भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s17: १७-सिंह संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s17
- Language
- Hindi
१७-सिंह संवत्
c31.s17.1
यह संवत् किसने चलाया यह अब तक निश्चित रूप से मालूम नहीं हुआ. कर्नल जेम्स टॉड ने इसका नाम ‘शिवसिंह संवत्’ लिखा है और इसको दीव बेट (काठियावाड़ के दक्षिण में) के गोहिलों का चलाया हुआ बतलाया है३. इससे तो इस संवत् का प्रवर्त्तक गोहिल शिवसिंह मानना पड़ता है. भावनगर के भूतपूर्व दीवान विजयशंकर गौरीशंकर ओझा ने लिखा है कि ‘श्रीसिंह का नाम पोरबंदर के एक लेख में मिल आता है जिसमें उसको सौराष्ट्र का मंडलेश्वर लिखा है, परंतु पीछे से उसने अधिक प्रबल हो कर विक्रम संवत् ११७० (ई. स. १११४) से अपने नाम का संवत् चलाया हो ऐसा मालूम होता है’४; परंतु पोरबंदर का वह लेख अब तक प्रसिद्धि में नहीं आया जिससे मंडलेश्वर सिंह के विषय में कुछ भी कहा नहीं जा सकता.
c31.s17.2
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी का कथन है कि ‘संभवतः ई. स. १११३-१११४ (वि. सं. ११६६-७०) में [चौतुक्य] जयसिंह (सिद्धराज) ने सोरठ (दक्षिणी काठियावाड़) के [राजा] खेंगार को विजय कर अपने विजय की यादगार में यह संवत् चलाया हो’५. परंतु यह कथन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता क्यों कि प्रथम तो ई. स. १११३-१४ में ही जयसिंह के खेंगार को विजय करने का कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि जयसिंह ने यह संवत् चलाया होता तो इसका नाम ‘जयसिंह संवत्’ होना चाहिये था न कि सिंह संवत् क्योंकि संवतों के साथ उनके प्रवर्त्तकों के पूरे नाम ही जुड़े रहते हैं. तीसरी बात यह है कि यदि यह संवत् जयसिंह ने चलाया होता तो इसकी प्रवृत्ति के पीछे के उसके एवं उसके वंशजों के शिला-लेखों तथा दानपत्रों में मुख्य संवत् यही होना चाहिये था परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि यह संवत् जयसिंह का चलाया हुआ नहीं है. काठियावाड़ से बाहर इस संवत् का कहीं प्रचार न६ होना भी यही साबित करता है कि यह संवत् काठियावाड़ के सिंह नाम के किसी राजा ने
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१ इं. ऍं.; जि. २२, पृ. १०६.
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३ कर्नल जेम्स टॉड का 'ट्रॅवल्स इन् वेस्टर्न इंडिया', पृ. ५०६ और टिप्पण †.
c31.s17.5
४ 'भावनगर प्राचीन शोध संग्रह,' भाग १, पृ. ४-५ (गुजराती) ; अंग्रेज़ी अनुवाद, पृ. २-३.
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५ बंब. गॅ.; जि. १, भाग १, पृ. १७६.
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६ गुजरात के चौलुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव के दानपत्र में, जिसमें कच्छ मंडल (कच्छ राज्य) के सहसवाणा गांव की कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, केवल 'संवत् ६३' लिखा है जिसको उसके संपादक डॉ. फ़्लीट ने सिंह संवत् अनुमान कर उक्त दानपत्र को विक्रम संवत् १२६२ या १२६३ का माना और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) का, जिसने वि. सं. १२३५ से १२६८ तक राज्य किया था, ठहरा दिया (इं. ऍं.; जि. १८, पृ. १०८-६); परंतु ऐसा करने में उक्त विद्वान् ने धोखा खाया है क्योंकि न तो वह दानपत्र भीमदेव (दूसरे) का है और न उसका संवत् ६३ सिंह संवत् है जैसा कि माना गया है. वास्तव में वह दानपत्र चौलुक्य (सोलंकी) भीमदेव (पहिले) का है और उसका संवत् वि. सं. १०६३ है परंतु शताब्दियों के अंक (१०) छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक लिखे गये हैं. ऐसा मानने का कारण यह है कि उक्त दानपत्र के छपने से १२ वर्ष पहिले डॉ. बूलर ने चौलुक्य भीमदेव (पहिले) का वि. सं. १०८६ कार्तिक शुदि १५ का दानपत्र प्रसिद्ध किया (एं. इं; जि. ६, पृ. १६३-४) जिसमें उसका लेखक कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा होना लिखा है. डॉ. फ़्लीट के प्रसिद्ध किये हुए संवत् ६३वाले दानपत्र का लेखक भी वही कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक वही महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा है इस लिये ये दोनों दानपत्र एक ही राजा के हैं यह निश्चित है. ऐसी दशा में डॉ. फ़्लीटवाले दानपत्र का संवत् ६३ विक्रम संवत् १०६३ ही है न कि १२६२ या १२६३. शिलालेख और दानपत्रों के संवतों में कभी कभी शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक दिये हुए मिलते हैं जो विद्वानों को चक्कर में डाल देते हैं. