भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s3.6
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s3.6
- Language
- Hindi
c25.s3.6
इस प्रकार शब्दों से अंक बतलाने की शैली बहुत प्राचीन है. वैदिक साहित्य में भी कभी कभी इस प्रकार से अंक बतलाने के उदाहरण मिल आते हैं जैसे कि शतपथ१ और तैत्तिरीय२ ब्राह्मणों में ४ के लिये ‘कृत’ शब्द, कात्यायन३ और लाट्यायन४ श्रौतसूत्रों में २४ के लिये ‘गायत्री’ और ४८ के लिये ‘जगती’ और वेदांग ज्योतिष में १, ४, ८, १२ और २७ के लिये क्रमशः ‘रूप’, ‘अघ’, ‘गुण’, ‘युग’ और ‘भसमूह’ शब्दों का प्रयोग मिलता है५. पिंगल के छंदःसूत्र६ में तो कई जगह अंक इस तरह दिये हुए हैं. ‘मूलपुलिशसिद्धांत’७ में भी इस प्रकार के अंक होना पाया जाता है. वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’८ (ई. स. ५०५), ब्रह्मगुप्त के ‘ब्रह्मस्फुटसिद्धांत’९ (ई. स. ६२८), लल्ल के ‘शिष्यधीवृद्धिद’१० (ई. स. ६३८ के आस पास) में तथा ई. स. की सातवीं शताब्दी के पीछे के ज्योतिष के आचार्यों के ग्रंथों में हज़ारों स्थानों पर शब्दों से अंक बतलाये हुए मिलते हैं और अब तक संस्कृत, हिंदी, गुजराती आदि भाषाओं के कवि कभी कभी अपने ग्रंथों की रचना का संवत् इसी शैली से देते हैं. प्राचीन शिलालेखों११ तथा ताम्रपत्रों१२ में भी कभी कभी इस शैली से दिये हुए अंक मिल आते हैं.