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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30.s8: पत्थर

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30.s8

Language
Hindi

पत्थर

c30.s8.1

ताड़पत्र, भूर्जपत्र (भोजपत्र) या काग़ज़ पर लिखा हुआ लेख बहुत काल तक बचा नहीं रहता इस लिये जिस घटना की यादगार चिरस्थायी करना होता उसको लोग पत्थर पर खुदवाते थे और अब भी खुदवाते हैं. ऐसे लेख चट्टान, स्तंभ, शिला, मूर्तियों के आसन या पीठ, पत्थर के पात्रों या उन- के ढक्कनों पर खुदे हुए मिलते हैं. पत्थर पर खुदे हुए लेखों को 'शिलालेख,' और जिनमें राजाओं आदि का प्रशंसायुक्त वर्णन होता है उनको 'प्रशस्ति' कहते हैं. जिस आधार पर लेख खुदवाना होता वह यदि समान और चिकना न हो तो पहिले टांकियों से छील कर उसे समान बनाते फिर पत्थर आदि से घोंटकर वह चिकना बनाया जाता था१. जिस आशय का लेख लिखना होता उसकी रचना कोई कवि, विद्वान्, राजकीय अधिकारी१० या अन्य पुरुष करता. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक२ एक एक अथवा दो दो पंक्तियां स्याही से पत्थर पर लिखता और उनको कारीगर (सूत्रधार) खोदता जाता था. इस प्रकार क्रमशः सारा पत्थर खोदा जाता४. इस प्रकार से तैयार किये जाते हुए शिलालेख मैंने स्वयं देखे हैं. लिखने के पूर्व पंक्तियां सीधी लाने के लिये यदि पत्थर अधिक लंबा होता तो सूत की पतली डोरी को गेरू में भिगो कर उससे पंक्तियों के निशान बनाते, जैसे कि लकड़ी के लट्ठे को चीर कर तख्ते निकालनेवाले खाती लोग लट्ठे पर बनाते हैं, और पत्थर कम लंबाई का होता तो गज़ या लकड़ी की पट्टी रख कर उसके सहारे टांकी आदि से लकीर का निशान बना लेते. मंदिर, बावड़ी आदि की भींतों में लगाये जानेवाले लेख पत्थर की छोटी बड़ी पट्टियों (शिलाओं) पर खुदवाये जाकर बहुधा ताकों में, जो पहिले बना लिये जाते थे, लगाये जाते थे. ऐसे लेखों के चारों ओर पुस्तकों के पन्नों की नांई हाशिया छोड़ा जाता था. कभी कभी खोदे जानेवाले स्थान के चारों ओर लकीरें५ खुदी हुई मिलती हैं. कभी वह स्थान पाव इंच से एक इंच या उससे भी अधिक खोद कर हाशिये से नीचा६ किया हुआ मिलता है. अधिक सावधानी से खुदवाये हुए लेखों में कभी पत्थर की चटक उड़ गई तो उसमें पत्थर के रंग की मिश्रधातु भर कर उस स्थान को समान बनाते थे और यदि अक्षर का कोई अंश चटक के साथ उड़ जाता तो उसको पीछा उस धातु पर खोद लेते थे७. बहुधा शिलालेखों के प्रारंभ में और कभी अंत में कोई मंगल सूचक सांकेतिक चिह्न८, शब्द८ या किसी देवता के प्रणामसूचक

c30.s8.2

१ यह हाल सावधानी के साथ तय्यार किये हुए लेखों का है. कई लेख खरदरे पत्थरों पर बेपरवाही के साथ खोदे हुए भी मिलते हैं.

c30.s8.3

१० जिन शिलालेखों में राजा की तरफ़ की किसी आज्ञा आदि का उल्लेख होता उन्हें राजकर्मचारी ही तय्यार करते थे.

c30.s8.4

२ लेखक बहुधा ब्राह्मण, कायस्थ, जैन साधु या सूत्रधार (सिलावट) लोग होते थे.

c30.s8.5

४ हिंदुओं के शिलालेखों के अक्षर पत्थर के भीतर बांदे जाते हैं परंतु मुसलमानों के अरबी या फारसी के लेखों के अक्षर उभड़े हुए होते हैं और पत्थर का वह अंश जहां पर अक्षर नहीं होता टांकियों से तोड़कर उड़ा दिया जाता है. कोई कोई हिंदू मुसल्मानों का अनुकरण कर उभड़े हुए अक्षरवाले लेख भी बनाने लग गये परंतु ऐसे लेख बहुत ही कम मिलते हैं. अब तक ऐसे केवल दो ही लेख मेरे देखने में आये हैं. एक तो मथुरा के म्यूज़िअम में और दूसरा बाड़ी(धौलपुर राज्य में) में. वे दोनों मुसल्मानों के समय के हैं.

