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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s2: नवीन शैली के अंक

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2

Language
Hindi

नवीन शैली के अंक

c25.s2.1

नवीन शैली के अंकक्रम में १ से ६ तक के लिये ६ अंक और खाली स्थान का सूचक शून्य ० है. इन्हीं १० चिह्नों से अंकविद्या का समस्त व्यवहार चलता है. इस शैली में प्राचीन शैली की नांई प्रत्येक अंक नियत संख्या का ही सूचक नहीं है किंतु प्रत्येक अंक इकाई, दहाई, सैंकड़े आदि प्रत्येक स्थान पर आ सकता है और स्थान के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर हटने पर प्रत्येक अंक का स्थानीय मुख्य दसगुना बढ़ता जाता है, जैसे ११११११ में छओं अंक १ के ही हैं परंतु पहिले से ( दाहिनी ओर से लेने से) १, दूसरे से १०, तीसरे से १००, चौथे से १०००, पांचवें से १०००० और छठे से १००००० का बोध होता है. इसीसे इस संख्यासूचकक्रम को दशगुणोत्तर संख्या कहते हैं, और वर्तमान समय में बहुधा संसार भर का अंकक्रम यही है.

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यह अंकक्रम भारतवर्ष में कब से प्रचलित हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो प्राचीन शैली से ही अंक लिखे मिलते हैं. नवीन शैली से लिखे हुए अंक पहिलेपहल कलचुरि सं. ३४६१ ( ई. स. ५६५ ) के दानपत्र में मिलते हैं, जिसके पीछे ई. स. की १० वीं शताब्दी के मध्य के आस पास तक कहीं प्राचीन और कहीं नवीन शैली के अंकों का व्यवहार है. उसके बाद नवीन शैली ही मिलती है. परंतु ज्योतिष के पुस्तकों में ई. स. की छठी शताब्दी से बहुत पूर्व इस शैली का प्रचार होना पाया जाता है क्योंकि शक सं. ४२७२ ( ई. स. ५०५ ) में वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें सर्वत्र नवीन शैली से ही अंक३ दिये हैं. यदि उस समय नवीन शैली का व्यवहार सामान्य रूप से न होता तो वराहमिहर अपने ग्रंथ में नवीन शैली से अंक न देता. इससे निश्चित है कि ई. स. की पांचवीं शताब्दी के अंत के आसपास तो नवीन शैली से अंक लिखने का प्रचार सर्वसाधारण में था परंतु शिलालेख और दानपत्रों के लिखनेवाले प्राचीन शैली के ढर्रे पर ही चलते रहे हों जैसा कि इस देश में हर बात में होता आया है. वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ में पुलिश, रोमक, वसिष्ठ, सौर ( सूर्य )

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१ संखेड़ा से मिले हुए गुर्जरवंशी किसी राजा के उक्त दानपत्र में संवत् ‘संवत्सरशतत्रयं(ये) षट्चत्वारिंशो- (शदु)त्तरेके । ३४६’ दिया है. जी. आर. के ने अपनी ‘इंडियन् मॅथेमॅटिक्स’ (भारतीय गणितशास्त्र) नामक पुस्तक में उक्त ताम्रपत्र के विषय में लिखा है कि ‘वह संदेहरहित नहीं है’ और टिप्पण में लिखा है कि ‘ये अंक पीछे से जोड़े गये हैं’ (पृ. ३१). मि. के का यह कथन सर्वथा स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उक्त दानपत्र को संदिग्ध मानने के लिये कोई कारण नहीं है और न कोई कारण मि. के ने ही बतलाया है. इसी तरह अंकों के पीछे से जोड़ने का कथन भी स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि जब संवत् शब्दों में दिया ही था तो पीछे से फिर उसको अंकों में बनाने की आवश्यकता ही न थी. हरिलाल हर्षदराय ध्रुव ने, जिसने उसका संपादन किया है, मूल ताम्रपत्र को देखा था परंतु उक्त विद्वान् को उन अंकों का पीछे से बनाया जाना मालूम न हुआ और न उसके फोटो पर से ऐसा पाया जाता है. मि. के की भारतीय गणितशास्त्र को नवीन ठहराने की खैंचतान ने ही इस और ऐसी ही और प्रमाणशून्य कल्पनाओं की सृष्टि कर दी है जिस- का कुछ परिचय आगे दिया जायगा. शब्दों और अंकों दोनों में संवत् देने की परिपाटी प्राचीन है और कई लेखादि में मिलती है; जैसे कि छार (चार) गांव से मिले हुए राजा हुविष्क के लेख में हुविस्क(ष्क)स्य स(संवत्सर चत(तु)रिश्र ४०’ (आ. स. रि; ई. स. १६०८-६, प्लेट ५६); गिरनार के पास के चट्टान पर खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख में ‘वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २’ (एं. इं. जि. ८, पृ. ४२) आदि.

