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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s3: शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s3

Language
Hindi

शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली

c25.s3.1

आर्य लोगों में वेदमंत्रों में स्वरों की अशुद्धि यजमान के लिये नाश का हेतु मानी जाती थी इस लिये वेदों का पठन गुरु के मुख से ही होता था और वे रट रट कर स्वरसहित कंठस्थ किये जाते थे (देखो, ऊपर पृ. १३-१४). उसी की देखादेखी और शास्त्र भी कंठस्थ किये जाने लगे और मुखस्थ विद्या ही विद्या मानी जाने लगी. इसी लिये सूत्रग्रंथों की संक्षिप्त शैली से रचना हुई कि वे आसानी से कंठ किये जा सकें और इसी लिये ज्योतिष, गणित, वैद्यक और कोश आदि के ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे जाने लगे. अन्य विषय के ग्रंथों में तो अंकों का विशेष काम नहीं रहता था परंतु ज्योतिष और गणित संबंधी ग्रंथों में लंबी लंबी संख्याओं को

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१ सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७४, १७७.

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श्लोकों में लाने में कठिनता रहती थी जिसको सरल करने के लिये संभवतः उक्त शास्त्रों के आचार्यों ने संख्यासूचक सांकेतिक शब्द स्थिर किये हों. ये सांकेतिक शब्द मनुष्य के अंग, छंदों अथवा उनके चरणों के अक्षर, देवता, साहित्य के अंग, ग्रह, नक्षत्र आदि एवं संसार के अनेक निश्चित पदार्थों की संख्या पर से कल्पित किये गये हैं. प्रत्येक नाम के लिये संस्कृत भाषा में अनेक शब्द होने से प्रत्येक संख्या के लिये कई शब्द मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं—

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०=शून्य, ख, गगन, आकाश, अंबर, अभ्र, वियत, व्योम, अंतरिक्ष, नभ, पूर्ण, रंध्र आदि.

१=आदि, शशि, इंदु, विधु, चंद्र, शीतांशु, शीतरश्मि, सोम, शशांक, सुधांशु, अब्ज, भू, भूमि, क्षिति, धरा, उर्वरा, गो, वसुंधरा, पृथ्वी, क्ष्मा, धरणी, वसुधा, इला, कु, मही, रूप, पितामह, नायक, तनु आदि.

२=यम, यमल, अश्विन, नासत्य, दस्र, लोचन, नेत्र, अक्षि, दृष्टि, चक्षु, नयन, ईक्षण, पक्ष, बाहु, कर, कर्ण, कुच, ओष्ठ, गुल्फ, जानु, जंघा, द्वय, द्वंद्व, युगल, युग्म, अयन, कुटुंब, रविचंद्रौ आदि.

३=राम, गुण, त्रिगुण, लोक, त्रिजगत्, भुवन, काल, त्रिकाल, त्रिगत, त्रिनेत्र, सहोदराः, अग्नि, वह्नि, पावक, वैश्वानर, दहन, तपन, हुताशन, ज्वलन, शिखिन, कृशानु, होतृ आदि.

४=वेद, श्रुति, समुद्र, सागर, अब्धि, जलधि, उदधि, जलनिधि, अंबुधि, केंद्र, वर्ण, आश्रम, युग, तुर्य, कृत, अय, आय, दिश् ( दिशा ) बंधु, कोष्ठ, वर्ष आदि.

५=बाण, शर, सायक, इषु, भूत, पर्व, प्राण, पांडव, अर्थ, विषय, महाभूत, तत्त्व, इंद्रिय, रत्न आदि.

६=रस, अंग, काय, ऋतु, मासार्ध, दर्शन, राग, अरि, शास्त्र, तर्क, कारक आदि.

७=नग, अग, भूभृत्, पर्वत, शैल, अद्रि, गिरि, ऋषि, मुनि, अत्रि, वार, स्वर, धातु, अश्व, तुरग, वाजि, छंद, धी, कलत्र, आदि.

८=वसु, अहि, नाग, गज, दंति, दिग्गज, हस्तिन, मातंग, कुंजर, द्विप, सर्प, तक्ष, सिद्धि, भूति, अनुष्टुभ्, मंगल आदि.

९=अंक, नंद, निधि, ग्रह, रंध्र, छिद्र, द्वार, गो, पवन आदि.

१०=दिश, दिशा, आशा, अंगुलि, पंक्ति, ककुभ, रावणशिरम्, अवतार, कर्मन् आदि.

११=रुद्र, ईश्वर, हर, ईश, भव, भर्ग, शूलिन्, महादेव, अक्षौहिणी आदि.

१२=रवि, सूर्य, अर्क, मार्तंड, द्युमणि, भानु, आदित्य, दिवाकर, मास, राशि, व्यय आदि.

१३=विश्वेदेवाः, काम, अतिजगती, अघोष आदि.

१४=मनु, विद्या, इंद्र, शक्र, लोक आदि.

१५=तिथि, घस्र, दिन, अहन्, पक्ष आदि.

