भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14: १४—कोल्लम् (कोलंघ) संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14
- Language
- Hindi
Contents
- c31.s14.7 — 4 parts
१४—कोल्लम् (कोलंघ) संवत्
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१ चारण रामनाथ रत्नू ने अपने ‘इतिहास राजस्थान’ में भाटीजी (भट्टिक, भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२ दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नॉ. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था. यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव, मञ्जमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्सकिन का जैसलमेर का गजेटिअर, पृ. ६-१०, और टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.
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इस संवत् को संस्कृत लेखों में कोलंंब४ संवत् (वर्ष) और तमिळ में ‘कोल्लम् आंडु’ (कोल्लम्=पश्चिमी, और आंडु = वर्ष) अर्थात् पश्चिमी [भारत का] संवत् लिखा है. यह संवत् किसने और किस घटना की यादगार में चलाया इस विषय में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता. इसके वर्षों को कभी ‘कोल्लम् वर्ष’ और कभी ‘कोल्लम के उद्भव से वर्ष’ लिखते हैं, जिससे अनुमान होता है कि भारत के पश्चिमी तट पर के मलबार प्रदेश के कोल्लम् (क्विलोन, ट्रावनकोर राज्य
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४ श्रीमत्कोलंघवर्षे भवति गुरुमणीश्रेणिरादित्यवर्मा वञ्चीपालो (इं. पँ; जि. २, पृ. ३६०).
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में) नामक प्राचीन नगर से१, जिसको संस्कृत लेखक 'कोलंबपत्तन'२ लिखते हैं, संबंध रखनेवाली किसी घटना से यह संवत् चला हो३. मलबार के लोग इस को 'परशुराम का संवत्' कहते हैं तथा १००० वर्ष का चक्र, अर्थात् १००० वर्ष पूरे होने पर वर्ष फिर १ से प्रारंभ होना, मानते हैं और वर्तमान चक्र को चौथा चक्र बतलाते हैं परंतु ई. स. १८२५ में इस संवत् या चक्र के १००० वर्ष पूरे हो जाने पर फिर उन्होंने १ से वर्ष लिखना शुरू नहीं किया किंतु १००० से आगे लिखते चले जा रहे हैं जिससे
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१ कोल्लम् (क्विलोन) एक प्राचीन नगर और बंदरगाह है. दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर का व्यापार का प्रसिद्ध स्थान होने के कारण पहिले मिसर, यूरप, अरब, चीन आदि के व्यापारी वहां माल खरीदने को आया करते थे. ई. स. की ७वीं शताब्दी के नेस्टोरिअन पादरी जेसुजयस ने क्विलोन का उल्लेख किया है. ई. स. ८५१ के अरब लेखक ने 'कोल्लम-मल्ल' नाम से इसका उल्लेख किया है (इंपीरिअल गैज़ेटियर ऑफ़ इन्डिया, जि. २१, पृ. २२).
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२ बंबई गैज़ेटिअर, जि. १, भाग १, पृ. १८४, टिप्पण १.
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३ बर्नेल लिखता है कि 'इस संवत् का ई. स. ८२४ के सेप्टेंबर से प्रारंभ हुआ है. ऐसा माना जाता है कि यह कोल्लम् (क्विलोन) की स्थापना की यादगार में चला है' (व; सा. इं. पे; पृ. ७३), परंतु कोल्लम् शहर ई. स. ८२५ से बहुत पुराना है और ई. स. की ७ वीं शताब्दी का लेखक उसका उल्लेख करता है (देखो, इसी पृष्ठ का टिप्पण १) इस लिये ई. स. ८२४ में उसका बसाया जाना और उसकी यादगार में इस संवत् का चलाया जाना माना नहीं जा सकता. ट्र्रावनकोर राज्य के आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के सुपरिंटेंडेंट टी. ए. गोपीनाथ राव का अनुमान है कि ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो नामक ईसाई व्यापारी दूसरे ईसाइयों के साथ कोल्लम् में आया हो और उसकी यादगार में वहां के राजा ने यह संवत् चलाया हो..... [उस समय] सारा मलबार देश वस्तुतः एक ही राजा के अधीन था और यदि उसने आज्ञा दी हो कि मरुवान् सपीर ईशो के जहाज़ से कोल्लम् में उतरने के दिन से लोग अब [नया] संवत् गिना करें तो सारे मनेनाडु (मलबार) के, जिसका वह शासक था, लोगों ने अवश्य उसे शिरोधार्य किया होगा' (ट्रा. आ. सी; जि. २, पृ. ७६, ७८-७६; और ता० ८ फरवरी ई. स. १६१८ के पत्र के साथ गोपीनाथ राव का मेरे पास भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तान्त). गोपीनाथ राव का यह कथन भी ठीक नहीं कहा जा सकता.
