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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s22: २२—बार्हस्पत्य संवत्सर (६० वर्ष का)

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s22

Language
Hindi

२२—बार्हस्पत्य संवत्सर (६० वर्ष का)

c31.s22.1

यह बार्हस्पत्य संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है. इसमें वर्षों की संख्या नहीं किंतु १ से ६० तक के नियत नाम ही लिखे जाते हैं. मध्यम मान से बृहस्पति के एक राशि पर रहने के समय को ‘बार्हस्पत्य संवत्सर’ (वर्ष) कहते हैं५ जो ३६१ दिन, २ घड़ी और ५ पल का होता है, और सौर

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१ नक्षत्रेश सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वद्वयानुयोगीनि । क्रमशस्त्रिभं तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यं च यद्वर्षम् ॥ (वाराही संहिता; अध्याय ८, श्लोक १-२).

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२ १२ सौर वर्षों में ११ वार गुरु अस्त होकर फिर उदय होता है इसलिये १२ वर्ष में एक बार्हस्पत्य संवत्सर क्षय हो जाता है. जैसे कि पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६६५ के पंचांग में 'वर्षनाम पौष' लिखा है परंतु १६६६ के पंचांग में 'वर्षनाम फाल्गुन' लिखा है जिससे माघ (महामाघ) संवत्सर क्षय हो गया.

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३ भरतपुर राज्य के कोट नामक गांव से मिले हुए शिलालेख में 'महाचैत्र' संवत्सर (रि. रा. म्यु. अ; ई. स. १६१६-१७, पृ. २), परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६३ (ई. स. ४८२-८३) के दानपत्र में 'महाआश्वयुज' संवत्सर (त्रिषष्ट्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ महाश्वयुजसंवत्स(त्सर)रे चैत्रमासशुक्लपक्षद्वितीयायाम्—फ्ली; गु. इं; पृ. १०२) और कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन् के राज्यवर्ष तीसरे के दानपत्र में 'पौष' संवत्सर—श्रीमृगेशवर्म्मा आत्मनः राज्यस्य तृतीये वर्षे पौषे संवत्सरे कार्त्तिकमासबहुलपक्षे दशम्यां तिथौ (इं. ऎं; जि. ७, पृ. ३५) आदि.

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५ बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति (भास्कराचार्य का 'सिद्धांतशिरोमणि १।३०),

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वर्ष ३६५ दिन, १५ घड़ी, ३१ पल और ३० विपल का होता है, अतएव बार्हस्पत्य संवत्सर सौर वर्ष से ४ दिन, १३ घड़ी और २६ पल के करीब छोटा होता है जिससे प्रति ८५ वर्ष में एक संवत्सर क्षय हो जाता है. इस चक्र के ६० वर्षों के नाम ये हैं—

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१ प्रभव, २ विभव, ३ शुक्ल, ४ प्रमोद, ५ प्रजापति, ६ अंगिरा, ७ श्रीमुख, ८ भाव, ९ युवा, १० धाता, ११ ईश्वर, १२ बहुधान्य, १३ प्रमाथी, १४ विक्रम, १५ वृष, १६ चित्रभानु, १७ सुभानु, १८ तारण, १९ पार्थिव, २० व्यय, २१ सर्वजित, २२ सर्वधारी, २३ विरोधी, २४ विकृति, २५ खर, २६ नंदन, २७ विजय, २८ जय, २९ मन्मथ, ३० दुर्मुख, ३१ हेमलंब, ३२ विलंबी, ३३ विकारी, ३४ शर्वरी, ३५ प्लव, ३६ शुभकृत्, ३७ शोभन, ३८ क्रोधी, ३९ विश्वावसु, ४० पराभव, ४१ प्लवंग, ४२ कीलक, ४३ सौम्य, ४४ साधारण, ४५ विरोधकृत्, ४६ परिधावी, ४७ प्रमादी, ४८ आनंद, ४९ राक्षस, ५० अनल, ५१ पिंगल, ५२ कालयुक्त, ५३ सिद्धार्थी, ५४ रौद्र, ५५ दुर्मति, ५६ दुंदुभि, ५७ रुधिरोद्गारी, ५८ रक्ताक्ष, ५९ क्रोधन और ६० क्षय.

c31.s22.8

वराहमिहिर ने कलियुग का पहिला वर्ष विजय संवत्सर माना है परंतु ‘ज्योतिषतत्त्व’ के कर्त्ता ने प्रभव माना है. उत्तरी हिंदुस्तान में इस संवत्सर का प्रारंभ बृहस्पति के राशि बदलने से माना जाता है परंतु व्यवहार में चैत्र शुक्ला १ से ही उसका प्रारंभ गिना जाता है. उत्तरी विक्रम संवत् १६७५ के पंचांग में ‘प्रमोद’ संवत्सर लिखा है जो वर्ष भर माना जायगा, परंतु उसी पंचांग में यह भी लिखा है कि मेषार्क के समय (चैत्र शुक्ला ३ को) उसके १० मास, १६ दिन, ४२ घड़ी और १५ पल व्यतीत हो चुके थे और १ मास, १३ दिन, १७ घड़ी और ४५ पल बाकी रहे हैं१.

