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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7.3

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s14.7.3

Language
Hindi

c31.s14.7.3

७७४ का अनुमान किया था परंतु तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राव बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (ए. इं; जि. ४, पृ. २६३). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार के राजा चेरुमान पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन' नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अब्दुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११६, ड; क्रॉ. इं; पृ. ७४), परंतु मलबार गैज़ेटिअर का कर्ता मि. इंनेस लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं हुआ (मलबार गैज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स.