भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c27.25
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c27.25
- Language
- Hindi
c27.25
इसके प्रचार का कोई पता नहीं चलता. शिवाजी ने जब अपना नया राज्य स्थापित किया तब नागरी को अपनी राजकीय लिपि बनाया परंतु उसके प्रत्येक अक्षर के ऊपर सिर की लकीर बनाने के कारण कुछ कम त्वरा से वह लिखी जाती थी इस लिये उसको त्वरा से लिखी जाने के योग्य बनाने के विचार से शिवाजी के चिटनीस१ ( मंत्री, सरिश्तेदार ) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़ ( तोड़ मरोड़ ) कर नई लिपि तय्यार की जिससे इसको 'मोड़ी' कहते हैं. पेशवाओं के समय में बिवलकर नामक पुरुष ने उसमें कुछ और फेर फार कर अक्षरों को अधिक गोलाई दी२. यह लिपि सिर के स्थान में लंबी लकीर खींच कर लिखी जाती है और बहुधा एक अथवा अधिक शब्द या सारी पंक्ति चलती कलम से लिखी जाती है. इसमें 'इ', तथा 'इ' और 'उ' की मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है और न हलंत व्यंजन हैं. इसके अक्षरों में से 'इ' और 'ज' गुजराती के उक्त अक्षरों के समान हैं. 'ख', 'प', 'ब' और 'र' प्राचीन तेलुगु-कनड़ी के उक्त अक्षरों से लिये हों ऐसा पाया जाता है. 'ट' और 'ठ' के रूप एकसा हैं; उनके बीच का भेद बतलाने के लिये 'ठ' के बीच में एक बिंदी लगाई जाती है. अ, उ, क, ञ, य, ल, व, स और ह के रूपों में नागरी से अधिक अंतर पड़ा है. बाकी के अक्षर नागरी से मिलते जुलते ही हैं. बंबई इहाते की मराठी की प्रारंभिक पाठशालाओं में इसकी छपी हुई लिथो की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. इसका प्रचार महाराष्ट्र देश की कचहरियों में है और मराठी बोलनेवाले बहुधा पत्रव्यवहार या हिसाब में इसे काम में लाते हैं. बंबई इहाते के बाहर के मरहटों के राज्यों में भी इसका कुछ कुछ प्रचार है. राजपूताने में इस लिपि में खुदे हुए दो शिलालेख भी देखने में आये जो मरहटों के समय के ही हैं.