भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s2: २—कलियुग संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s2
- Language
- Hindi
२—कलियुग संवत्
c31.s2.1
कलियुग संवत् को भारतयुद्ध संवत् और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं. इस संवत् का विशेष उपयोग ज्योतिष के ग्रंथों तथा पंचांगों में होता है तो भी शिलालेखादि में भी कभी कभी इसमें दिये हुए वर्ष मिलते हैं४. इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ३१०२ तारीख १८ फरवरी के प्रातःकाल से माना जाता है. चैत्रादि विक्रम संवत् १६७५ (गत) और शक संवत् १८४० (गत) के पंचांग में गत कलि ५०१६ लिखा है. इस हिसाब से चैत्रादि गत विक्रम संवत् में (५०१६-१६७५=) ३०४४, गत शक संवत् में (५०१६-१८४०=) ३१७६, और ई. स. में ३१०१ जोड़ने से गत कलियुग संवत् आता है.
c31.s2.2
२ कभी कभी गत वर्ष भी लिखे मिलते हैं, जैसे कि कथ्यटरचित 'देवीशतक' की टीका के अंत में यह श्लोक है—
c31.s2.3
दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशि (दूसरे) के समय के, एहोल की पहाड़ी पर के जैन मंदिर के शिलालेख में भारतयुद्ध से ३७३५ और शक राजाओं (शक संवत्) के ५५६ वर्ष बीतने पर उक्त मंदिर का बनना बतलाया है५. उक्त लेख के अनुसार भारत के युद्ध (भारत-युद्ध संवत्) और शक संवत् के बीच का अंतर (३७३५-५५६=) ३१७९ वर्ष आता है. ठीक यही अंतर कलियुग संवत् और शक संवत् के बीच होना ऊपर बतलाया गया है, अतएव उक्त लेख के अनुसार कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् एक ही हैं. भारत के युद्ध में विजयपाने से राजा युधिष्ठिर को राज्य मिला था जिससे इस संवत् को युधिष्ठिर संवत्६ भी कहते हैं. पुराणों में कलियुग का
c31.s2.4
१ श्रीनृपविक्रमादित्यराज्यस्य गताब्दाः १७१७ श्रीसप्तर्षिमते संवत् ३६ पौ [व] ति ३ रवौ तिष्यनक्षत्रे (इं. ऐं; जि. २०, पृ. १५२).
c31.s2.5
६ डॉ० कीलहॉर्न संगृहीत दक्षिण के लेखों की सूची, पृ. १६२, लेखसंख्या १०१७.
c31.s2.6
वसुमुनिगगनोदधिसमकाले याते कलेस्तथा लोके ।
द्वापञ्चाशे वर्षे रचितेयं भीमगुप्तेनृपे ॥ (इं. ऐं; जि. २०, पृ. १५४).
c31.s2.7
यहाँ पर गत कलियुग संवत् ४०७८ और लौकिक संवत् ५२ दिया है जो गत है ('याते' दोनों के साथ लगता है) क्योंकि वर्तमान ५३ में ही गत कलियुग संवत् ४०७८ आता है. परंतु ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
c31.s2.8
३ हिंदुओं की कालगणना के अनुसार कलियुग एक महायुग का १० वां अंश मात्र है. महायुग में ४ युग माने जाते हैं जिनको कृत, त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं. कलियुग ४३२००० वर्ष का, द्वापर उससे दुगुना अर्थात् ८६४००० वर्ष का, त्रेता तिगुना अर्थात् १२९६००० वर्ष का और कृत चौगुना अर्थात् १७२८००० वर्ष का माना जाता है. इस प्रकार एक महायुग, जिसको चतुर्युगी भी कहते हैं, कलियुग से १० गुना अर्थात् ४३२०००० वर्ष का माना जाता है. ऐसे ७१ महायुग का एक मन्वंतर कहलाता है. १४ मन्वंतर और ६ महायुग अर्थात् १००० महायुग (=४३२००००००० वर्ष) को एक कल्प या ब्रह्मा का दिन कहते हैं और उतने ही वर्षों की रात्री भी मानी गई है.