c30.s8.6

५ अशोक के गिरनार के लेख की १४ धर्माज्ञाओं में से प्रत्येक के चारों ओर लकीरें खुदी हुई हैं. वि. सं. १३७३ (ई. स. १३१६) के लाडनू (जोधपुर राज्य में) से मिले हुए लेख (जो राजपूताना म्यूज़िअम, अजमेर, में रक्खा हुआ है) के चारों ओर लकीरें हैं (पें. इं; जि. १२, पृ. २४ के पास का प्लेट)

c30.s8.7

६ वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०९६ (ई. स. १०४२) के लेख का, जो राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खा हुआ है, खुदा हुआ अंश हाशिये से करीब पाव इंच नीचा है और वहीं रक्खे हुए अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के दो शिलालेखों का खुदा हुआ अंश प्रायः एक इंच नीचा है. उनमें से एक (खंडित) परमार राजा चामुंडराज के समय का वि. सं. ११५७ (ई. स. ११०१) का और दूसरा परमार राजा विजयराज के समय का वि. सं. ११६६ (ई. स. १११०) का है.

c30.s8.8

७ राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) रचित 'हरकेलिनाटक,' की तथा सोमेश्वर पंडितरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो दो शिलाएं रक्खी हुई हैं. इन चारों शिलाओं में कई जगह धातु भरी हुई है और कहीं उसपर अक्षर का अंश भी खुदा हुआ है.

c30.s8.9

८ चिह्नों में स्वस्तिक (आ. स. स. ई; जि. १, प्लेट ६६; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ५, ६, ७, ९, ११, १३, १४ आदि), चक्र (धर्मचक्र) पर रहा हुआ त्रिशूल (त्रिरत्न; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ८, १०, १५ आदि), 'ॐ' का सांकेतिक चिह्न (देखो, लिपिपत्र १६, २१, २३ आदि के साथ दी हुई मूल पंक्तियों के आरंभ में) तथा कई अन्य चिह्न मिलते हैं जिनका आशय ठीक ठीक ज्ञात नहीं हुआ (आ. स. वे. इं; जि ४, सेट ४४, भाजा का लेख ७; सेट ४५, कूडा के लेख १, ६, १६; प्लेट ४६, कूडा के लेख २०, २२, २७, २६).

c30.s8.10

८ शब्दों में 'सिद्धम्' (पें. इं; जि. १२, पृ. १२० के पास का प्लेट, लिपिपत्र ७, ६, ११, १२, १५ आदि के साथ दी हुई मूलपंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘स्वस्ति’ ( लिपिपत्र १७ की मूलपंक्तियों के प्रारंभ में ‘ओं’ के सांकेतिक चिह्न के बाद ), ‘हरिः ओम् स्वस्ति श्रीः’ ( ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास का सेट ) आदि.

c30.s8.11

शब्द१ मिलते हैं. वर्तमान लेखनशैली के अनुसार उनमें पदच्छेद अर्थात् प्रत्येक शब्द का अलग अलग लिखना नहीं मिलता परंतु पंक्ति की पंक्ति बिना स्थान छोड़े लिखी जाती थी. कभी कभी शब्द अलग अलग भी लिखे मिलते हैं२ परंतु किसी नियम से नहीं. विराम के चिह्नों के लिये केवल एक और दो खड़ी लकीरों (दंड) का बहुधा प्रयोग होता था३. श्लोकार्ध बतलाने अथवा शब्दों या वाक्यों को अलग करने के लिये एक, और श्लोकांत या विषय की समाप्ति के लिये दो खड़ी लकीरें बहुधा बनाई जाती थीं४. कहीं कहीं प्रत्येक पंक्ति में आधा या एक श्लोक ही लिखा हुआ मिलता५ है और कभी कविताबद्ध लेखों में श्लोकांक भी पाये जाते हैं६. कभी अंत में अथवा एक विषय की समाप्ति पर कमल७, फूल८, वृत्त९ या कोई अन्य चिह्न१० भी खोदा जाता था. लेखक जब

