भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s1.10
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s1.10
- Language
- Hindi
c25.s1.10
४—अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न ‘क’ के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति ‘ष्क’ से कुछ कुछ मिलती होने लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप ‘ष्क’ जैसा मिलता है. क्षत्रपों और आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में ‘ष्क’ ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत किये हुए चिह्नों में से चौथे में ‘क’ की खड़ी लकीर को बाईं तरफ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा दिया है जिससे उसकी आकृति ‘प्क’ सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में ‘क’ की दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, ‘क’ के मध्य की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति ‘भ’ के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के ‘प्क’ और ‘प्र’ से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी ‘ष्क’ और ‘प्र’ से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत किये ६ चिह्नों में से पहिला ‘ष्क’, दूसरा ‘प्की’, तीसरा और चौथा ‘ल्क’, पांचवा ‘द्क’ और छठा ‘म’ के समान है. नेपाल के लेखों में ‘प्क’, और भिन्न भिन्न लेख व दानपत्रों की पंक्ति में ‘ष्क’ मिलता है (देखो, लिपिपत्र ७१ और ७२ के पूर्वार्द्ध की तीन पंक्तियां). ४ का मूल चिह्न ‘क’ सा था जिस पर सिर की गोलाईदार या कोणदार रेखा लगाने से उसकी आकृति कुछ कुछ ‘प्क’ से मिलती हुई बनी. लेखकों की भिन्न भिन्न लेखन-शैली, सुंदरता लाने के यत्न और चलती कलम से पूरा अंक लिखने से उपर्युक्त भिन्न भिन्न रूप बने हैं. आगे के अंकों का इस प्रकार का विवेचन करने में लेख बहुत बढ़ जाने की संभावना होने के कारण बहुधा भिन्न भिन्न अक्षरों के नाम मात्र लिखे जायेंगे जिनको पाठक लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में दिये हुए अंकों से मिला कर देख लेवें.