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२ डॉ; फ्रां. इं; पृ. ३८. सु; ग. त; पृ. १३. ‘खंडखाद्य’ की टीका में आमराज ने वराहमिहर की मृत्यु शक सं. ५०६ (ई. स. ५८७) में होना लिखा है वह विश्वास योग्य नहीं है (सु; ग. त; पृ. १३).

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३ सप्ताश्विवेद (४२७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका, अध्याय १, आर्या ८). रोमकसूर्यो द्युगणान् खतिथि (१५०) बजात् पंचऋतुं (५६) परिक्रीड्यास । सप्ताष्टकखजलेनेंद्रियो (४५०८७) हुताशनधमार्कतः सः (पंच; ८। ९) आदि.

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और पितामह इन पांच सिद्धांत ग्रंथों का तो करणरूप से वर्णन किया है; और लाटाचार्य्य१ (लाटदेव), सिंहाचार्य्य,२ यवनाचार्य्य के गुरु३ (जिसका नाम नहीं दिया), आर्य्यभट४, प्रद्युम्न४ और विजयनंदिन्४ के प्रसंगवशात् नाम तथा मत दिये हैं, जिससे पाया जाता है कि ये ज्योतिष के आचार्य्य 'पंचसिद्धांतिका' की रचना से पूर्व के हैं, परंतु खेद की बात यह है कि न तो वराहमिहिर के वर्णन किये हुए पांच सिद्धांतों में से एक भी अब उपलब्ध५ है और न आर्य्यभट६ (प्रथम) के सिवाय लाटाचार्य्य आदि किसी आचार्य्य का कोई ग्रंथ मिलता है, जिससे उनकी अंकशैली का निर्णय हो सके. इस समय 'पुलिशसिद्धांत' नामक कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है परंतु भट्टोत्पल ने वराहमिहिर की बृहत्संहिता की टीका में कई जगह 'पुलिशसिद्धांत' से वचन उद्धृत किये हैं और एक स्थल में 'मूलपुलिशसिद्धांत' के नाम से एक श्लोक भी उद्धृत किया है. उन दोनों में अंक वर्तमान७ शैली से ही मिलते हैं. इससे पाया जाता है कि वराहमिहिर से पूर्व भी इस शैली का प्रचार था. बख्शाली (युसफ़ज़ई ज़िले, पंजाब में) गांव से अंकगणित का एक भोजपत्र पर लिखा हुआ प्राचीन पुस्तक ज़मीन से गड़ा हुआ मिला है जिसमें अंक नवीन शैली से ही दिये हैं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. हॉर्नले ने उसकी रचना का काल ई. स. की तीसरी अथवा चौथी शताब्दी८ होना अनुमान किया है. इस पर डॉ. बूलर ने लिखा है कि 'यदि हॉर्नले का अंकगणित की प्राचीनता का यह बहुत संभावित अनुमान ठीक हो तो उस [अंकक्रम] के निर्माण का समय ई. स. के प्रारंभकाल अथवा उससे भी पूर्व का होगा'९. अभी तक तो नवीन शैली के अंकों की प्राचीनता का यहीं तक पता चलता है.

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१ पंचभ्यो द्वावाद्यौ व्याख्यातौ लाटदेवेन (पंच० १।३).

