भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c19.58
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c19.58
- Language
- Hindi
c19.58
यह लिपिपत्र काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के शक सं. १०८४ (ई. स. ११६२) के अनंकोंड के शिलालेख६ और उसी वंश के राजा गणपति के समय के शक सं. ११३५ (ई. स. १२१३) के चेब्रोलू के शिलालेख७ से तय्यार किया गया है. अनंकोंड के लेख से मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, ई, उ, ओ, औ, ख, ग, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, श और स वर्त्तमान कनड़ी या तेलुगु के उक्त अक्षरों से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं. चेब्रोलू के लेख के 'श्री' में 'शी' बना कर उसके चौतरफ़ चतुरस्र सा बना कर उसे के अंत में ग्रंथि लगाई है. यह सारा चतुरस्रवाला अंश 'र' का ही विलक्षण रूप है. 'ष्टा' और 'स्थ' में 'ठ' और 'थ' का केवल नीचे का आधा हिस्सा ही बनाया है. चेब्रोलू के लेख के अक्षरों के अंत में ऋ के तीन रूप और ऐ अक्षर अलग दिये हैं. उनमें से पहिला 'ऋ' चालुक्य-वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के वक्केलेरी से मिले हुए शक सं. ६७६ (ई. सं. ७५७) के दानपत्र८ से, दूसरा वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के शक सं. १३०० (?१३०१) के दानपत्र९ से, और तीसरा 'ऋ' तथा 'ऐ' दोनों चालुक्यवंशी राजा पुलुकेशिन [प्रथम] के जाली दानपत्र१० से लिये गये हैं.