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भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s17.2

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s17.2

Language
Hindi

c31.s17.2

डॉ. भगवानलाल इंद्रजी का कथन है कि ‘संभवतः ई. स. १११३-१११४ (वि. सं. ११६६-७०) में [चौतुक्य] जयसिंह (सिद्धराज) ने सोरठ (दक्षिणी काठियावाड़) के [राजा] खेंगार को विजय कर अपने विजय की यादगार में यह संवत् चलाया हो’५. परंतु यह कथन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता क्यों कि प्रथम तो ई. स. १११३-१४ में ही जयसिंह के खेंगार को विजय करने का कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि जयसिंह ने यह संवत् चलाया होता तो इसका नाम ‘जयसिंह संवत्‌’ होना चाहिये था न कि सिंह संवत् क्योंकि संवतों के साथ उनके प्रवर्त्तकों के पूरे नाम ही जुड़े रहते हैं. तीसरी बात यह है कि यदि यह संवत् जयसिंह ने चलाया होता तो इसकी प्रवृत्ति के पीछे के उसके एवं उसके वंशजों के शिला-लेखों तथा दानपत्रों में मुख्य संवत् यही होना चाहिये था परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि यह संवत् जयसिंह का चलाया हुआ नहीं है. काठियावाड़ से बाहर इस संवत् का कहीं प्रचार न६ होना भी यही साबित करता है कि यह संवत् काठियावाड़ के सिंह नाम के किसी राजा ने