भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c27: २१—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c27
- Language
- Hindi
२१—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियां
c27.1
२ इन लेखों के लिये देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ७, ६; और पृ. ३३, टि. १, २.
c27.2
(लिपिपत्र ७७ से ८१).
c27.3
भारतवर्ष की समस्त वर्तमान आर्य लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि ही है. ये भिन्न भिन्न लिपियां किन किन परिवर्तनों के बाद बनीं यह लिपिपत्र १ से ६४ तक में दी हुई भिन्न भिन्न लिपियों से मालूम हो सकता है. उन सब में नागरी सार्वदेशिक है और बहुधा सारे भारतवर्ष में उसका प्रचार बना हुआ है इतना ही नहीं किंतु यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान आदि में जहां जहां संस्कृत का पठनपाठन होता है वहां के संस्कृतज्ञ लोगों में भी उसका आदर है. हिंदी, मराठी तथा संस्कृत के पुस्तक उसीमें छपते हैं. बाकी की लिपियां एकदेशिक हैं और भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों में से किसी न किसी में उनका प्रचार है.
c27.4
१ देखो, ऊपर पृ. १२८.
c27.5
लिपिपत्र ७७ वां.
c27.6
इस लिपिपत्र में शारदा (कश्मीरी), टाकरी और गुरुमुखी (पंजाबी) लिपियां तथा उनके अंक दिये गये हैं.
c27.7
**शारदा लिपि—**कश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी शारदा मानी जाती है जिससे वह देश 'शारदादेश' या 'शारदामंडल' कहलाता है और उसीपर से वहां की लिपि को 'शारदा लिपि' कहते हैं. पीछे से उसको 'देवादेश'३ भी कहते थे. मूल शारदा लिपि ई. स. की दसवीं शताब्दी के आस पास 'कुटिल लिपि' से निकली और उसका प्रचार कश्मीर तथा पंजाब में रहा. उसीमें परि-वर्तन होकर वर्तमान शारदा लिपि बनी जिसका प्रचार अब कश्मीर में बहुत कम रह गया है. उसका स्थान बहुधा नागरी, गुरुमुखी या टाकरी ने ले लिया है.
c27.8
३ फो.; पँ. चं. स्टे.; पृ. ४३, ४७.
c27.9
**टाकरी लिपि—**यह शारदा का घसीट रूप है, क्योंकि इसके इ, ई, उ, ए, ग, घ, च, ञ, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, भ, म, य, र, ल और ह अक्षर वर्तमान शारदा के उक्त अक्षरों से मिलते
c27.10
जुलते हैं. बाकी के अक्षरों में जो अंतर है वह विशेष कर त्वरा से तथा चलती कलम से पूरा अक्षर लिखने से ही हुआ है. 'ख' के स्थान में 'ष' लिखा जाता है. जंबू तथा पंजाब के सारे उत्तरी पहाड़ी प्रदेश में (शायद शिमले ज़िले को छोड़कर१) इसका प्रचार है और यह भिन्न भिन्न विभागों में कुछ कुछ भिन्नता से लिखी जाती है. जो जंबू के इलाके में प्रचलित है उसको 'डोगरी' और जो चंबा राज्य में लिखी जाती है उसको 'चमियाली' कहते हैं. जब महाजन आदि मामूली पढ़े हुए लोग, जिनको स्वरों की मात्रा तथा उनके ह्रस्व दीर्घ का ज्ञान नहीं होता, इसको लिखते हैं तब कभी कभी स्वरों की मात्राएं या तो नहीं लगाई जातीं या उनके स्थान पर मूल स्वर भी लिख दिये जाते हैं. इसीसे टाकरी का पढ़ना बाहरवालों के लिये बहुत कठिन होता है और जो शिलालेख इस समय उसमें खोदे जाते हैं उनका पढ़ना भी बहुधा कठिन होता है. 'टाकरी' नाम की उत्पत्ति का ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि 'ठाकुरी' (ठक्कुरी) शब्द से उसकी उत्पत्ति हो अर्थात् राजपूत ठाकुरों (ठक्कुरों) की लिपि; अथवा टांक (तवाण) जाति के व्योपारियों की लिपि होने के कारण इसका नाम टाकरी हुआ हो.
