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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s4.3

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s4.3

Language
Hindi

c30.s4.3

मंडलों के पट्ट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के पुराने सैंकड़ों कड़िते श्रृंगेरी के मठ में मिले हैं१ जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-पत्रों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित, १३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है२. कपड़े के पन्ने बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.