भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7
- Language
- Hindi
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३ बर्नेल लिखता है कि 'इस संवत् का ई. स. ८२४ के सेप्टेंबर से प्रारंभ हुआ है. ऐसा माना जाता है कि यह कोल्लम् (क्विलोन) की स्थापना की यादगार में चला है' (व; सा. इं. पे; पृ. ७३), परंतु कोल्लम् शहर ई. स. ८२५ से बहुत पुराना है और ई. स. की ७ वीं शताब्दी का लेखक उसका उल्लेख करता है (देखो, इसी पृष्ठ का टिप्पण १) इस लिये ई. स. ८२४ में उसका बसाया जाना और उसकी यादगार में इस संवत् का चलाया जाना माना नहीं जा सकता. ट्र्रावनकोर राज्य के आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के सुपरिंटेंडेंट टी. ए. गोपीनाथ राव का अनुमान है कि ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो नामक ईसाई व्यापारी दूसरे ईसाइयों के साथ कोल्लम् में आया हो और उसकी यादगार में वहां के राजा ने यह संवत् चलाया हो..... [उस समय] सारा मलबार देश वस्तुतः एक ही राजा के अधीन था और यदि उसने आज्ञा दी हो कि मरुवान् सपीर ईशो के जहाज़ से कोल्लम् में उतरने के दिन से लोग अब [नया] संवत् गिना करें तो सारे मनेनाडु (मलबार) के, जिसका वह शासक था, लोगों ने अवश्य उसे शिरोधार्य किया होगा' (ट्रा. आ. सी; जि. २, पृ. ७६, ७८-७६; और ता० ८ फरवरी ई. स. १६१८ के पत्र के साथ गोपीनाथ राव का मेरे पास भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तान्त). गोपीनाथ राव का यह कथन भी ठीक नहीं कहा जा सकता.
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उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के ईसाइयों के पास से मिले हुए चट्टेलुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम् में तिरिस्सापल्लि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था ७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६० और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लैस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्योंकि उसमें पचीस पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही मिले हुए वट्टेलुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नेल ने ई. स.
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७७४ का अनुमान किया था परंतु तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राव बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (ए. इं; जि. ४, पृ. २६३). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार के राजा चेरुमान पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन' नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अब्दुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११६, ड; क्रॉ. इं; पृ. ७४), परंतु मलबार गैज़ेटिअर का कर्ता मि. इंनेस लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं हुआ (मलबार गैज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स.
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७८८ (विक्रम संवत् ८४५=कलियुग संवत् ३८८९*) में और देहांत ३२ वर्ष की अवस्था में (केसलोत्पत्ति के अनुसार) माना जावे तो उनका देहांत ई. स. (७८८+३२=) ८२० में होना स्थिर होता है. यह समय कोल्लम् संवत् के प्रारंभ के निकट आ जाता है परंतु ऐसा मानने के लिये मलबारवालों की जनश्रुति के सिवाय कोई अन्य प्रमाण नहीं है. ऐसी दशा में यही कह सकते हैं कि यह संवत् किसने किस घटना की याद-गार में चलाया यह अब तक अनिश्चित ही है.