c31.s14.7.2
उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के ईसाइयों के पास से मिले हुए चट्टेलुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम् में तिरिस्सापल्लि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था ७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६० और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लैस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्योंकि उसमें पचीस पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही मिले हुए वट्टेलुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नेल ने ई. स.
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७७४ का अनुमान किया था परंतु तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राव बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (ए. इं; जि. ४, पृ. २६३). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार के राजा चेरुमान पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन' नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अब्दुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११६, ड; क्रॉ. इं; पृ. ७४), परंतु मलबार गैज़ेटिअर का कर्ता मि. इंनेस लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं हुआ (मलबार गैज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स.
c31.s14.7.4
७८८ (विक्रम संवत् ८४५=कलियुग संवत् ३८८९*) में और देहांत ३२ वर्ष की अवस्था में (केसलोत्पत्ति के अनुसार) माना जावे तो उनका देहांत ई. स. (७८८+३२=) ८२० में होना स्थिर होता है. यह समय कोल्लम् संवत् के प्रारंभ के निकट आ जाता है परंतु ऐसा मानने के लिये मलबारवालों की जनश्रुति के सिवाय कोई अन्य प्रमाण नहीं है. ऐसी दशा में यही कह सकते हैं कि यह संवत् किसने किस घटना की याद-गार में चलाया यह अब तक अनिश्चित ही है.
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इस संवत् को १००० वर्ष का चक्र मान नहीं सकते. वीर रवि रविवर्मन् के त्रिवेंद्रम् से मिले हुए शिलालेख में कलियुग संवत् ४७०२ (वर्तमान=गत ४७०१) और कोल्लम् संवत् ७७६ दोनों लिखे हुए हैं१ जिससे भी यही पाया जाता है कि गत कलियुग संवत् और कोल्लम् संवत् के बीच का अंतर (४७०१-७७६=) ३९२५ है.
c31.s14.9
डॉ. कीलहॉर्न ने कोल्लम् संवत्वाले कई शिलालेखों में दिये हुए संवत्, संक्रांति, वार आदि को गणित से जांच कर कोल्लम् संवत् में ८२४-२५ मिलाने से ई. स. होना निश्चय किया है (ई. ऍ.; जि. २५, पृ. ५४) और दीवान बहादुर ऍल. डी. स्वामिकन्नु पिल्ले ने ई. स. में से ८२५ घटाने से कोल्लम् संवत् का बनना माना है (इंडिअन क्रॉनॉलॉजी, पृ. ४३).
c31.s14.10
यह संवत् मलबार से कन्याकुमारी तक और तिन्नवेल्लि ज़िले में अब तक प्रचलित है. उत्तरी मलबार में इसका प्रारंभ कन्या संक्रांति (सौर आश्विन) से और दक्षिणी मलबार तथा तिन्नवेल्लि ज़िले में सिंह संक्रांति (सौर भाद्रपद) से होता है. इसका वर्ष सौर है और मलबार में महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं; परंतु तिन्नवेल्लि ज़िले में उनके नाम चैत्रादि महीनों के लौकिक रूप से हैं (चैत्र को 'चित्तिरै' या 'चित्तिरै' कहते हैं). वहां का सौर चैत्र मलबार-वालों का 'मेष' है. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान ही लिखे जाते हैं. इस संवत्वाला सब से पुराना लेख कोल्लम् संवत् १४९२ का मिला है.
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२ ऍ. इं; जि. ६, पृ. २३४.