c30.s8.12

१ ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमः शिवाय’ ( लिपिपत्र २१ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमो विष्णवे’ ( लिपिपत्र २३ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘नमो अरहंतो वर्धमानस्र्य’ ( लिपिपत्र ५ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) ओं नमो वीतरागाय’ ( राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खे हुए परमार राजा विजयराज के समय के वि. सं. ११६६ के शिलालेख के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमो बुद्धाय’ ( ऍ. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का सेट ), ‘ओं नमो रत्नत्रयाय’ ( शेरगढ का लेख; इं. ऍ; जि. १४, पृ. ४५ ) आदि. लेखों के अंत में कभी कभी ‘श्रीः’, ‘शुभं भवतु’, ‘श्रीरस्तु’ आदि शब्द मिलते हैं और कभी कभी ‘॥ छ ॥’ लिखा हुआ मिलता है. यह ‘छ’ प्राचीन ‘थ’ अक्षर का रूपांतर प्रतीत होता है जो वास्तव में धर्मचक्र या सूर्य का सूचक होना चाहिये.

c30.s8.13

२ अशोक के देहली ( ई. ऍ; जि. १३, पृ. ३०६ से ३१० के बीच के सेट; जि. १६, पृ. १२२ और १२४ के बीच के सेट ), रधिया, मथिया, रामपुरवा ( ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८ से २५२ के बीच के सेट ), पदेरिया, निग्लीवा ( ऍ. इं; जि ५, पृ. ४ के पास का सेट ) और सारनाथ ( ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का सेट ) के स्तंभों के लेखों; खालसी के चट्टान की १ से ६ तक की धर्मज्ञाओं ( ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५० और ४५६ के बीच के दो सेट ), एवं कितने एक अन्य लेखों में ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५२, लेखसंख्या ५, १०, १८, १६; सेट ५३, लेखसंख्या १३, १४; सेट ५४, लेखसंख्या ११; सेट ५६, लेखसंख्या ४; ऍ. इं; जि. ८, पृ. १७६ के पास का सेट, लेख e ) शब्दों या समासवाले शब्दों के बीच स्थान छोड़ा हुआ मिलता है.

c30.s8.14

३ इन विरामचिह्नसूचक लकीरों के लिये कोई निश्चित नियम नहीं था. कहीं बिना आवश्यकता के लगाई जाती थीं और कहीं आवश्यकता होने पर भी छोड़ दी जाती थीं. कहीं लेख की प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में ( वेरावल से मिले हुए वलभी संवत् ६२७ के लेख में प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में दो दो खड़ी लकीरें हैं; ऍ. इं; जि. ३, पृ. ३०६ के पास का सेट ) और कहीं अंत में भी ( अजमेर म्यूज़िअम में रक्खी हुई चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला की बहुधा प्रत्येक पंक्ति के अंत में एक या दो खड़ी लकीरें हैं ) ऐसी लकीरें बिना आवश्यकता के मिलती हैं.

c30.s8.15

४ इन विरामसूचक लकीरों में भी अक्षरों की नांई सुंदरता लाने का यत्न करना पाया जाता है. कहीं खड़ी लकीर के स्थान में अर्धवृत्त, कहीं उनके ऊपर के भाग में गोलाई या सिर की सी आड़ी लकीर और कहीं मध्य में आड़ी लकीर लगी हुई मिलती है.

c30.s8.16

५ मौखरी अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख की प्रत्येक पंक्ति में आधा ( फ़्ली; गु. इं; सेट ३१ A ) और अजंटा की गुफा के एक लेख ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५६, लेखसंख्या ४ ) तथा गुलवाड़ा के पास की गुफा के घटोत्कच के लेख ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ६० ) में एक एक श्लोक ही खुदा है.

c30.s8.17

६ समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए लेख के श्लोकबद्ध अंश में ( फ़्ली; गु. इं; सेट १ ) तथा ग्वालिश्रर से मिलें हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के शिलालेख ( आ. स. इं; ई. स. १८०३-४, प्लेट ७२ ) में श्लोकांक दिये हैं.

c30.s8.18

७ जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार राजा बाउक के लेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम ( अजमेर ) में रक्खा हुआ है, संवत् के पूर्व कमल खुदा है.

c30.s8.19

८ चाहमान विग्रहराज के हर्षनाथ के लेख की ३३ वीं पंक्ति में विषय की समाप्ति पर फूल खुदा है ( ऍ. इं; जि. २, पृ. १२० के पास का सेट ).

c30.s8.20

९ परतावगढ़ ( राजपूताने में ) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरे ) के समय के वि. सं. १००३ ( ई. स. ९४६ ) के शिलालेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम ( अजमेर ) में रक्खा हुआ है, १४ वीं और ३० वीं पंक्तियों में वृत्त ( O ) बने हुए हैं.