c27.11
गुरुमुखी लिपि—पंजाब के महाजनों तथा अन्य मामूली पढ़े हुए लोगों में पहिले एक प्रकार की 'लंडा' नाम की महाजनी लिपि प्रचलित थी, जिसमें सिंधी की नांई स्वरों की मात्राएं लगाई नहीं जाती थीं और जो अब तक वहां पर कुछ कुछ प्रचलित है. ऐसा कहते हैं कि सिक्खों के धर्मग्रंथ पहिले उसी लिपि में लिखे जाते थे जिससे वे शुद्ध पढ़े नहीं जाते थे, इसलिये गुरु अंगद (ई. स. १५३८-५२) ने अपने धर्मग्रंथों की शुद्धता के लिये स्वरों की मात्रावाली नई लिपि, जिसमें नागरी के समान शुद्ध लिखा और पढ़ा जावे, बनाई, जिससे उसको 'गुरुमुखी' अर्थात् 'गुरु के मुख से निकली हुई' लिपि कहते हैं. इसके अधिकतर अक्षर उस समय की शारदा लिपि से ही लिये गये हैं क्योंकि उ, ऋ, ओ, घ, च, छ, ट, ड, ढ, त, थ, द, ध, प, फ, भ, म, य, श, ष और स अक्षर अब तक वर्तमान शारदा से मिलते जुलते हैं. इसके अंक नागरी से लिये गये हैं. सिक्खों के धर्मग्रंथ इसीमें लिखे और छापे जाते हैं इतना ही नहीं किंतु नागरी के साथ साथ इसका प्रचार पंजाब में बढ़ रहा है.
c27.12
१ फो; ऐं. बं. सो; पृ. ४७.
c27.13
लिपिपत्र ७८ वां.
c27.14
इस लिपिपत्र में वर्तमान कैथी, बंगला और मैथिल लिपियां तथा उनके अंक दिये गये हैं.
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कैथी लिपि—यह लिपि वास्तव में नागरी का किंचित् परिवर्तित रूप ही है. कायस्थ (कायथ) अर्थात् अहल्कार लोगों की त्वरा से लिखी जानेवाली लिपि होने से इसको 'कैथी' (कायथी) कहते हैं. जैसे मामूली पढ़े हुए लोगों की लिपियों में संस्कृत की पूरी वर्णमाला का उपयोग नहीं होता वैसे ही इसमें भी ऋ, ङ और ञ अक्षर नहीं है, और व तथा 'ब' में अंतर नहीं है. 'व' को 'ब' से भिन्न बतलाने के लिये टाइप के अक्षरों में 'व' के नीचे एक बिंदी लगाई जाती है. अ, ख और झ नागरी से भिन्न हैं जिनमें से 'अ' तो नागरी के 'अ' को चलती कलम से लिखने में ऊपर ग्रंथि बन जाने के कारण 'अ' सा बन गया है और 'ख' नागरी के 'ष' का विकार मात्र है. पहिले यह लिपि गुजराती की नांई लकीर खींच कर लिखी जाती थी परंतु टाइप में सरलता के विचार से सिरसूचक लकीर मिटा दी गई है. बिहार की पाठशालाओं में नीचे की श्रेणियों में इस लिपी की छुपी हुई पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. देशभेद के अनुसार इसके मुख्य तीन भेद हैं अर्थात् मिथिला, मगध और भोजपुर की कैथी.
c27.16
बंगला लिपि—बंग ( बंगाल ) देश की लिपि होने के कारण इसको बंगला कहते हैं. प्राचीन बंगला लिपि प्राचीन पूर्वी नागरी से निकली है (देखो, ऊपर पृ. ४३) और उसीमें परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी. इस लिपि में नागरी के समान अक्षर पूर्ण हैं और इसका साहित्य भारतवर्ष की सब भाषाओं के साहित्य से बढ़ा हुआ है जिसका कारण यही है कि भारतवर्ष में सर्वोर अंग्रेजी का राज्य सब से पहिले बंगाल में हुआ जिससे विद्या का सूर्य वहां सबसे पहिले फिर उदय हुआ. यह लिपि सारे बंगाल और आसाम में प्रचलित है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसमें छपने लग गये थे परंतु अब वे बहुधा नागरी में ही छपते हैं. बंगभाषा के पुस्तक आदि ही इसमें छपते हैं.
c27.17
मैथिल लिपि—मिथिला (तिरहुत) देश के ब्राह्मणों की लिपि, जिसमें संस्कृत ग्रंथ लिखे जाते हैं, ‘मैथिल’ कहलाती है. यह लिपि वस्तुतः बंगला का किंचित् परिवर्तित रूप ही है और इसका बंगला के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि कैथी का नागरी से है. मिथिला प्रदेश के अन्य लोग नागरी या कैथी लिखते हैं.
