भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s27.1
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s27.1
- Language
- Hindi
c31.s27.1
शाहूर सन् को 'सूर सन्' और 'अरबी सन्' भी कहते हैं. 'शाहूर सन्' नाम की उत्पत्ति का ठीक पता नहीं लगता परंतु अनुमान है कि अरबी भाषा में महीने को 'शहर' कहते हैं और उस का बहुवचन 'शहूर' होता है जिसपर से 'शाहूर' शब्द की उत्पत्ति हुई हो. यह सन् हिजरी सन् का प्रकारांतर मात्र है. हिजरी सन् के चांद्र मास इसमें सौर माने गये हैं जिससे इस सन् का वर्ष सौर वर्ष के बराबर होता है और इसमें मौसिम और महीनों का संबंध बना रहता है. इस सन् में ५६६-६०० मिलाने से ई. स. और ६५६-५७ मिलाने से वि. सं. बनता है इससे पाया जाता है कि तारीख़ १ मुहर्रम हिजरी सन् ७४५ (ई. स. १३४४ तारीख़ २५ मई=वि. सं. १४०१ ज्येष्ठ शुक्ला २) से, जब कि सूर्य मृगशिर नक्षत्र पर आया था, इसका प्रारंभ हुआ है. इसका नया वर्ष सूर्य के मृगशिर नक्षत्र पर आने के (मृगे रविः) दिन से बैठता है जिससे इसके वर्ष को 'मृग साल' भी कहते हैं. इसके महीनों के नाम हिजरी सन् के महीनों के अनुसार ही हैं. यह सन् किसने चलाया इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि देहली के सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ (ई. स. १३२५-१३५१) ने, जिसने अपनी राजधानी देहली से उठा कर देवगिरि (दौलताबाद) में स्थिर करने का उद्योग किया था, दोनों फ़स्लों (रबी और ख़रीफ़) का हासिल नियत महीनों में लिये जाने के लिये इसे दक्षिण में चलाया हो३ जैसे कि पीछे से अकबर बादशाह ने अपने राज्य में फ़सली सन् चलाया. इस सन् के वर्ष अंकों में नहीं किंतु अंक सूचक अरबी शब्दों४ में ही लिखे जाते हैं. मरहठों के राज्य में इस सन् का प्रचार रहा परंतु अब तो इसका नाममात्र रह गया है और मराठी पंचांगों में ही इसका उल्लेख मिलता है५.