३ एहोले के नारायण के मंदिर के शिलालेख४ से लिया गया है.

c19.55

लिपिपत्र ४६वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—

c19.56

श्रीधाम्नः पुरुषोत्तमस्य महतो नारा-
यणस्य प्रभोर्नाभीपंकरुहाद्बभूव जगतस्स्रष्टा
स्वयंभूस्ततः जज्ञे मानससूनुरत्रिरिति य[:]
तस्मान्मुनेरुचितसोमो वंशकारस्सुधांशुहृ[द्यैः] श्रीक-
ण्ठ(ण्ठ)चूडामणिः। तस्मादासीत्सुधामूतेर्ब्बुधो बुध-
नुतस्ततः ज(जा)तः पुरूरवा नाम चक्रवर्त्ती[त्तौ] स-

c19.57

लिपिपत्र ५० वां.

c19.58

यह लिपिपत्र काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के शक सं. १०८४ (ई. स. ११६२) के अनंकोंड के शिलालेख६ और उसी वंश के राजा गणपति के समय के शक सं. ११३५ (ई. स. १२१३) के चेब्रोलू के शिलालेख७ से तय्यार किया गया है. अनंकोंड के लेख से मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, ई, उ, ओ, औ, ख, ग, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, श और स वर्त्तमान कनड़ी या तेलुगु के उक्त अक्षरों से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं. चेब्रोलू के लेख के 'श्री' में 'शी' बना कर उसके चौतरफ़ चतुरस्र सा बना कर उसे के अंत में ग्रंथि लगाई है. यह सारा चतुरस्रवाला अंश 'र' का ही विलक्षण रूप है. 'ष्टा' और 'स्थ' में 'ठ' और 'थ' का केवल नीचे का आधा हिस्सा ही बनाया है. चेब्रोलू के लेख के अक्षरों के अंत में ऋ के तीन रूप और ऐ अक्षर अलग दिये हैं. उनमें से पहिला 'ऋ' चालुक्य-वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के वक्केलेरी से मिले हुए शक सं. ६७६ (ई. सं. ७५७) के दानपत्र८ से, दूसरा वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के शक सं. १३०० (?१३०१) के दानपत्र९ से, और तीसरा 'ऋ' तथा 'ऐ' दोनों चालुक्यवंशी राजा पुलुकेशिन [प्रथम] के जाली दानपत्र१० से लिये गये हैं.

c19.59

१ इं. ऍ; जि. ८, पृ. २१२ और २१३ के बीच के प्लेटों से.

c19.60

२ इं. ऍ; जि. १३, पृ. १८६ और १८७ के बीच के प्लेटों से.

c19.61

३ लिपिपत्र ४६ में दिये हुए अक्षरों के अंतिम अक्षर के ऊपर गलती से नागरी का 'ऊ' छप गया है जो अशुद्ध है. उसके स्थान में पाठक 'उ' पढ़ें.

c19.62

४ इं. ऍ; जि. ६, पृ. ७५ के पास के प्लेट से.

c19.63

५ ये मूल पंक्तियां राजराज (दूसरे) के दानपत्र से हैं.

c19.64

६ इं. ऍ; जि. ११ पृ. १२ और १७ के बीच के प्लेटों से.

c19.65

७ ऍ. इं; जि. ५, पृ. १४६ और १४७ के बीच के प्लेटों से.

c19.66

८ ऍ इं; जि. ५, पृ. २०५ के पास के प्लेट ४ B, पंक्ति ६५ से.

c19.67

९ ऍ. इं; जि. ३, पृ. ६३ के पास के प्लेट ३ A, पंक्ति ५०.

c19.68

१० इं. ऍ; जि. ८ पृ. ३४० के पास की प्लेटें, क्रमशः पंक्ति ४५ और ३६.

c19.69

### लिपिपत्र ५०वें की मूल पंक्तियों१ का नागरी अक्षरांतर—
एषां वंशे रघूणां क्षितिपतिरभवद्दुर्जय्यश्शौ-
र्य्येकेळि(खि)स्फूर्जद्धमा ततोभूत्प्रतिकरटिघटाशात-
नो बेतराजः। चक्रे विक्रांतबाहुस्तदनु व-
सुमतीपालनं प्रोल्नभूपस्तत्पुत्रो रुद्रदेवस्त-
दुपरि च नृपोत्तंसरत्नं बभूव ॥ ततस्तत्सोद्-

c19.70

लिपिपत्र ५१ वां.

c19.71

यह लिपिपत्र दोनेपूंड़ि से मिले हुए पीठापुरी के नामयनायक के शक सं. १२५६ (ई. स. १३३७) के दानपत्र२, वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के दानपत्र३ तथा कोंडवीडु से मिले हुए गणदेव के शक सं. १३७७ के दानपत्र४ से तय्यार किया गया है. वनपल्ली और कोंडवीडु के दानपत्रों से मुख्य मुख्य अक्षर दिये गये हैं. दोनेपूंड़ि के दानपत्र के क, ञ ('ज्ञ' में), द, प, फ, व और ह में थोड़ा सा परिवर्तन होने से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियों के वे ही अक्षर बने हैं. 'फ' के नीचे जो उलटे अर्धवृत्त का सा चिह्न लगा है वह 'फ' और 'प' का अंतर बतलाने के लिये ही है. पहिले उसका स्थानापन्न चिह्न 'फ' के भीतर दाहिनी ओर की खड़ी लकीर के साथ सटा रहता था (देखो, लिपिपत्र ४८, ४६, ५०) और वर्तमान कनड़ी तथा तेलुगु लिपियों में उसका रूप शंकु जैसी आकृति की खड़ी लकीर में बदल कर अक्षर के नीचे लगाया जाता है. अनुस्वार अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे लगाया है. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे भी इस लिपि में और थोड़ा सा अंतर पड़ कर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियां बनी हैं. यह अंतर लिपि-पत्र ८० में दी हुई लिपियों का लिपिपत्र ५१ से मिलान करने पर स्पष्ट होगा.

c19.72

३ एपि. इंडि; जि. ३, पृ. ६२ और ६३ के बीच के प्लेटों से.

c19.73

### लिपिपत्र ५१वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
श्रौउ(भ्यु)मामहेश्वराभ्यां न(न)मः। पायाद्वः
करिवदनः कु(कु)तनिजदानस्तुताचिवालिगणे।
निनदति मुहुरपिधत्ते कर्णौ(णौ) यः कर्ण(र्ण)-
तालाभ्यां॥ श्रीविष्णुरस्तु भवदिष्टफलप्रदा-