c30.s8.21

१० वसंतगढ़ ( सिरोही राज्य में ) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ ( ई. स. १०४२ ) के शिलालेख के अंत में, तथा ऊपर दो जगह भिन्न भिन्न प्रकार के चिह्न बने हुए हैं. कितने एक लेखों के ऊपर के खाली हिस्सों में शिवलिंग, नंदी, वत्ससहित गौ, सूर्य या चंद्र आदि के चित्र भी खुदे मिलते हैं.

c30.s8.22

किसी अक्षर या शब्द को भूल से छोड़ जाता तो वह अक्षर या शब्द या तो पंक्ति के ऊपर या नीचे अथवा हाशिये पर लिखा जाता था और कभी वह अक्षर या शब्द किस स्थान पर चाहिये था यह बतलाने के लिये ^ या × चिह्न भी मिलता है जिसको ‘काकपद’ या ‘हंसपद’ कहते हैं१. भूल से अधिक लिखा हुआ अक्षर, शब्द, मात्रा या अनुस्वार आदि या तो टांकी से उड़ा दिया जाता या उस पर छोटी छोटी खड़ी या तिरछी लकीर या लकीरें२ बना कर उसे काट दिया जाता था. कई लेखों के अंत में उनके लगाये जाने या उनसे संबंध रखनेवाले स्थानों के बनने का संवत्, ऋतु, मास, दिन, पक्ष, तिथि आदि३ एवं उनके रचयिता, लेखक और खोदनेवालों के नाम भी दिये हुए मिलते हैं४. मंदिर आदि की दीवारों के ताकों में लगाये जानेवाले लेख बहुधा एक ही छोटी या बड़ी शिला पर खुदे हुए होते हैं परंतु कभी पांच तक पर भी खुदे हुए मिलते हैं५. ये लेख प्राकृत, संस्कृत, कनड़ी, तेलुगु, तामिळ, प्राचीन हिंदी आदि भाषाओं में हैं.

c30.s8.23

१ बुद्धगया से मिले हुए अशोकचल्ल के लक्ष्मणसेन संवत् ५१ के लेख की पहिली पंक्ति में ‘तथागतो द्यवदत्’ में ‘वो’ लिखना रह गया जिसको पंक्ति के ऊपर लिखा है और नीचे ^ चिह्न बनाया है (एं. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का प्लेट). वि. सं. १२०७ की महाबन की प्रशस्ति की ८ वीं पंक्ति में ‘तस्याभूत्तनयो नयोन्नतमतिः’ में दूसरा ‘नयो’ लिखना रह गया जिसको पंक्ति के नीचे लिखा है. उसी प्रशस्ति की ११ वीं पंक्ति में [८ वें] श्लोक का चतुर्थ चरण लिखना रह गया, जो बाईं ओर के हाशिये पर लिखा गया है और जहां वह चाहिये था उस स्थान पर पंक्ति के ऊपर () चिह्न किया है. ऐसे ही उसी प्रशस्ति की २० वीं पंक्ति में [१७ वां] श्लोक रह गया वह भी बाईं ओर के हाशिये पर लिखा है और जहां वह चाहिये था वहां पंक्ति के ऊपर × चिह्न किया है और वही चिह्न हाशिये पर (अंत में) दिया है (एं. इं; जि. २, पृ. २७६ के पास का प्लेट).

c30.s8.24

२ बिल्हारी के लेख की पहिली पंक्ति [श्लोक १] में पहिले ‘० तोरगपतिः प्रस्फार०’ खुदा था परंतु पीछे से ‘०पीतः’ का विसर्ग टांकी से उड़ा दिया है तो भी नीचे की विंदी का कुछ अंश दीखता है (एं. इं; जि. १, पृ. २५४ के पास का प्लेट). उसी लेख की पांचवीं पंक्ति [श्लोक ६] में ‘लीलोल्लालितशार्वपर्वतपते०’ खुदा था परंतु पीछे से ‘शार्व’ के ‘शा’ के साथ लगी हुई ‘आ’ की मात्रा की सूचक खड़ी लकीर को तिरछी लकीर से काट दिया है. कणस्वा के लेख की १६ वीं पंक्ति में ‘यति- हीनंमथशब्दहीनं’ खुदा था परंतु पीछे से ‘मथ’ के दोनों अक्षरों के ऊपर पांच पांच छोटी खड़ी लकीरें बना कर उन्हें काट दिया है (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).