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लिपिपत्र ७६ वां.
c27.19
इस लिपिपत्र में उड़िया, गुजराती और मोडी ( मराठी ) लिपियां दी गई हैं.
c27.20
उड़िया लिपि—उड्र (उड़्रिया वा उड़ीसा ) देश की प्रचलित लिपि को उक्त देश के नाम पर से उड़िया कहते हैं. यह लिपि पुरानी बंगला से निकली हो ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि इसके अधिकतर अक्षर हन्नाकोल के लेख के अक्षरों से मिलते हुए हैं और ए, ऐ, ओ और औ तो वर्तमान बंगला ही हैं. इस लिपि के अक्षर सरसरी तौर से देखनेवालों को विलक्षण मालूम देंगे परंतु इस विलक्षणता का मुख्य कारण कुछ तो अक्षरों को चलनी कलम से लिखना और कुछ उनके गोलाईदार लंबे सिर ही हैं जिनका दाहिनी ओर का अंश नीचे को झुका हुआ रहता है. ये सिर भी बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पंडिघी और कामरूप के वैद्यदेव के दान-पत्रों में मिलनेवाले [Character: inverted arc / curve] ऐसे सिरों ( देखो, लिपिपत्र ३३ ) के परिवर्द्धित रूप या विकास मात्र हैं. इन सिरों को हटा कर देखा जावे तो मूल अक्षर बहुत ही सरल हैं. इस लिपि में स्वरों की मात्राओं के चिह्न भी बंगला शैली के ही हैं.
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गुजराती लिपि—गुजरात देश में प्रचलित होने के कारण इसको गुजराती कहते हैं. सारे गुजरात, काठियावाड़ और कच्छ में इसका प्रचार है. काठियावाड़ के हालार विभाग के बहुत से लोगों की भाषा कच्छी से मिलती हुई हालारी है और कच्छवालों की कच्छी है परंतु उन लोगों की लिपि गुजराती ही है. यह लिपि भी कैथी की नांई नागरी का किंचित् विकृत रूप ही है. अ, इ, ख, च, ज, झ, फ और ब ये आठ अक्षर त्वरा से लिखे जाने के कारण नागरी से अब भिन्न बन गये हैं. उनमें से ‘ख’ तो ‘ष’ से बना है और ‘इ’ तथा ‘झ’ जैन शैली की नागरी से लिये हैं. इन आठों अक्षरों का विकासक्रम नीचे बतलाये अनुसार है—
c27.22
[Character: अ] = [Character: अ variation 1] [Character: अ variation 2] [Character: अ Gujarati].
[Character: इ] = [Character: इ variation 1] [Character: इ variation 2] [Character: इ Gujarati].
[Character: ख] = [Character: ष] [Character: ष variation] [Character: ख variation] [Character: ख Gujarati].
[Character: च] = [Character: च variation 1] [Character: च variation 2] [Character: च variation 3] [Character: च Gujarati].
[Character: ज] = [Character: ज variation 1] [Character: ज variation 2] [Character: ज variation 3] [Character: ज Gujarati].
[Character: झ] = [Character: झ variation 1] [Character: झ variation 2] [Character: झ variation 3] [Character: झ Gujarati].
[Character: फ] = [Character: फ variation 1] [Character: फ variation 2] [Character: फ variation 3] [Character: फ Gujarati].