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२ लाटाचार्य्योक्तो यवनपुरे ऽर्द्धास्तंगते ऽर्के। रव्युदये लंकायां सिंहाचार्य्येण दिनगणो ऽभिहितः। (१४।४४).

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३ यवनानां निशि दशभिर्गतैर्मुहूर्त्तैश्च तद्भवः। लंकायामर्द्धरात्रसमये दिनप्रवृत्तिं जगाद चार्य्यभटः (१४।४५).

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४ प्रद्युम्नो भूतनयं जीवे सौरे च विजयनंदी (१८।५६).

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५ जो 'सूर्यसिद्धांत' इस समय उपलब्ध है वह वराहमिहिर का वर्णन किया हुआ उक्त नाम का सिद्धांत नहीं किंतु उससे भिन्न और पिछला है.

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६ आर्य्यभट (प्रथम) ने, जिसका जन्म ई. स. ४७६ में (उ; क्रॉ. इं; पृ. ३४. सु; ग. त; पृ. २) हुआ था, 'आर्य्यभटीय' (आर्य्यसिद्धांत) नामक ग्रंथ बनाया, जिसको डॉ. कर्न ने ई. स. १८७४ में हॉलैंड देश के लेडन नगर में छपवाया है. उसमें अंक न तो शब्दों में और न अंकों में दिये हैं किंतु सर्वत्र अक्षरों से दिये हैं जिनका क्रम नवीन शैली से ही है.

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७ तिथिरंशाः खवसुद्विकदशहताः शून्यखमध्यरदघ्नाः (२५८८२९००); अंबरगगनविषयमुनिगुणविवरमंगैर्भजिते (१७९५०००) शशिसुतमस्य (शंकर बालकृष्ण दीक्षितरचित 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र, पृ. १६२) आदि; ये वचन 'पुलिशसिद्धांत' से भट्टोत्पल ने उद्धृत किये हैं. खखाष्टमुनिरामाश्विन नावशरराशिवः ( १२८५२२३७८००).। मानां चतुर्युगेनेते परिवर्त्ताः प्रकीर्त्तिताः (वही, पृ. १६३), यह वचन भट्टोत्पल के अनुसार, 'मूलपुलिशसिद्धांत' से है.

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८ इं. ऐं; जि. १७, पृ. ३६.

