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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s1.56

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s1.56

Language
Hindi

c25.s1.56

१ यद्यपि शिलालेखों और दानपत्रों में प्राचीन शैली के अंकों का प्रचार १०वीं शताब्दी के मध्य तक कुछ न कुछ पाया जाता है तो भी ताम्रपत्रों के लेखक ई. स. की आठवीं शताब्दी से ही उस शैली के अंकों के लिखने में गलतियां करने लग गये थे. वलभी के राजा शीलादित्य (छठे) के गुप्त सं. ४४१ के दानपत्र में १०० के साथ जुड़नेवाले ४ के अंक के स्थान में ४० का अंक जोड़ दिया है (इं. पं; जि. ६ पृ. १६ के पास का सेट), और पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् के गांगेय सं. १८४ के दानपत्र में ८० के स्थान पर ८ का और ३ के स्थान पर ३० का चिह्न ('लो', 'ल' का घसीट रूप) लिखा है और २० के लिये २ के आगे बिंदी लगा कर एक ही दानपत्र में प्राचीन और नवीन शैली का मिश्रण भी कर दिखाया है (एं. इं; जि. ३, पृ. १३३ के पास का सेट).