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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s8.29

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s8.29

Language
Hindi

c30.s8.29

६ प्राग्वाट (पोरवाड़) श्रेष्ठी (सेठ) लोलाक (लोलिग) ने वीजोल्यां (मेवाड़ में) के निकट के जैन मंदिर के पास के एक चट्टान पर ‘उन्नतशिखरपुराण’ नामक दिगंबर जैन पुस्तक वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) में खुदवाया जो अब तक विद्यमान है. बीजोल्यां के विद्यानुरागी स्वर्गीय राव कृष्णसिंह ने उसपर तथा उसके पास के दूसरे चट्टान पर खुदे हुए उक्त जैन मंदिर के संबंध के ही विशाल लेखपर भी (जो उसी संवत् का है और जिसमें चाहमान से लगाकर सोमेश्वर तक की सांभर और अजमेर के चौहानों की पूरी वंशावली और लोलाक के वंश का वर्णन है) मेरे आग्रह से पक्के मकान बनवा कर उनकी रक्षा का सुप्रबंध कर दिया है. चौहान राजा विग्रहराज (वीसलदेव) के बनाये हुए ‘हरकेलिनाटक’ की दो शिला, सोमेश्वर कविरचित ‘ललितविग्रहराजनाटक’ की दो शिला तथा चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की पहिली शिला, ये पांचों अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े से (जो प्रारंभ में वीसलदेव की बनाई हुई पाठशाला थी) मिलीं हैं और इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खी हुई हैं. मालवे के प्रसिद्ध विद्वान् राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो प्राकृत काव्य (एं. इं; जि. ८, पृ. २४३—६०) और राजकवि मदनरचित ‘पारि- जातमंजरी(विजयश्री)नाटिका’—एं. इं; जि. ८, पृ. ९०१—१७, ये तीनों पुस्तक धार (मालवे में) में कमल मौला नामक स्थान (जो पहिले राजा भोज की बनवाई हुई ‘सरस्वतीकंठाभरण’ नामक पाठशाला थी) से शिलाओं पर खुदे हुए मिले हैं. मेवाड़ के महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) ने कीर्तिस्तंभों के विषय का कोई पुस्तक शिलाओं पर खुदवाया था जिसकी पहिली शिला का प्रारंभ का अंश चित्तोड़ के क़िले से मिला जिसको मैंने वहां से उठवा कर उदयपुर के विक्टोरिआ हाल के म्यूज़ियम् में रखवाया है. मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (प्रथम) ने, तैलंग भट्ट मधुसूदन के पुत्र रणछोड़ भट्ट रचित ‘राजप्रशस्ति’ नामक २५ सर्गों का महाकाव्य बड़ी बड़ी २४ शिलाओं पर खुदवाकर अपने बनवाये हुए ‘राजसमुद्र’ नामक विशाल तालाब के सुंदर बंद पर २४ ताकों में लगवाया जो अब तक वहां पर सुरक्षित है.

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