[Character: ब] = [Character: ब variation 1] [Character: ब variation 2] [Character: ब variation 3] [Character: ब Gujarati].
c27.23
गुजराती लिपि के अक्षर पहिले सिर की लकीर खींच कर लिखे जाते थे और व्यौपारी लोग अब तक अपनी बहियों तथा पत्रों में वैसे ही लिखते हैं, परंतु टाइप बनानेवालों ने सरलता के लिये सिरों के चिह्न मिटा दिये तब से वे बिना लकीर भी लिखे जाते हैं.
c27.24
मोड़ी लिपि—इसकी उत्पत्ति के विषय में पूना की तरफ़ के कोई कोई ब्राह्मण ऐसा प्रसिद्ध करते हैं कि हेमाडपंत अर्थात् प्रसिद्ध हेमाद्रि पंडित ने इसको लंका से लाकर महाराष्ट्र देश में प्रचलित किया, परंतु इस कथन में कुछ भी सत्यता नहीं पाई जाती क्योंकि प्रसिद्ध शिवाजी के पहिले
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इसके प्रचार का कोई पता नहीं चलता. शिवाजी ने जब अपना नया राज्य स्थापित किया तब नागरी को अपनी राजकीय लिपि बनाया परंतु उसके प्रत्येक अक्षर के ऊपर सिर की लकीर बनाने के कारण कुछ कम त्वरा से वह लिखी जाती थी इस लिये उसको त्वरा से लिखी जाने के योग्य बनाने के विचार से शिवाजी के चिटनीस१ ( मंत्री, सरिश्तेदार ) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़ ( तोड़ मरोड़ ) कर नई लिपि तय्यार की जिससे इसको 'मोड़ी' कहते हैं. पेशवाओं के समय में बिवलकर नामक पुरुष ने उसमें कुछ और फेर फार कर अक्षरों को अधिक गोलाई दी२. यह लिपि सिर के स्थान में लंबी लकीर खींच कर लिखी जाती है और बहुधा एक अथवा अधिक शब्द या सारी पंक्ति चलती कलम से लिखी जाती है. इसमें 'इ', तथा 'इ' और 'उ' की मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद नहीं है और न हलंत व्यंजन हैं. इसके अक्षरों में से 'इ' और 'ज' गुजराती के उक्त अक्षरों के समान हैं. 'ख', 'प', 'ब' और 'र' प्राचीन तेलुगु-कनड़ी के उक्त अक्षरों से लिये हों ऐसा पाया जाता है. 'ट' और 'ठ' के रूप एकसा हैं; उनके बीच का भेद बतलाने के लिये 'ठ' के बीच में एक बिंदी लगाई जाती है. अ, उ, क, ञ, य, ल, व, स और ह के रूपों में नागरी से अधिक अंतर पड़ा है. बाकी के अक्षर नागरी से मिलते जुलते ही हैं. बंबई इहाते की मराठी की प्रारंभिक पाठशालाओं में इसकी छपी हुई लिथो की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं. इसका प्रचार महाराष्ट्र देश की कचहरियों में है और मराठी बोलनेवाले बहुधा पत्रव्यवहार या हिसाब में इसे काम में लाते हैं. बंबई इहाते के बाहर के मरहटों के राज्यों में भी इसका कुछ कुछ प्रचार है. राजपूताने में इस लिपि में खुदे हुए दो शिलालेख भी देखने में आये जो मरहटों के समय के ही हैं.
c27.26
लिपिपत्र ८० वां.
c27.27
इस लिपिपत्र में तेलुगु, कनड़ी और ग्रंथ लिपियां दी गई हैं.
c27.28
तेलुगु और कनड़ी लिपियां—ये दोनों लिपिपत्र ४३ से ५१ में दी हुई प्राचीन तेलुगु-कनड़ी लिपि से निकली हैं. इनके अधिकतर अक्षर परस्पर मिलते जुलते ही हैं. केवल उ, ऊ, ऋ, क, त, स और ह में अंतर है. इन दोनों लिपियों में 'ए' और 'ओ' के ह्रस्व तथा दीर्घ, दो दो भेद हैं. नागरी लिपि में यह भेद न होने से हमने दीर्घ 'ए' और दीर्घ 'ओ' के लिये नागरी के 'ए' और 'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनका भेद बतलाया है. तेलुगु लिपि का प्रचार मद्रास इहाते के पूर्वी समुद्रतट के हिस्से, हैदराबाद राज्य के पूर्वी तथा दक्षिणी हिस्सों एवं मध्यप्रदेश के सब से दक्षिणी हिस्से में है. कनड़ी लिपि का प्रचार बहुधा सारे मैसोर राज्य, कुर्ग, नीलगिरि प्रदेश, मैसोर के निकट के पश्चिमी घाट प्रदेश और बंबई इहाते के दक्षिणी कोने ( बीजापुर, बेलगांव तथा धारवाड़ जिलों और उत्तरी कनड़ा प्रदेश ) में है. 'तेलुगु' नाम की उत्पत्ति संभवतः 'त्रिलिंग' ( तिलिंग, तिलिंगाना ) देश के नाम पर से हो; और कनड़ी की कन्नड ( प्राचीन 'कर्णाट' ) देश के नाम से है.
