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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s18: १८-लक्ष्मणसेन संवत्

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s18

Language
Hindi

१८-लक्ष्मणसेन संवत्

c31.s18.1

१ देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसी का टिप्पण ५.

c31.s18.2

यह संवत् बंगाल के सेनवंशी राजा बल्लालसेन के पुत्र लक्ष्मणसेन के राज्याभिषेक (जन्म)२ से चला हुआ माना जाता है.

c31.s18.3

२ ई. स. ११९८-९९ के आसपास (इं. ऐं., जि. १६, पृ. ७) देहली के गुलाम सुलतान कुतुबुद्दीन ऐबक के समय बख्तियार खिलजी ने नदिया पर चढ़ाई कर उसे ले लिया और वहां का राजा लक्ष्मणसेन भाग गया. इस चढ़ाई का वृत्तांत मिनहाज उस्सिराज (जन्म ई. स. ११९३-देहांत ई. स १२६५ के पीछे) ने ‘तबकात-इ-नासिरी’ नामक इतिहास के पुस्तक में इस तरह लिखा है कि ‘राय लखमणिया (लक्ष्मणसेन) गर्भ में था उस वक्त उसका पिता मर गया था. उसकी माता का देहांत प्रसववेदना से हुआ और लखमणिया जन्मते ही गद्दी पर बिठलाया गया. उसने ८० वर्ष राज्य किया’ (तबकात-इ-नासिरी का अंग्रेज़ी अनुवाद; मेज़र रावटी का किया हुआ; पृ. ५५५). लक्ष्मणसेन संवत् का प्रारंभ ई. स. १११६ में हुआ जैसा कि आगे लिखा गया है, इस लिये बख्तियार खिलजी की लक्ष्मणसेन पर की नदिया की चढ़ाई लक्ष्मणसेन संवत् (११६८-१११६=) ८० में हुई, जब कि लक्ष्मणसेन की उम्र ८० वर्ष की थी और उतने ही वर्ष उसको राज्य करते हुए थे. ‘लघुभारत’ नामक संस्कृत पुस्तक में लिखा है कि परंपरागत जनश्रुति से यह प्रवाद सुनने में आता है कि वल्लाल (बल्लालसेन, लक्ष्मणसेन का पिता) मिथिला की चढ़ाई में मर गया. जब ऐसा संवाद फैला उसी समय विक्रमपुर में लक्ष्मण का जन्म हुआ’ (प्रवादः श्रूयते चात्र पारम्परीणवार्त्तया। मिथिले युद्धयात्रायां वल्लालोभून्मृतध्वनिः॥ तदानीं विक्रमपुरे लक्ष्मणेा जातवानसौ। लघुभारत, खण्ड २; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६). यह कथन मिनहाज की सुनी हुई बात से मिलता जुलता ही है परंतु इससे पाया जाता है कि लक्ष्मणसेन का जन्म हुआ उस समय बल्लालसेन के मिथिला में मर जाने की खाली अफ़वाह ही उड़ी थी. संभव है कि इस अफ़वाह के उड़ने से विक्रमपुर में लक्ष्मणसेन गद्दी पर बिठला दिया गया हो और उसके जन्म की खबर पाने पर बल्लालसेन ने मिथिला में रहते समय पुत्रजन्म की खुशी में यह संवत् चलाया हो. बल्लालसेन ने शक संवत् १०६१ (ई. स. ११६६) में ‘दानसागर’ नामक ग्रंथ रचा (निखिलचक्रतिलकश्रीमद्बल्लालसेनेन। पूर्णे शशि-नवदर्शमिते शकवर्षे दानसागरो रचितः॥ दानसागर; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६, भाग १, पृ. २५). डॉ. राजेंद्रलाल मित्र ने बंगाल के सेनवंशी राजाओं के समय का निर्णय करने में दानसागर की सहायता ली और उसकी रचना का श्लोक भी टिप्पण में उद्धृत किया (पूर्गे शशिनवदशमिते शकाब्दे-ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६५, पृ. १३७) परंतु उसका अनुवाद करने में गलती की और शक संवत् १०६१ के स्थानपर १०१६ (ई. स. १०६७) लिख कर बल्लालसेन का समय ई. स. १०५६ से ११०६ तक मान लिया जो ठीक नहीं है. वल्लालसेनरचित ‘अद्भुतसागर’ नामक बड़े ग्रंथ के प्रारंभ की भूमिका में लिखा है कि ‘गौडेंद्र (बल्लालसेन) ने शक संवत् १०६० (ई. स. ११६८) में ‘अद्भुतसागर’ का प्रारंभ किया परंतु उसके समाप्त होने के पूर्व ही उसने अपने पुत्र (लक्ष्मणसेन) को राज्यसिंहासन पर बिठलाया और अपने ग्रंथ को पूर्ण करने का भार उस पर डाला. फिर गंगा में अपने दान के जल के प्रवाह से यमुना का संगम बना कर अपनी स्त्री सहित स्वर्ग को गया (अर्थात् डूब मरा) और लक्ष्मणसेन के उद्योग से ‘अद्भुतसागर’ पूर्ण हुआ’ (शाके खनवेन्दुवदेऽबारेम्भेऽद्भुतसागरं। गौडेन्द्रकुञ्जरालानस्तम्भबाहुर्महीपतिः॥ ग्रन्थेऽस्मिन्नसमाप्त एव तनयं साम्राज्यरक्षामहादीक्षापर्वणि दीक्षयन्निजकृते निष्पत्तिमन्यव्य सः। नानादानचिताम्बुसंचलनतः सूर्यीत्मजासंगमं गङ्गायां विरचय्य निर्ज-रपुरं भार्यान्वयातो गतः॥ श्रीमल्लक्ष्मणसेनभूपतिरतिश्लाघ्यो यदुद्योगतो निष्पन्नोऽद्भुतसागरः कृतिरसौ बल्लालभूमीभुजः। अद्भुतसागर). यदि लक्ष्मणसेन के जन्मसमय (ई. स. १११६ में) बल्लालसेन की अवस्था २० वर्ष की मानें तो अद्भुतसागर के प्रारंभ के

