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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c19.27

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c19.27

Language
Hindi

c19.27

के लेख की लिपि स्थिरहस्त से लिखी गई है. पुलकेशिन् के दानपत्र की लिपि में '**अ**' और '**आ**' की खड़ी लकीर को बाईं ओर मोड़ कर उक्त अक्षरों के सिरों तक ऊपर बढ़ा दिया है जिससे ये अक्षर मंगलेश्वर के लेख के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ भिन्न प्रतीत होने लगे हैं और इन्हीं के रूपांतर से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के '**अ**' और '**आ**' बने हैं (देखो, लिपिपत्र ८३ में कनड़ी लिपि की उत्पत्ति). '**इ**' अक्षर, जिसका प्रचार दक्षिण की भाषाओं. में मिलता है, पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है. सर्वलोकाश्रय के दानपत्र की लिपि में '**इ**' की दो बिंदियों के ऊपर की लकीर के प्रारंभ में ग्रंथि बनाई है और उसका घुमाव बढ़ा दिया है. इसीको चलती कलम से पूरा लिखने से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियों का '**इ**' बनता है (देखो, लिपिपत्र ८३). '**क**' की खड़ी लकीर को मोड़ कर मध्य तक और '**र**' की को सिरे तक ऊपर बढ़ा दिया है. इन्हीं रूपों में थोड़ा सा और परिवर्तन होने पर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के '**क**' और '**र**' बने हैं.