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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s17.7

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s17.7

Language
Hindi

c31.s17.7

६ गुजरात के चौलुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव के दानपत्र में, जिसमें कच्छ मंडल (कच्छ राज्य) के सहसवाणा गांव की कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, केवल 'संवत् ६३' लिखा है जिसको उसके संपादक डॉ. फ़्लीट ने सिंह संवत् अनुमान कर उक्त दानपत्र को विक्रम संवत् १२६२ या १२६३ का माना और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) का, जिसने वि. सं. १२३५ से १२६८ तक राज्य किया था, ठहरा दिया (इं. ऍं.; जि. १८, पृ. १०८-६); परंतु ऐसा करने में उक्त विद्वान् ने धोखा खाया है क्योंकि न तो वह दानपत्र भीमदेव (दूसरे) का है और न उसका संवत् ६३ सिंह संवत् है जैसा कि माना गया है. वास्तव में वह दानपत्र चौलुक्य (सोलंकी) भीमदेव (पहिले) का है और उसका संवत् वि. सं. १०६३ है परंतु शताब्दियों के अंक (१०) छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक लिखे गये हैं. ऐसा मानने का कारण यह है कि उक्त दानपत्र के छपने से १२ वर्ष पहिले डॉ. बूलर ने चौलुक्य भीमदेव (पहिले) का वि. सं. १०८६ कार्तिक शुदि १५ का दानपत्र प्रसिद्ध किया (एं. इं; जि. ६, पृ. १६३-४) जिसमें उसका लेखक कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा होना लिखा है. डॉ. फ़्लीट के प्रसिद्ध किये हुए संवत् ६३वाले दानपत्र का लेखक भी वही कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक वही महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा है इस लिये ये दोनों दानपत्र एक ही राजा के हैं यह निश्चित है. ऐसी दशा में डॉ. फ़्लीटवाले दानपत्र का संवत् ६३ विक्रम संवत् १०६३ ही है न कि १२६२ या १२६३. शिलालेख और दानपत्रों के संवतों में कभी कभी शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक दिये हुए मिलते हैं जो विद्वानों को चक्कर में डाल देते हैं. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने कोटा राज्य के अटू नामक स्थान से मिले हुए महाराजाधिराज जयसिंह के लेख में ‘संवत् १४’ खुदा हुआ होने से लिखा है कि ‘यदि यह जयसिंह चौलुक्य सिद्धराज जयसिंह है और संवत् १४ उसका चलाया हुआ संवत् [अर्थात् सिंह संवत्, जिसको जयसिंह का चलाया हुआ मान लिया है] है तो उस [लेख] का समय ई. स. ११२८ [वि. सं. ११८४] आता है. उक्त लेख का जयसिंह कोई दूसरा जयसिंह हो सकता है परंतु वह उक्त नाम के चौलुक्य राजा से पहिले का नहीं हो सकता क्यों कि अक्षरों पर से उक्त लेख का [ई. स. की] १२ वीं शताब्दी से पहिले का होना पाया नहीं जाता’ (प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ई. स. १६०३-४, पृ. ४८). अटू के लेख का संवत् भी सिंह संवत् १४ नहीं किंतु वि. सं. १३१४ होना चाहिये जिसमें भी शताब्दियों के अंक छोड़ दिये गये हैं. वह लेख या तो मालवे के महाराजाधिराज जयसिंह दूसरे (जयतुंगिदेव) का, जिसके समय का राहूटगढ़ का लेख वि. सं. १३१२ भाद्रपद शुदि ७ (की; लि. इं. नां. इं; पृ. २२, लेखसंख्या २२३) का मिला है, या उसके छोटे भाई जयवर्मन् का, जिसका दानपत्र वि. सं. १३१७ का मिला है (एं. इं; जि. ६, पृ १२०-२३), होना चाहिये. कोटा और झालावाड़ के इलाके पहिले मालवे के परमारों के अधीन थे, जिनके लेख ई. स. की ११ वीं से १३ वीं शताब्दी के वहां पर मिलते हैं. ऐसे ही उक्त विद्वान् ने जोधपुर राज्य के सेवाड़ी गांव से मिले हुए कटुकराज के समय के एक लेख का संवत् ३१ पढ़ा है और उसको सिंह संवत् मान कर विक्रम संवत् १२०० में कटुकराज का नाडोल का राजा होना माना है तथा उक्त कटुकराज को चाहमान (चौहान) अश्वराज (आशाराज) का पुत्र कटुकराज बतलाया है (एं. इं; जि. ११, पृ. ३४, ६६). वह लेख बहुत बिगड़ी हुई दशा में है इस लिये उसके शुद्ध पढ़े जाने के विषय में हमें शंका ही है. यदि उसका संवत् वास्तव में ३१ हो तो भी वह सिंह संवत् नहीं किंतु वि. सं. १२३१ होना चाहिये. क्यों कि नाडोल के चौहान के लेखों में कहीं सिंह संवत् नहीं है. अश्वराज के पुत्र कटुकराज के सेवाड़ी के दूसरे लेख में वि. सं. ११०२ (एं. इं; जि. ११, पृ. ३१-३२) ही लिखा है और वि. सं. ११८६ से १२०२ तक के कई शिलालेख चौहान राजा रायपाल के समय के नाडोल और नारलाई से मिले हैं (एं. इं; जि. ११, पृ. ३४-४३.) जिनसे पाया जाता है कि वि. सं. ११८६ से १२०२ तक नाडोल का राजा रायपाल था न कि कटुराज. ऐसी दशा में सिंह संवत् ३१ (वि. सं. १२००) में कटुराज का नाडोल का राजा होना संभव नहीं हो सकता. काठियावाड़ से संबंध न रखनेवाले लेखों में सिंह संवत् मानने की चेष्टा करने के केवल उपर्युक्त तीन ही उदाहरण अब तक मिले हैं जिनमें से एक में भी सिंह संवत् नहीं किंतु शताब्दियों के अंकसहित वि. सं. के ही वर्ष हैं.

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