c31.s2.9
४ अष्टाचत्वारिंशदधिकत्रिशतो[त्त]रेषु चतुःसहस्रेषु कलियुगसंवत्सरेषु परावृत्तेषु सत्सु । स्वराज्यस्यानुभवकाले पंचमे साधारणसंवत्सरे (गोवा के कदंबवंशी राजा शिवचित्त [षष्ठदेव दूसरे] के समय के दानपत्र से. इं. ऐं; जि. १४, पृ. २६०).
c31.s2.10
५ त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः [।] सप्ताब्दशतयुक्तेषु श(ग)तेष्वब्देषु पंचसु [।।] पंचाशत्सु कलौ काले षट्सु पंचशतासु च [।] समासु समतीतासु शकानामापि भूभुजाम् (ऐं. इं.; जि. ६, पृ. ७).
c31.s2.11
प्रारंभ कृष्ण के स्वर्गारोहण१ से अर्थात् भारत के युद्ध के पीछे माना है परंतु उसको पिछले विद्वानों ने स्वीकार नहीं किया. वराहमिहिर लिखता है कि युधिष्ठिर के राज्यसमय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर थे और उस राजा का शककाल ( संवत् ) २५२६ वर्ष रहा२ अर्थात् उसके संवत् के २५२६ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला. इससे महाभारत के युद्ध का द्वापर के अंत में नहीं किंतु कलियुग संवत् के (३१७६-२५२६= ) ६५३ वर्ष व्यतीत होने पर होना मानना पड़ता है. कल्हण पंडित कश्मीर के राजाओं के राज्यसमय के विषय में लिखते हुए कहता है कि ‘द्वापर के अंत में भारत [ युद्ध ] हुआ इस दंतकथा से विमोहित हो कर कितने एक [ विद्वानों ] ने इन राजाओं का राज्यकाल गलत मान लिया है.......जब कलि के ६५३ वर्ष व्यतीत हुए तब कुरुपांडव हुए३’ अर्थात् भारत का युद्ध हुआ. यह कथन वराहमिहिर के उपर्युक्त कथन के अनुसार ही है.
c31.s2.12
पुराणों में परीक्षित के जन्म४ ( महाभारत के युद्ध ) से लगा कर महापद्म ( नंद ) के राज्याभिषेक तक १०५०५ वर्ष होना भी लिखा मिलता है. महापद्म (नंद) के वंश का राज्य १०० वर्ष तक रहा जिसके पीछे मौर्य चंद्रगुप्त ने राज्य पाया. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक ई. स. पूर्व ३२१ के आसपास होना निश्चित है अतएव पुराणों के उपर्युक्त कथनानुसार भारत युद्ध का ई. स. पूर्व ( ३२१+१००+१०५०= ) १४७१ के आस पास होना मानना पड़ता है. पुराणों में दी हुई भारत के युद्ध से लगा कर महापद्म ( नंद ) तक की वंशावलियों में मिलनेवाली राजाओं की संख्या६ देखते हुए भी यह समय ठीक प्रतीत होता है.
c31.s2.13
१ यदैव भगवद्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैव कलिरागतः ( विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५४). विष्णोर्भगवतो भानुः कृष्णाख्योऽसौ दिवं गतः । तदा विशत्कलिर्लोकं पाप यद्रमते जनः ( भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २६. ) महाभारत से पाया जाता है कि पांडवों ने विजयी होने के बाद १५ वर्ष तक तो राजा ( धृतराष्ट्र ) की आज्ञा के अनुसार सब कार्य किया. फिर भीम के वाग्बाण से खिन्न हो कर राजा विरक्त हुआ तब युधिष्ठिर स्वतंत्र राजा बना. फिर ३६ वें वर्ष कृष्ण और यादवों के स्वर्गवास की खबर आई तब परीक्षित को राज्यसिंहासन पर बिठला कर पांडवों ने द्रौपदी सहित महाप्रस्थान किया’ ( इं. पं; जि. ४०, पृ. १६३-६४ ). इस हिसाब से तो कृष्ण का स्वर्गारोहण, पांडवों का महाप्रस्थान, एवं पुराणों का कलियुग का प्रारंभ भारतयुद्ध से ( १५+३६= ) ५१ वर्ष बाद होना चाहिये.