१६=नृप, भूप, भूपति, अष्टि, कला आदि.

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| १७ = अत्यष्टि. | १८ = धृति. | १९ = अतिधृति. | २० = नख, कृति. |
| २१ = उत्कृति, प्रकृति, स्वर्ग. | २२ = कृती, जाति. | २३ = विकृति. |
| २४ = गायत्री, जिन, अर्हत, सिद्ध आदि. | २५ = तत्त्व. | २७ = नक्षत्र, उडु, भ आदि. |
| ३२ = दंत, रद आदि. | ३३ = देव, अमर, त्रिदश, सुर आदि. |
| ४० = नरक. | ४८ = जगती. | ४९ = तान. |

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इस प्रकार शब्दों से अंक बतलाने की शैली बहुत प्राचीन है. वैदिक साहित्य में भी कभी कभी इस प्रकार से अंक बतलाने के उदाहरण मिल आते हैं जैसे कि शतपथ१ और तैत्तिरीय२ ब्राह्मणों में ४ के लिये ‘कृत’ शब्द, कात्यायन३ और लाट्यायन४ श्रौतसूत्रों में २४ के लिये ‘गायत्री’ और ४८ के लिये ‘जगती’ और वेदांग ज्योतिष में १, ४, ८, १२ और २७ के लिये क्रमशः ‘रूप’, ‘अघ’, ‘गुण’, ‘युग’ और ‘भसमूह’ शब्दों का प्रयोग मिलता है५. पिंगल के छंदःसूत्र६ में तो कई जगह अंक इस तरह दिये हुए हैं. ‘मूलपुलिशसिद्धांत’७ में भी इस प्रकार के अंक होना पाया जाता है. वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’८ (ई. स. ५०५), ब्रह्मगुप्त के ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’९ (ई. स. ६२८), लल्ल के ‘शिष्यधीवृद्धिद’१० (ई. स. ६३८ के आस पास) में तथा ई. स. की सातवीं शताब्दी के पीछे के ज्योतिष के आचार्यों के ग्रंथों में हज़ारों स्थानों पर शब्दों से अंक बतलाये हुए मिलते हैं और अब तक संस्कृत, हिंदी, गुजराती आदि भाषाओं के कवि कभी कभी अपने ग्रंथों की रचना का संवत् इसी शैली से देते हैं. प्राचीन शिलालेखों११ तथा ताम्रपत्रों१२ में भी कभी कभी इस शैली से दिये हुए अंक मिल आते हैं.

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२ ये वै चत्वारः सोमाः कृतं तत् (तै. ब्रा; १. ५. ११. १).

c25.s3.8

५ रूपोनं षड्गुणीकृतम् (याजुष, २३; आर्च, ३१); द्विगुणं चाघसंयुक्तम् (याजुष, १२; आर्च, ४); अविष्टाभ्यो गुणाभ्यस्तान् (आर्च, १६) युगलक्ष्णं सपंर्व स्यात् (याजुष, २५); विभज्य भसमूहेन (याजुष, २०).

c25.s3.9

६ समुद्रर्तुस्वराः (मंदाक्रांता की यति). आदित्यऋषयः (शार्दूलविक्रीडित की यति). शरऋषिरसाः (सुवदना की यति). वसुग्रहऋषयः (भुजंगविजृंभित की यति).—पिंगलछंदःसूत्र.

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७ देखो, ऊपर पृ. ११६ टि. ७.

c25.s3.11

८ देखो, ऊपर पृ. ११६ टि. *.

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१० देखो, ऊपर पृ. ११७. टि. †.

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११ वसुनव[अ]ष्टौ वर्षा गतस्य कालस्य विक्रमस्य (धौलपुर से मिले हुए चाहमान चंडमहासेन के वि. सं. ८९८ के शिलालेख से (इं. ऐं; जि. १९, पृ. ४५).

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१२ गिरिरसवसुसंख्याब्दे एकसमये (पूर्वी चालुक्य अम्म दूसरे के समय के श. सं. ८६७ के दानपत्र से; इं. ऐं. जि. ७, पृ. १६).

c25.s3.15

मि. के ने ‘भारतीय गणितशास्त्र’ नामक अपने पुस्तक में लिखा है कि ‘शब्दों से अंक प्रकट करने की शैली, जो असाधारण रूप से लोकप्रिय हो गई और अब तक प्रचलित है, ई. स. की नवीं शताब्दी के आसपास संभवतः पूर्व की ओर से [इस देश में] प्रवृत्त हुई’ (पृ. ३१). मि. के का यह कथन भी सर्वथा विश्वास योग्य नहीं है क्योंकि वैदिक काल से लगा कर ई. स. की सातवीं शताब्दी तक के संस्कृत पुस्तकों में भी इस शैली से दिये हुए अंकों के हज़ारों उदाहरण मिलते हैं. यदि मि. के ने वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ को ही पढ़ा होता तो भी इस शैली के असंख्य उदाहरण मिल आते.