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९ वू; इं. पे; पृ. ८२. मि. के ने ई. स. १८०७ के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के जर्नल में (पृ. ४७५-५०८) 'नोट्स ऑन इंडि-अन मैथेमॅटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र पर टिप्पण) नामक विस्तृत लेख में यह बतलाने का यत्न किया है कि भारतीय गणितशास्त्र अब तक जितना प्राचीन माना गया है उतना प्राचीन नहीं है और उसी लेख में भारतवर्ष के नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के विषय में लिखा है कि 'हम पूरी सत्यता के साथ कह सकते हैं कि हिंदुओं के गणित शास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (पृ. ४६३). मि. के के इस कथन में कुछ भी वास्तविकता नहीं है केवल हठधर्मी ही है क्योंकि ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ के आचार्य्य वराहमिहिर[^cont]
* द्विघनं शशिरस (६१) भक्तं द्वादशहीनं दिवसमानं (पंचसिद्धान्तिका १२।५). सप्ताश्विवेद (४७७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशु-क्लादौ (पं. सि; १।८). रोमकसूर्यो द्युगणात खतिथि (१५०) घ्नात्स पंचकर्तु (६५) परिवहीनात् । सप्ताष्टकषट्तकेंदियो (५६७८०) हुता-शाद्यप्तात्कंसः (पं. सि; १।९). रोमकयुगमर्केंद्वोर्वर्षाण्याकाशषट्पंचविषयाः (२८५०)। खाग्निशरा (१५०) द्विमासाः खरसविषयाश्वयः (२५६०) प्रजयाः (पं. सि; १। १५). आासन्नादासु सुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्द्विकपंचद्वियुतः (२५२६) शककालस्तस्य राज्ञः (वाराहीसंहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३). क्या उपर्युक्त उदाहरण, जिनमें कई जगह शून्य (०) का भी प्रयोग हुआ है, वराहमिहिर के समय अर्थात् ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ में नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना नहीं बतलाते? और सातवीं शताब्दी के लल्ल† तथा ब्रह्मगुप्त‡ के ग्रंथों में सैकड़ों जगह नवीन शैली से दिये हुए अंक मिलते हैं जिनको देखे बिना ही यह मनमानी कल्पना की गई है. प्राचीन लेख और दानपत्रों में यद्यपि अंक विशेष कर शब्दों में दिये जाते हैं तो भी ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आसपास से कहीं नवीन शैली से दिये हुए भी मिलते हैं. मि. के ने ई. स. ५६४ से लगा कर ८८२ तक के १६ लेखों की सूची अपने उक्त लेख में दी है जिनमें अंक नवीन शैली से दिये हुए हैं परंतु उनमें से प्रत्येक के अंकों में कुछ न कुछ दूषण लगा कर एक का भी ठीक होना स्वीकार नहीं किया (पृ. ४८२-८६) जिसका कारण यही है कि वे लेख उक्त कथन के विरुद्ध १० वीं शताब्दी से बहुत पूर्व के लेखों में भी नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना सिद्ध करते हैं. कोई कोई ताम्रपत्र जाली भी बने होते हैं क्योंकि उनके भूमि पर अधिकार रहता है परंतु शिलालेखों का बहुधा भूमि से संबंध होता ही नहीं इस लिये उनको कृत्रिम बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहती. शेरगढ़ (कोटाराज्य में) के दरवाज़े के पास की तिबारी की सीढ़ियों के पास एक ताक़ में लगे हुए सामंत देवदत्त के वि. सं. ८४७ (ई. स. ७६१) के लेख को मैंने देखा है उसमें नवीन शैली के संवत् के अंक बहुत स्पष्ट हैं. डॉ. फ़्लीट ने उसके संवत् के अंश की प्रतिकृति छापी है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३५१) जिसमें भी संवत् के अंक स्पष्ट हैं (डॉ. फ़्लीट ने ८३६ पढ़ा है वह अशुद्ध है). प्रतिहार नागभट के समय के बुचकला (जोधपुर राज्य में) के वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) के शिलालेख के संवत् के अंक (एं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का लेट), ग्वालियर् से मिले हुए प्रतिहार भोजदेव के समय के ई. स. ८७० के आस पास के शिला लेख के (जिसमें संवत् नहीं दिया) १ से २६ तक श्लोकांक (आ. स. ई; ई. स. १६०३-४, सेट ७२) और वहीं से मिले हुए उसी राजा के समय के वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७६) के शिलालेख में दिये हुए ६३३, १८७ और ५० के अंक सब के सब नवीन शैली से ही हैं (एं. इं; जि. १, पृ. १६० के पास का प्लेट). इन सब लेखों की उत्तम प्रतिकृतियां छपी हैं. उनमें दिये हुए अंकों को कोई विद्वान् संशययुक्त नहीं कह सकता. ऐसी दशा में मि. के की उपर्युक्त "पूर्ण सत्यता" में वास्तविक सत्यता का अंश कितना है इसका पाठक लोग स्वयं विचार कर सकेंगे.

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शून्य की योजना कर नव अंकों से गणित शास्त्र को सरल करनेवाले नवीन शैली के अंकों का प्रचार पहिलेपहल किस विद्वान् ने किया इसका कुछ भी पता नहीं चलता. केवल यही पाया जाता है कि नवीन शैली के अंकों की सृष्टि भारतवर्ष में हुई. फिर यहां से अरबों ने यह क्रम सीखा और अरबों से उसका प्रवेश युरोप में हुआ, जिसके पहिले चाल्डिअन्, हिब्रू, ग्रीक, अरब आदि एशिया और युरोप की जातियां वर्णमाला के अक्षरों१ से अंकों का काम लेती थीं. अरबों के यहां खलिफ़ वलीद के समय (ई. स. ७०५-७१५) तक अंकों का प्रचार न था२ जिसके बाद उन्होंने भारतवासियों से अंक लिये.