c31.s2.14
२ आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य ( वाराही संहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३ ).
c31.s2.15
३ भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तेयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसङ्ख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४८ ॥....॥ शतेषु षट्सु सार्द्वेषु त्र्यधिकेषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन्कुरुपाण्डवाः ॥ ५१ ॥ ( राजतरंगिणी, तरंग १ ).
c31.s2.16
४ भारत का युद्ध हुआ उस समय परीक्षित गर्भ में था इसलिये उसका जन्म भारत के युद्ध की समाप्ति से कुछ ही महीनों बाद हुआ होगा.
c31.s2.17
५ महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरं ( मत्स्यपुराण, अध्याय २७३, श्लोक ३६. वायुपुराण, अ. ६६, श्लो. ४१५. ब्रह्मांडपुराण, मध्यम भाग, उपोद्घात पाद ३, अ. ७४, श्लो. २२७ ). यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचदशोत्तरं ( विष्णुपुराण, अंश ४, अ. २४, श्लो. ३२ ). आरभ्य भवतो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु शतं पंचदशोत्तरम् ( भागवत, स्कंध १२, अ. २, श्लो. २६ ). इस प्रकार परीक्षित के जन्म से लगा कर महापद्म (नंद) के राज्याभिषेक तक के वर्षों की संख्या मत्स्य, वायु और ब्रह्मांडपुराण में १०५०, विष्णु में १०१५ और भागवत में १११५ दी है. अधिकतर पुराणों में १०५० ही है जिसको हमने स्वीकार किया है.
c31.s2.18
६ चंद्रवंशी अजमीढ के पुत्र ऋक्ष का वंशज और जरासंध का पुत्र सहदेव भारत के युद्ध में मारा गया. फिर उसका पुत्र ( या उत्तराधिकारी ) सोमाधि ( सोमापि ) गिरिव्रज का राजा हुआ जिसके पीछे २१ और राजा हुए. ये २२* राजा वृहद्रथवंशी कहलाये. इस वंश के अंतिम राजा रिपुंजय को मार कर उसके मंत्री शौनक ( पुलिक ) ने अपने पुत्र प्रद्योत को राजा बनाया. प्रद्योत के वंश में ५ राजा हुए जिनके पीछे शिशुनाग वंश के १० राजा हुए. जिनमें से १०वें राजा महानंदी का
* ब्रह्मांडपुराण में बृहद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ और मत्स्य तथा वायु में ३२ दी है. विष्णु और भागवत में संख्या नहीं दी. किसी पुराण में २२ से अधिक राजाओं की नामावली नहीं मिलती इसीसे हमने बृहद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ मानी है. पुत्र महापद्म (नंद) था. इस गणना के अनुसार महाभारत के युद्ध से लगा कर महापद्म की गद्दीनशीनी तक ३७ राजा होते हैं जिनके लिये १०५० वर्ष का समय कम नहीं किंतु अधिक ही है क्योंकि औसत हिसाब से प्रत्येक राजा का राजत्व-काल २८ वर्ष से कुछ अधिक ही आता है.
c31.s2.19
'भारत युद्ध के समयसंबंधी ऊपर उद्धृत किये हुए भिन्न भिन्न मतों पर से यही कहा जा सकता है कि पहिले के कितने एक लेखकों ने कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् को एक माना है परंतु भारत का युद्ध कलियुग के प्रारंभ में नहीं हुआ.
Linked texts (10)
- Bhāgavatapurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Viṣṇupurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Brahmāṇḍapurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Rājataraṅgiṇī — Kalhaṇa, Sanskrit
- Vāyupurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Matsyapurāṇa — Vyāsa, Sanskrit
- Bṛhatsaṃhitā — Varāhamihira, Sanskrit
- Benares Bhaumayantra — Sanskrit
- Nāhāni Umarwān inscription of the reign of Jayasiṁhadeva, Vikrama 1525 — Sanskrit
- Lucknow Museum copper-plate grant of the Mahasamanta Balavarmadeva — Sanskrit