भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s16.2
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s16.2
- Language
- Hindi
c30.s16.2
के लिये पीपल की लाख को, जो अन्य वृक्षों की लाख से उत्तम समझी जाती है, पीस कर मिट्टी की हंडिया में रक्खे हुए जल में डाल कर उसे आग पर चढ़ाते हैं. फिर उसमें सुहागा और लोध पीस कर डालते हैं. उबलते उबलते जब लाख का रस पानी में यहां तक मिल जाता है कि काग़ज़ पर उससे गहरी लाल लकीर बनने लगती है तब उसे उतार कर छान लेते हैं. उसको अलता ( अलक्तक ) कहते हैं. फिर तिलों के तेल के दीपक के कज्जल को महीन कपड़े की पोटली में रख कर अलते में उसे फिराते जाते हैं जब तक कि उससे सुंदर काले अक्षर बनने न लग जावें. फिर उसको दवात (मसीभाजन) में भर लेते हैं. राजपूताने के पुस्तकलेखक अब भी इसी तरह पक्की स्याही बनाते हैं. संभव है कि ताड़पत्र के पुस्तक भी पहिले ऐसी ही स्याही से लिखे जाते हों.