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१ पहिले ६ अक्षरों से १ से ६ तक के अंक, उनके बाद के ६ अक्षरों से १० से ६० तक की दहाइयों के अंक और बाकी के अक्षरों से १००, २०० आदि के अंक बतलाये जाते थे. जब वर्णमाला के अक्षर पूरे हो जाते तब फिर उन्हींके ऊपर चिह्न लगा कर १००० तक सूचित करने के लिये उनको काम में लाते थे. ग्रीक लोगों में १०००० तक के लिये अक्षर संकेत थे परंतु रोमन लोगों में १००० तक के ही. रोमन अक्षरों से अंक लिखने का प्रचार अब तक युरोप में कुछ कुछ बना हुआ है और बहुधा घड़ियों में घंटों के अंकों और पुस्तकों में कभी कभी सन् के अंक तथा सेटों की संख्या आदि में उसका व्यवहार होता है. अरबों में भारतीय अंक ग्रहण करने के पहिले अक्षरों से ही अंक बतलाये जाते थे, जिसको 'अबजद' (हिब्रू वर्णमाला के पहिले ४ अक्षरों के उच्चारणों-अ, ब, ज और द-से) कहते हैं. उन्होंने यह अक्षरसंकेत ग्रीकों से सीखा था. अरबी से फ़ारसी में उसका प्रयोग होने लगा और हिंदुस्तान के मुसलमानों के समय के फ़ारसी लेखों तथा पुस्तकों में कभी कभी अंकसूचक अक्षरों से शब्द बना कर सन् का अंक बतलाया हुआ मिलता है, जैसे कि 'वफ़ात् फीरोज़ (फ़ीरोज़ का देहांत) = हिजरी सन् ७६०; 'मस्जिद जामिउल् शर्क = हिजरी सन् ८५२ आदि (क; ई. इं; पृ. २२६).

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२ ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५, टिप्पण २. † शाके नवाब्धिष्व (४६०) रन्विते शशिनो ऽङ्कदस्त्रै (२६) स्तत्तुंगतः कतशिबै (१४७) स्तमसः षडंकैः (६६)। शैलाग्निभिः (३७) सुरगुरोर्गणिते सितो ऽक्षान् शोध्यं चिपंचकु (१५२) स्ततेऽश्वराचि (२५०) भक्ते ॥ १८॥ स्तंबैरमांबुधि (४८०) हते क्षिति नंदनस्य सूर्यात्मजस्य गणिते ऽस्वर लोचनै- (२०) श्च। व्योमाग्निवेद (४३०) निहते विदधीत लब्धं शीतांशुकुंगकलाश्रुदं बर्के ॥ १६ ॥ ( शिष्यधीवृद्धिदतंत्र, उत्तराधिकार ). ‡ पंचाम्वराणि गुणगु णपञ्चसु नित्वर शरे (५००५५६०००००) र्गिताः शशिनः । भौमस्य द्वियसशराल्पपचवर सुरसन वहियमाः (२२६६८५२२५६२२) ॥ १६ ॥ (ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, मध्यमाधिकार).

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इस विषय में 'एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटॅनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोश में लिखा है कि 'यह सर्वथा निःसंशय है कि हमारे (अंग्रेजी) वर्तमान दशगुणोत्तर अंकक्रम की उत्पत्ति ˙˙˙भारतीय है. संभवतः खगोलसंबंधी उन सारणियों के साथ, जिनको एक भारतीय राजदूत ई. स. ७७३ में बगदाद में लाया था, भारतवासियों से उसका प्रवेश अरबों में हुआ. वस्तुतः

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ई. स. की नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में प्रसिद्ध अबुजफ़र मुहम्मद अल् खारिज़मी ने अरबी में उक्त क्रम का विवेचन किया और उसी समय से उसका प्रचार...अरबों में बढ़ता रहा.'