c31.s22.9

वराहमिहिर के मत से उत्तरी बार्हस्पत्य संवत्सर का नाम मालूम करने का नियम यह है—

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इष्ट गत शक संवत् को ११ से गुणो, गुणनफल को चौगुना कर उसमें ८५८६ जोड़ दो, फिर योग में ३७५० का भाग देने से जो फल आवे उसको इष्ट शक संवत् में जोड़ दो, फिर योग में ६० का भाग देने से जो शेष रहे वह प्रभवादि क्रम से गत संवत्सर की संख्या होगी२.

c31.s22.11

दक्षिण में बार्हस्पत्य संवत्सर लिखा जाता है परंतु वहां इसका बृहस्पति की गति से कोई संबंध नहीं है. वहांवाले इस बार्हस्पत्य संवत्सर को सौर वर्ष के बराबर मानते हैं जिससे उनके यहां कभी संवत्सर क्षय नहीं माना जाता. कलियुग का पहिला वर्ष प्रमाथी संवत्सर मान कर प्रतिवर्ष चैत्रशुक्ला १ से क्रमशः नवीन संवत्सर लिखा जाता है.

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दक्षिणी बार्हस्पत्य संवत्सर का नाम मालूम करने का नियम नीचे अनुसार है—

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इष्ट गत शक संवत् में १२ जोड़ कर ६० का भाग देने से जो शेष रहे वह प्रभवादि वर्तमान संवत्सर होगा; अथवा गत इष्ट कलियुग संवत् में १२ जोड़ कर ६० का भाग देने से जो शेष रहे वह प्रभवादि गत संवत्सर होगा३.

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१ अथ चैत्रादौ नर्मदोत्तरभागे बार्हस्पत्यमानेन प्रभवादिषष्ट्यब्दानां मध्ये ब्रह्मविंशतिकायां चतुर्थः प्रमोदनामा संवत्सरः प्रवर्तते तस्य मेषार्क[प्रवेश]समये गतमासादिः १० । १६ । ४२ । १५ भोग्यमासादिः १ । १३ । १७ । ४५ (मूंथालाल ज्योतिषीरत्न का बनाया हुआ राजपूताना पंचांग वि. सं. १६७५ का).

c31.s22.15

२ गतानि वर्षाणि शकेन्द्रकालाद्धतानि रुद्रैर्गुणयेच्चतुर्भिः । नवाष्टपंचाष्टयुतानि कृत्वा विभाजयेच्छून्यशरांगरामैः । फलेन युक्तं शकभूप-कालं संशोध्य षष्ट्या.......शेषाः क्रमशः समाः स्युः (वाराही संहिता, अध्याय ८, श्लोक २०-२१). उदाहरण—विक्रम संवत् १६७५ में बार्हस्पत्य संवत्सर कौनसा होगा? गत वि. सं. १६७४=गत शक संवत् (१६७४-१३५=) १५३९, १५३९X११=१६९२९, १६९२९X४=६७७१६, ६७७१६+८५८६=७६३०२, ७६३०२ ÷ ३७५० = २० १३०२/३७५०, १५३९+२०=१५५९; १५५९/६०=२५, शेष ५९, जो गत संवत्सर है. इसलिये वर्तमान संवत्सर =४ अर्थात् प्रमोद.

c31.s22.16

३ प्रमाथी प्रथमं वर्षं कल्यादौ ब्रह्मणा स्मृत । तदादि षष्टिसंख्याके शेषं चांद्रेऽत्र वत्सरः ॥ व्यावहारिकसंज्ञोऽयं कालः स्मृत्यादिकर्मसु । योज्यः सर्वत्र तत्रापि जेवां वा नर्मदात्तरे (पैतामहसिद्धांत).

c31.s22.17

उत्तरी हिंदुस्तान के शिलालेखादि में बार्हस्पत्य संवत्सर लिखे जाने के उदाहरण बहुत ही कम मिलते हैं परंतु दक्षिण में इसका प्रचार अधिकता के साथ मिलता है. लेखादि में इसका सबसे पहिला उदाहरण दक्षिण के चालुक्य (सोलंकी) राजा मंगलेश (ई. स. ५६१-६१०) के समय के बादामी (महाकूट) के स्तंभ पर के लेख में मिलता है जिसमें 'सिद्धार्थ' संवत्सर लिखा है१.

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