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने कोटा राज्य के अटू नामक स्थान से मिले हुए महाराजाधिराज जयसिंह के लेख में ‘संवत् १४’ खुदा हुआ होने से लिखा है कि ‘यदि यह जयसिंह चौलुक्य सिद्धराज जयसिंह है और संवत् १४ उसका चलाया हुआ संवत् [अर्थात् सिंह संवत्, जिसको जयसिंह का चलाया हुआ मान लिया है] है तो उस [लेख] का समय ई. स. ११२८ [वि. सं. ११८४] आता है. उक्त लेख का जयसिंह कोई दूसरा जयसिंह हो सकता है परंतु वह उक्त नाम के चौलुक्य राजा से पहिले का नहीं हो सकता क्यों कि अक्षरों पर से उक्त लेख का [ई. स. की] १२ वीं शताब्दी से पहिले का होना पाया नहीं जाता’ (प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ई. स. १६०३-४, पृ. ४८). अटू के लेख का संवत् भी सिंह संवत् १४ नहीं किंतु वि. सं. १३१४ होना चाहिये जिसमें भी शताब्दियों के अंक छोड़ दिये गये हैं. वह लेख या तो मालवे के महाराजाधिराज जयसिंह दूसरे (जयतुंगिदेव) का, जिसके समय का राहूटगढ़ का लेख वि. सं. १३१२ भाद्रपद शुदि ७ (की; लि. इं. नां. इं; पृ. २२, लेखसंख्या २२३) का मिला है, या उसके छोटे भाई जयवर्मन् का, जिसका दानपत्र वि. सं. १३१७ का मिला है (एं. इं; जि. ६, पृ १२०-२३), होना चाहिये. कोटा और झालावाड़ के इलाके पहिले मालवे के परमारों के अधीन थे, जिनके लेख ई. स. की ११ वीं से १३ वीं शताब्दी के वहां पर मिलते हैं. ऐसे ही उक्त विद्वान् ने जोधपुर राज्य के सेवाड़ी गांव से मिले हुए कटुकराज के समय के एक लेख का संवत् ३१ पढ़ा है और उसको सिंह संवत् मान कर विक्रम संवत् १२०० में कटुकराज का नाडोल का राजा होना माना है तथा उक्त कटुकराज को चाहमान (चौहान) अश्वराज (आशाराज) का पुत्र कटुकराज बतलाया है (एं. इं; जि. ११, पृ. ३४, ६६). वह लेख बहुत बिगड़ी हुई दशा में है इस लिये उसके शुद्ध पढ़े जाने के विषय में हमें शंका ही है. यदि उसका संवत् वास्तव में ३१ हो तो भी वह सिंह संवत् नहीं किंतु वि. सं. १२३१ होना चाहिये. क्यों कि नाडोल के चौहान के लेखों में कहीं सिंह संवत् नहीं है. अश्वराज के पुत्र कटुकराज के सेवाड़ी के दूसरे लेख में वि. सं. ११०२ (एं. इं; जि. ११, पृ. ३१-३२) ही लिखा है और वि. सं. ११८६ से १२०२ तक के कई शिलालेख चौहान राजा रायपाल के समय के नाडोल और नारलाई से मिले हैं (एं. इं; जि. ११, पृ. ३४-४३.) जिनसे पाया जाता है कि वि. सं. ११८६ से १२०२ तक नाडोल का राजा रायपाल था न कि कटुराज. ऐसी दशा में सिंह संवत् ३१ (वि. सं. १२००) में कटुराज का नाडोल का राजा होना संभव नहीं हो सकता. काठियावाड़ से संबंध न रखनेवाले लेखों में सिंह संवत् मानने की चेष्टा करने के केवल उपर्युक्त तीन ही उदाहरण अब तक मिले हैं जिनमें से एक में भी सिंह संवत् नहीं किंतु शताब्दियों के अंकसहित वि. सं. के ही वर्ष हैं.
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चलाया होगा जिसका नाम इसके साथ जुड़ा हुआ है और जैसा कि विजयशंकर गौरीशंकर ओझा का अनुमान है.
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मांगरोल की सोढडी वाव (वावड़ी) के लेख में विक्रम संवत् १२०२ और सिंह संवत् ३२ आश्विन वदि १३ सोम वार लिखा है१ जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत् के बीच का अंतर १२०२-३२=) ११७० आता है. इस हिसाब से ई. स. में से १११३-१४ घटाने से सिंह संवत् होगा.
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चौतुक्य राजा भीमदेव (दूसरे) के दानपत्र में वि. सं. १२६६ और सिंह संवत् ६६ मार्गशिर शुदि १४ गुरू वार२ लिखा है. इससे भी वि. सं. और सिंह संवत् के बीच का अंतर (१२६६-६६=) ११७० आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
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चौतुक्य अर्जुनदेव के समय के उपर्युक्त वेरावल के ४ संवत्वाले शिलालेख में वि. सं. १३२० और सिंह संवत् १५१ आषाढ कृष्ण १३३ लिखा है. उक्त लेख का विक्रम संवत् १३२०
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१ श्रीमद्विक्रमसंवत् १२०२ तथा श्रीसिंहसंवत् ३२ आश्विनवदि १३ सोमे (भावनगर प्राचीन शोध संग्रह, भाग १, पृ. ७).
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२ श्रीविक्रमसंवत् १२६६ वर्षे श्रीसिंहसंवत् ६६ वर्षे लौकि० मार्ग शुदि १४ गुरू० (एं. इं; जि. १८, पृ. ११२).
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३ देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसीका टिप्पण ४.
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कार्तिकादि१ है इस लिये चैत्रादि और आषाढादि १३२१ होगा जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत् के बीच का अंतर (१३२१-१५१=) ११७० ही आता है.
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इस संवत्वाले थोड़े से शिलालेख काठियावाड़ से ही मिले हैं और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) के उपर्युक्त वि. सं. १२६६ के दानपत्र में विक्रम संवत् के साथ सिंह संवत् दिया है जिसका कारण यही है कि वह दानपत्र काठियावाड़ में दान की हुई भूमि के संबंध का है. इस संवत् का प्रारंभ आषाढ़ शुक्ला १ (अमांत) से है और इसका सब से पिछला लेख सिंह संवत् १५१ का मिला है.
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