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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7.2

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7.2

Language
Hindi

c31.s14.7.2

उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के ईसाइयों के पास से मिले हुए चट्टेलुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम् में तिरिस्सापल्लि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था ७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६० और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लैस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्योंकि उसमें पचीस पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही मिले हुए वट्टेलुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नेल ने ई. स.