भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s3.1
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s3.1
- Language
- Hindi
c30.s3.1
यह माना जाता है कि पहिले पहिल चीनवालों ने ई. स. १०५२० में कागज़ बनाया, परंतु उससे ४३२ वर्ष पूर्व अर्थात् ई. स. पूर्व ३२७ में, निआर्कस, जो सिकंदर बादशाह के साथ हिंदुस्तान में आया था, अपने व्यक्तिगत अनुभव से लिखता है कि 'हिंदुस्तान के लोग रुई को कूट कर लिखने के लिये कागज़ बनाते हैं'३०. इससे स्पष्ट है कि ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में भी यहांवाले रुई या चीथड़ों से कागज़ बनाते थे, परंतु हाथ से बने हुए कागज़ सस्ते और सुलभ नहीं हो सकते. यहां पर ताड़पत्र और भूर्जपत्र (भोजपत्र) की बहुतायत होने और नाममात्र के मूल्य से उनके बहुत मिल जाने से कागज़ों का प्रचार कम ही होना संभव है. यूरोप के बने हुए सस्ते और सुंदर कागज़ों के प्रचार के पहिले भी इस देश में चीथड़ों से कागज़ बनाने के कई कारखाने थे और अब भी हैं परंतु यहां के बने कागज़ चिकने न होने से पुस्तक लिखने की पक्की स्याही उनमें और पार फैल जाती थी. इस लिये उनपर गेहूं या चावल के आटे की पतली लेई लगा कर उनको सुखा देते थे जिससे वे करड़े पड़ जाते थे. फिर शंख आदि से घोटने से वे चिकने और कोमल हो जाते