c31.s18.4

अबुलफ़ज़ल् ने 'अकबरनामे' में, तारीख इलाही के प्रसंग में लिखा है कि 'बंग (बंगाल) में लछमनसेन (लक्ष्मणसेन) के राज्य के प्रारंभ से संवत् गिना जाता है. उस समय से अब तक ४६५ वर्ष हुए हैं. गुजरात और दक्षिण में शालिवाहन का संवत् है जिसके इस समय १५०६ और मालवा तथा देहली आदि में विक्रम का संवत् चलता है जिसके १६४१ वर्ष व्यतीत हुए१ हैं'. इससे शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर (१५०६-४६५=) १०४१ आता है.

c31.s18.5

डॉ. राजेंद्रलाल मित्र को मिले हुए 'स्मृतितत्त्वामृत' नामक हस्तलिखित पुस्तक के अंत में 'ल. सं. ५०५ शाके १५४६' लिखा है२. इससे भी शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर (१५४६-५०५=) १०४१ आता है जैसा कि अबुलफ़ज़ल ने लिखा है.

c31.s18.6

नेपाल से मिले हुए 'नरपतिजयचर्या टीका' (स्वरोदयदीपिका) नामक हस्तलिखित पुस्तक के अंत में शाके १५३६ ल सं ४९४ लिखा है३. यदि यह शक संवत् वर्तमान माना जावे तो गत १५३५ होगा. इससे भी शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर अबुलफ़ज़ल् के लिखे अनुसार ही आता है.

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उपर्युक्त तीनों प्रमाणों के आधार पर शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर १०४१ होता है, परंतु तिरहुत के राजा शिवसिंहदेव के दानपत्र में, जो जाली है, ल. सं. २६३ श्रावण सुदि ७ गुरु वार लिख अंत में सन् ८०७ (? ८०१) संवत १४५५ शाके १३२१ लिखा है४, जिससे शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर (१३२१-२६३=) १०५८ आता है.

c31.s18.8

'द्विजपत्रिका' की तारीख १५ मार्च ई. स. १८६३ की संख्या में लिखा है कि 'बल्लालसेन के पीछे उनके बेटे लक्ष्मणसेन ने शक संवत् १०२८ में बंगाल के सिंहासन पर बैठ कर अपना नया शक

c31.s18.9

समय उसकी अवस्था ६७ वर्ष होनी चाहिये. ऐसी दशा में प्रारंभ किए हुए बड़े ग्रंथ को समाप्त करने की शक्ति उसमें न रही हो जिससे राजपूतों की रीति के अनुसार विस्तर में मरना पसंद न कर पूरी वृद्धावस्था में वीरता के साथ आत्मघात करना पसंद किया हो यह संभव है (गौ; सो. प्रा. इ; भाग १, पृ. ६५, टिप्पण *). उपर्युक्त दोनों ग्रंथों की रचना के श्लोकों से तो यही पाया जाता है कि ई. स. ११६६ के पीछे तक बल्लालसेन जीवित था जिसके पीछे लक्ष्मणसेन ने स्वतंत्रतापूर्वक राज्य किया हो.