c27.29
१ चिटणीस ( चिटनवीस )=चिट्ठी नवीस, जैसे कि फडणीस ( फडनवीस )=फर्द नवीस.
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ग्रंथ लिपि—दक्षिण के जिन हिस्सों में तामिल लिपि, जिसमें अक्षरों की न्यूनता के कारण संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, प्रचलित है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इस लिपि में लिखे जाते हैं. इसीसे इसको ग्रंथ लिपि ( संस्कृत ग्रंथों की लिपि ) कहते हैं. यह लिपि लिपिपत्र ५२ से
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२ इं. ऐं.; जि. ३४, पृ. २७८.
c27.32
५६ तक में दी हुई प्राचीन ग्रंथ लिपि से निकली है. पहिले संस्कृत पुस्तक भी इसी लिपि में छपने लग गये थे परंतु अब बहुधा नागरी में छपने लगे हैं.
c27.33
लिपिपत्र ८१ वां.
c27.34
इस लिपिपत्र में मलयाळम्, तुळु और तामिळ लिपियां दी गई हैं.
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**मलयाळम् लिपि**—मलयाळम् अर्थात् केरल देश की लिपि होने से इसको मलयाळम् या केरल लिपि कहते हैं. यह लिपि ग्रंथ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर घसीट रूप में भी ग्रंथ लिपि से मिलते हुए हैं. इसका प्रचार दक्षिणी कनड़ा प्रदेश के दक्षिणी विभाग, सारे मलबार और कोचीन एवं त्रावनकोर राज्य के अधिकतर हिस्से (त्रिवेंद्रम् से उत्तर के) में है. तामिळ भाषा बोलनेवाले बहुधा संस्कृत पुस्तक लिखने में ग्रंथ लिपि की नांईं इसका प्रयोग करते हैं.
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**तुळु लिपि**—ग्रंथ लिपि से निकली हुई मलयाळम् लिपि का ही यह किंचित् परिवर्तित रूप है. इस लिपि का प्रचार दक्षिणी कनड़ा प्रदेश के तुळु भाषाभाषी लोगों में संस्कृत ग्रंथ लिखने में ही है.
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**तामिळ लिपि**—यह लिपि लिपिपत्र ६०-६२ में दी हुई प्राचीन तामिळ लिपि से बनी है. ‘तामिळ’ शब्द की उत्पत्ति देश और जातिसूचक ‘द्रमिळ’ (द्रविड़) शब्द से हुई है. तामिळ भाषा आर्य लोगों की संस्कृत भाषा से बिलकुल भिन्न है तो भी उसके अक्षर आर्य लिपियों से ही लिये गये हैं (देखो, ऊपर पृ. ४४, ६५). इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ होने से संस्कृत भाषा इस में लिखी नहीं जा सकती इसलिये संस्कृत शब्दों का जहां प्रयोग होता है वहां वे ग्रंथ लिपि में लिखे जाते हैं. इसमें ‘ए’ और ‘ओ’ के दो दो रूप अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. ६७). इसका प्रचार मद्रास इहाते के, मद्रास से कुछ ऊपर तक के, दक्षिणपूर्वी हिस्से अर्थात् उत्तरी आर्कट, चिंग्लेपट, दक्षिणी आर्कट, सलेम्, कोईम्बाटोर, त्रिचिनापोली, तंजौर, मदुरा और तिन्नवेल्लि ज़िलों एवं त्रावनकोर राज्य के दक्षिणी अंश (त्रिवेंद्रम् से नीचे नीचे) और पदुदुकोटा राज्य में है.