c30.s8.25

३ कहीं पुराने लेखों में संवत् के साथ ऋतु और दिन (‘कनिष्कस्य सं ४ हे १ दि १’—एं. इं; जि. १, पृ. ३८१); कहीं ऋतु, मास और दिन (‘संवत्सरे पंचविशे हेमंतमसे त्रितिये दिवस वीशे’—एं. इं; जि. १, पृ. ३८४); कहीं मास, पक्ष और तिथि (रुद्रदाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७२ मार्गशीर्षवहुलप्रति...—एं. इं; जि. ८, पृ. ४२) मिलते हैं. कहीं संवत् के स्थान में राज्यवर्ष (सन जुलूस) भी मिलते हैं. चौथी शताब्दी के पीछे के लेखों में बहुधा संवत्, मास, पक्ष, तिथि आदि मिलते हैं.

c30.s8.26

४ अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के मंडलेसर के मंदिर में लगे हुए परमार चामुंडराज के वि. सं. ११३६ फाल्गुन सुदि ७ शुक्र वार के कविताबद्ध बड़े लेख में उसका रचयिता चंद्र, लेखक वालभ्यजाति का कायस्थ आसराज और खोद- नेवाला चामुंडक होना लिखा है.

c30.s8.27

५ कुंभलगढ़ (मेवाड़ में) के कुंभस्वामी (मामादेव) के मंदिर में लगा हुआ महाराणा कुंभकर्ण का लेख बड़ी बड़ी पांच शिलाओं पर खुदा हुआ था जिनमें से ४ के टुकड़े मिल गये हैं.

c30.s8.28

पुस्तकें भी चिरस्थायी रखने के लिये कभी कभी चट्टान या शिलाओं पर खुदवाई जाती थीं६.

c30.s8.29

६ प्राग्वाट (पोरवाड़) श्रेष्ठी (सेठ) लोलाक (लोलिग) ने वीजोल्यां (मेवाड़ में) के निकट के जैन मंदिर के पास के एक चट्टान पर ‘उन्नतशिखरपुराण’ नामक दिगंबर जैन पुस्तक वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) में खुदवाया जो अब तक विद्यमान है. बीजोल्यां के विद्यानुरागी स्वर्गीय राव कृष्णसिंह ने उसपर तथा उसके पास के दूसरे चट्टान पर खुदे हुए उक्त जैन मंदिर के संबंध के ही विशाल लेखपर भी (जो उसी संवत् का है और जिसमें चाहमान से लगाकर सोमेश्वर तक की सांभर और अजमेर के चौहानों की पूरी वंशावली और लोलाक के वंश का वर्णन है) मेरे आग्रह से पक्के मकान बनवा कर उनकी रक्षा का सुप्रबंध कर दिया है. चौहान राजा विग्रहराज (वीसलदेव) के बनाये हुए ‘हरकेलिनाटक’ की दो शिला, सोमेश्वर कविरचित ‘ललितविग्रहराजनाटक’ की दो शिला तथा चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की पहिली शिला, ये पांचों अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े से (जो प्रारंभ में वीसलदेव की बनाई हुई पाठशाला थी) मिलीं हैं और इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खी हुई हैं. मालवे के प्रसिद्ध विद्वान् राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो प्राकृत काव्य (एं. इं; जि. ८, पृ. २४३—६०) और राजकवि मदनरचित ‘पारि- जातमंजरी(विजयश्री)नाटिका’—एं. इं; जि. ८, पृ. ९०१—१७, ये तीनों पुस्तक धार (मालवे में) में कमल मौला नामक स्थान (जो पहिले राजा भोज की बनवाई हुई ‘सरस्वतीकंठाभरण’ नामक पाठशाला थी) से शिलाओं पर खुदे हुए मिले हैं. मेवाड़ के महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) ने कीर्तिस्तंभों के विषय का कोई पुस्तक शिलाओं पर खुदवाया था जिसकी पहिली शिला का प्रारंभ का अंश चित्तोड़ के क़िले से मिला जिसको मैंने वहां से उठवा कर उदयपुर के विक्टोरिआ हाल के म्यूज़ियम् में रखवाया है. मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (प्रथम) ने, तैलंग भट्ट मधुसूदन के पुत्र रणछोड़ भट्ट रचित ‘राजप्रशस्ति’ नामक २५ सर्गों का महाकाव्य बड़ी बड़ी २४ शिलाओं पर खुदवाकर अपने बनवाये हुए ‘राजसमुद्र’ नामक विशाल तालाब के सुंदर बंद पर २४ ताकों में लगवाया जो अब तक वहां पर सुरक्षित है.

c30.s8.30

अकीक, स्फटिक आदि कीमती पत्थरों पर भी खुदे हुए छोटे छोटे लेख मिले हैं १.

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