भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s4: रूई का कपड़ा
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s4
- Language
- Hindi
रूई का कपड़ा
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रूई का कपड़ा जिसको 'पट' कहते हैं प्राचीन काल से लिखने के काम में कुछ कुछ आता था और अब तक भी आता है. उसे भी कागजों की तरह पहिले आटे की पतली लेई लगा कर सुखाते हैं, फिर शंख आदि से घोट कर चिकना बनाते हैं तब वह लिखने के काम में आता है. जैनों के मंदिरों की प्रतिष्ठा के समय अथवा उत्सवों पर रंगीन चावल आदि अन्नों से जो भिन्न भिन्न मंडल बनाये जाते हैं उनके पटों पर बने हुए रंगीन नक्शों का संग्रह जैन मंदिरों या उपासरों में पुस्तकों के साथ जगह जगह मिलता है५. ब्राह्मणों के यहां 'सर्वतोभद्र,' 'लिंगतोभद्र' आदि
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५ अजमेर के बीसपंथी आम्नाय के बड़े धड़े के दिगंबर जैन मंदिर में २० से अधिक पट रक्खे हुए हैं, जिनपर ढाई द्वीप, तीन लोक, तेरह द्वीप, जंबू द्वीप आदि के विवरणसहित रंगीन चित्र हैं; उनमें से कितने एक पुराने और कुछ नये हैं. सब से छोटा १ फुट ५½ इंच लंबा और उतना ही चौड़ा, और सबसे बड़ा १५½ फुट लंबा और ५ फुट ७½ इंच चौड़ा है. कितने ही अन्य स्थानों में भी ऐसे अनेक पट देखने में आये हैं.
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मंडलों के पट्ट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के पुराने सैंकड़ों कड़िते श्रृंगेरी के मठ में मिले हैं१ जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-पत्रों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित, १३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है२. कपड़े के पन्ने बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.
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१ माइसोर राज्य की आर्किआलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट, ई. स. १६१६, पृ. १८.
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२ पी. पीटरसन की बंबई इहाते के संस्कृत पुस्तकों की खोज की पांचवीं रिपोर्ट, पृ. ११३.