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'यूरोप में शून्यसहित यह पूरा [अंक]क्रम ई. स. की १२ वीं शताब्दी में अरबों से लिया गया और इस क्रम से बना हुआ अंकगणित 'अल्गोरिद्मस्' (अल्गोरिथम्) नाम से प्रसिद्ध हुआ. यह (अल्गोरिद्मस्) विदेशी शब्द 'अल्खारिज़्मी' का अक्षरांतर मात्र है जैसा कि रेनाड ने अनुमान किया था, और उक्त अरब गणितशास्त्रवेत्ता के अनुपलब्ध अंकगणित के पुस्तक के केंब्रिज से मिले हुए अद्वितीय हस्तलिखित लैटिन अनुवाद के, जो संभवतः बाथ-निवासी ऐडेतहर्ड का किया हुआ है, प्रसिद्ध होने के बाद वह (अनुमान) प्रमाणित हो गया है. खारिज़्मी के अंकगणित के प्रकारों को पिछले पूर्वीय विद्वानों ने सरल किया और उन अधिक सरल किये हुए प्रकारों का पश्चिमी यूरोप में पीसा के लेओनार्डो ने और पूर्वी में मेक्सिमम् प्लैनुडेस ने प्रचार किया. 'ज़िरो' शब्द की उत्पत्ति अरबी के 'सिफर' शब्द से, लिओनार्डो के प्रयुक्त किये हुए 'ज़िफिरो' शब्दद्वारा, प्रतीत होती है१'.

c25.s2.22

भारतीय अंकों से अरबों के और उनसे यूरोप के अंकों की सर्वमान्य उत्पत्ति के विरुद्ध मि. के ने उपर्युक्त लेख के प्रारंभ में ही लिखा है कि 'यह कहा जाता है कि हमारे अंकगणित के अंकों की उत्पत्ति भारतीय है. पीकॉक, चैसिल्स, वोप्के, केंटोर, बेले, बूलर, मेकडोनेल और दूसरे लेखक प्रायः निश्चय के साथ यही कहते हैं और विश्वकोशों तथा कोशों का यही कथन है. तो भी इस समय जो सामग्री उपलब्ध है उसकी सावधानी के साथ परीक्षा करने से यह पाया जाता है कि उन(अंकों)की भारतीय उत्पत्ति की कल्पना उचित प्रमाण से रहित है. वैसी परीक्षा यही बतलाती है कि उन कथनों में से बहुत से निस्सार हैं' (बंगा.ए.सो.ज.; ई. स. १६०७, पृ. ४७५). अरबी में अंकों को 'हिंदसे' कहते हैं जिसका अबतक के विद्वान् हिंद (हिंदुस्तान) से लिये जाने के कारण ऐसा कहलाना मानते हैं, परंतु मि. के का कथन है कि 'शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र का बड़ा ज्ञाता फ़ीरोज़ आबादी (ई. स. १३२६-१४२४) 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' से होना बतलाता है, जिसका अर्थ परिमाण है. हरेक आदमी विचार सकता है कि यह काफ़ी अच्छा प्रमाण है परंतु भारतवर्ष के विषय में लिखनेवालों में से अधिकतर ने इसे स्वीकार नहीं किया' (पृ. ४८६). इसी तरह इब्न सिना के वर्गसंख्या-विषयक नियम में लिखे हुए 'फी अल्तरीक अल्हिंदसे' और उसीके घनसंख्याविषयक नियम में दिये हुए 'अल्हिसाब अल्हिंदसे' में 'हिंदसे' शब्दों का हिंद (हिंदुस्तान) से कोई संबंध न बतलाने का यत्न किया है (पृ. ४६०). मि. के का यह कथन भी स्वीकार करने योग्य नहीं है और वैसा ही है जैसा कि उपर्युक्त यह कथन कि 'हिंदुओं के गणितशास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण ६). ऐसे कथनों का प्रतिवाद कर लेख को बढ़ाने की हम आवश्यकता नहीं समझते. प्रसिद्ध विद्वान् अल्बेरुनी ने, अपनी भारतवर्ष संबंधी तहकीकात की अरबी पुस्तक में, जो ई. स. १०३० के आस पास लिखी गई थी, लिखा

