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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s2.6

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.6

Language
Hindi

c25.s2.6

और पितामह इन पांच सिद्धांत ग्रंथों का तो करणरूप से वर्णन किया है; और लाटाचार्य्य१ (लाटदेव), सिंहाचार्य्य,२ यवनाचार्य्य के गुरु३ (जिसका नाम नहीं दिया), आर्य्यभट४, प्रद्युम्न४ और विजयनंदिन्४ के प्रसंगवशात् नाम तथा मत दिये हैं, जिससे पाया जाता है कि ये ज्योतिष के आचार्य्य 'पंचसिद्धांतिका' की रचना से पूर्व के हैं, परंतु खेद की बात यह है कि न तो वराहमिहिर के वर्णन किये हुए पांच सिद्धांतों में से एक भी अब उपलब्ध५ है और न आर्य्यभट६ (प्रथम) के सिवाय लाटाचार्य्य आदि किसी आचार्य्य का कोई ग्रंथ मिलता है, जिससे उनकी अंकशैली का निर्णय हो सके. इस समय 'पुलिशसिद्धांत' नामक कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है परंतु भट्टोत्पल ने वराहमिहिर की बृहत्संहिता की टीका में कई जगह 'पुलिशसिद्धांत' से वचन उद्धृत किये हैं और एक स्थल में 'मूलपुलिशसिद्धांत' के नाम से एक श्लोक भी उद्धृत किया है. उन दोनों में अंक वर्तमान७ शैली से ही मिलते हैं. इससे पाया जाता है कि वराहमिहिर से पूर्व भी इस शैली का प्रचार था. बख्शाली (युसफ़ज़ई ज़िले, पंजाब में) गांव से अंकगणित का एक भोजपत्र पर लिखा हुआ प्राचीन पुस्तक ज़मीन से गड़ा हुआ मिला है जिसमें अंक नवीन शैली से ही दिये हैं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. हॉर्नले ने उसकी रचना का काल ई. स. की तीसरी अथवा चौथी शताब्दी८ होना अनुमान किया है. इस पर डॉ. बूलर ने लिखा है कि 'यदि हॉर्नले का अंकगणित की प्राचीनता का यह बहुत संभावित अनुमान ठीक हो तो उस [अंकक्रम] के निर्माण का समय ई. स. के प्रारंभकाल अथवा उससे भी पूर्व का होगा'९. अभी तक तो नवीन शैली के अंकों की प्राचीनता का यहीं तक पता चलता है.