भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.1
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.1
- Language
- Hindi
c31.s14.1
१ चारण रामनाथ रत्नू ने अपने ‘इतिहास राजस्थान’ में भाटीजी (भट्टिक, भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२ दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नॉ. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था. यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव, मञ्जमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्सकिन का जैसलमेर का गजेटिअर, पृ. ६-१०, और टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.