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१ अरबों के द्वारा भारतीय अंकों का यूरोप में प्रवेश हुआ उससे बहुत पहिले अर्थात् ई. स. की ४ थी शताब्दी के आस पास 'निओ-पिथागोरियन' नामक अध्यात्म विद्या के उपदेशक, संभवतः अलेक्ज़ेंड्रिया (मिसर में) की तरफ भारतीय अंकों का ज्ञान प्राप्त कर, उनको यूरोप में ले गये परंतु उनका प्रचार अधिक न बढ़ा और वे सार्वदेशिक न हुए. यूरोप में भारतीय अंकों का वास्तविक प्रचार स्पेन पर अरबों का अधिकार होने के बाद अरबों के द्वारा ही हुआ. इसीसे यूरोप के वर्तमान अंकों को 'अरेबिक (अरबों के) अंक' कहते हैं. *ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२६.

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है कि 'हिंदूलोग अपनी वर्णमाला के अक्षरों को अंकों के स्थान में काम में नहीं लाते जैसे कि हम हिब्रू वर्णमाला के क्रम से अरबी अक्षरों को काम में लाते हैं. हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों में जैसे अक्षरों की आकृतियां भिन्न हैं वैसे ही संख्यासूचक चिह्नों की भी, जिनको अंक कहते हैं, भिन्न हैं. जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं.…जिन भिन्न भिन्न जातियों से मेरा संपर्क रहा उन सबकी भाषाओं के संख्यासूचक क्रम के नामों (इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि) का मैंने अध्ययन किया है जिससे मालूम हुआ कि कोई जाति हज़ार से आगे नहीं जानती. अरब लोग भी हज़ार तक [नाम] जानते हैं…इस विषय में मैंने एक अलग पुस्तक लिखा है. अपने अंकक्रम में जो हज़ार से अधिक जानते हैं वे हिंदू हैं. …वे संख्यासूचक क्रम को १८ वें स्थान तक ले जाते हैं…जिसको 'परार्द्ध' कहते हैं. ……अंकगणित में हिंदू लोग अंकों का उसी तरह प्रयोग करते हैं जैसे कि हम करते हैं. मैंने एक पुस्तक लिख कर यह बतलाया है कि इस विषय में हिंदू हमसे कितने आगे बढ़े हुए हैं'१.

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अलबेरूनी का, जो अरबों तथा हिंदुओं के ज्योतिष और गणितशास्त्र का अपूर्व ज्ञाता था और जिसने कई बरस तक हिंदुस्तान में रहकर संस्कृत पढ़ा था इतना ही नहीं किंतु जो संस्कृत में अनुष्टुभ् छंद भी बना लेता था और जिसको इस देश का व्यक्तिगत अनुभव था, यह कथन कि 'जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं,' मि. के के विचार में ठीक न जचा परंतु १५ वीं शताब्दी के आसपास के शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र के ज्ञाता फ़ीरोज़ अबदी का, जो गणितशास्त्र का ज्ञाता न था, 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' शब्द से बतलाना ठीक जच गया जिसका कारण यही है कि पहिले का लेख मि. के के विरुद्ध और दूसरे का अनुकूल था. 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेज़ी विश्वकोष की १७ वीं जिल्द के ६२६ वें पृष्ठ पर नानाघाट के लेख के, भारतीय गुफ़ाओं के लेखों के और १० वीं शताब्दी के नागरी के अंक दिये हैं और उनके नीचे ही शीराज़ में लिखी हुई १० वीं शताब्दी की एक अरबी पुस्तक के भी अंक दिये हैं जो वस्तुतः प्राचीन नागरी ही हैं; उनमें केवल ४ के अंक को टेढ़ा और ७ को उलटा लिखा है बाक़ी कोई अंतर नहीं है. अरबी, फ़ारसी और उर्दू तक के अंक, उन लिपियों की लेखनशैली तथा सेमेटिक अंकों के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर न लिखे जा कर हिंदू रीति से ही बाईं ओर से दाहिनी ओर अब तक लिखे जाते हैं. ऐसी दशा में अलबेरूनी और मि. के में से किसका कथन यथार्थ है यह पाठक लोग स्वयं जान सकेंगे.

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