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राखालदास बेनर्जी ने 'लक्ष्मणसेन' नामक लेख में (ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १६१३, पृ. २७१-८०) यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि 'लक्ष्मणसेन का राज्य ई. स. ११७० के पूर्व ही समाप्त हो चुका था, बख्तियार खिलजी की नदिया की चढ़ाई के समय वहां का राजा लक्ष्मणसेन न था, 'दानसागर' और 'अद्भुतसागर' की रचना के संवत् विषयक जो श्लोक मिलते हैं वे पिछले क्षेपक होने चाहियें, तथा 'अद्भुतसागर' की रचना के संवत् संबंधी श्लोक तो केवल एक ही प्रति में, जो डॉ. रामकृष्ण गोपाल भंडारकर को मिली, मिलते हैं'. उनके कथन का मुख्य आधार गया से मिले हुए दो शिलालेख हैं जिन में से पहिले के अंत में—'श्रीमल्लक्ष्मणसेनस्यातीतराण्ये सं ५१ भाद्रदिने २६' (ऐं. इं; जि. १२, पृ. २६) और दूसरे के अंत में—'श्रीमल्लक्ष्मणसेनदेवपादानामतीतराण्ये सं ७४ वैशाखवदि १२ गुरौ' (ऐं इं; जि. १२, पृ. ३०) लिखा है. इनमें से पहिले लेख के 'अतीतराण्ये' पद से लक्ष्मणसेन संवत् ५१ (ई. स. ११७०) से पूर्व लक्ष्मणसेन का राज्य 'अतीत' (समाप्त) हो चुका यह मान कर बख्तियार खिलजी की चढ़ाई के समय अर्थात् १२६६ (१२०० माना है) में लक्ष्मणसेन का विद्यमान न होना बतलाया है परंतु हम उक्त कथन से सहमत नहीं हो सकते क्यों कि नदिया की चढ़ाई मिन्हाज उस्सिराज की जीवित-दशा की घटना थी, उक्त चढ़ाई के पीछे वह बंगाल में रहा था और बख्तियार खिलजी के साथ रहने वालों से उसने वह हाल सुना था ऐसा वह लिखता है. ऐसे ही 'दानसागर' और 'अद्भुतसागर' में मिलनेवाले उनकी रचना के समय संबंधी श्लोकों को क्षेपक नहीं कह सकते. अद्भुतसागर की एक ही प्रति में वे श्लोक मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु राजपूताने में उसकी तीन प्रति देखने में आईं उन सब में वे श्लोक हैं. ऐसी दशा में बल्लालसेन का शक संवत् १०६१ (ई. स. ११६६) के पीछे तक जीवित रहना पाया जाता है. गया के लेखों के 'अतीतराण्ये सं' को 'अतीतराय्यसं' (जैसा कि राखालदास बेनर्जी के उक्त लेख में छुपा है, पृ. २७२, २७९) पढ़ना और 'अतीत' को 'राज्यसंवत्' का विशेषण मान कर 'गतराज्यवर्ष' अर्थ करना ही उचित है तब वे लेख लक्ष्मणसेन के राज्यत्वकाल के ही माने जा सकते हैं.

c31.s18.11

१ ज. ए सो. बंगा; जि. ५७, भाग १, पृ. १-२.

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२ नोटिसिज़ ऑफ़ संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स, जि. ६, पृ. १३.

c31.s18.13

३ हं; कं. पा; पृ. १०६.

c31.s18.14

४ इं ऐं; जि. १४. पृ. १६०, १६१.

c31.s18.15

चलाया. वह बहुत दिन तक चलता रहा और अब सिर्फ़ मिथिला में कहीं कहीं लिखा जाता है.’

c31.s18.16

ई. स. १८७८ में डॉ. राजेंद्रलाल मित्र ने लिखा कि ‘तिरहुत के पंडित इसका प्रारंभ माघ शुक्ला १ से मानते हैं. इसका प्रारंभ ई. स. ११०६ के जनवरी (वि. सं. ११६२ = श. सं. १०२७) से होना चाहिये’१.

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इन पिछले तीनों अवतरणों के अनुसार शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर १०२८ या उसके क़रीब आता है. मिथिला देश के पंचांगों में विक्रम, शक और लक्ष्मणसेन संवत् तीनों लिखे जाते हैं परंतु उनमें शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर एकसा नहीं मिलता किंतु लक्ष्मणसेन संवत् १ शक संवत् १०२६-२७, १०२७-२८, १०२६-३० और १०३०-३१ के मुताबिक आता है२.

c31.s18.18

डॉ. कीलहॉर्न ने एक शिलालेख और पांच हस्तलिखित पुस्तकों में लक्ष्मणसेन संवत् के साथ दिये हुए मास, पक्ष, तिथि और वार को गणित से जांच कर देखा तो मालूम हुआ कि गत शक संवत् १०२८ मार्गशिर सुदि १ (ई. स. ११०६ तारीख २६ अक्टोबर) को इस संवत् का पहिला दिन अर्थात् प्रारंभ मान कर गणित किया जावे तो उन ६ में से ५ तिथियों के वार ठीक मिलते हैं३ परंतु गत शक संवत् १०४१ अमांत कार्तिक शुक्ला १ (ई. स. १११९ तारीख ७ अक्टोबर) को इस संवत् का पहिला दिन मान कर गणित किया जावे तो छहों तिथियों के वार मिल जाते हैं४. ऐसी दशा में अबुलफ़ज़ल का कथन ही ठीक है. इस हिसाब से लक्ष्मणसेन संवत् में १०४०-४१ जोड़ने से गत शक संवत्, ११७५-७६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् और १११८-१६ जोड़ने से ईसवी सन् होगा.

c31.s18.19

यह संवत् पहिले बंगाल, बिहार और मिथिला में प्रचलित था और अब मिथिला में इसका कुछ कुछ प्रचार है, जहां इसका प्रारंभ माघ शुक्ला १ से माना जाता है.

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