भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s34.5
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s34.5
- Language
- Hindi
c31.s34.5
४ प्रारंभ में रोमन लोगों का वर्ष ३०४ दिन का था जिसमें मार्च से डिसेंबर तक के १० महीने थे. जुलाई के स्थानापन्न मास का नाम 'किंक्टिलिस्' और ऑगस्ट के स्थानापन्न का नाम 'सेक्टिलिस्' था. फिर नुमा पंपिलिअस् (ई. स. पूर्व ७१५-६७२) राजा ने वर्ष के प्रारंभ में जैन्युअरी (जनवरी) और अंत में फेब्रुअरी (फरवरी) मास बढ़ा कर १२ चांद्र मास अर्थात् ३५५ दिन का वर्ष बनाया. ई. स. पूर्व ४५२ से चांद्र वर्ष के स्थान पर सौर वर्ष माना जाने लगा जो ३५५ दिन का ही होता था परंतु प्रति दूसरे वर्ष (एकांतर से) क्रमशः २२ और २३ दिन बढ़ाते थे, जिससे ४ वर्ष के १४६५ दिन और १ वर्ष के ३६६ १/४ दिन होने लगे. उनका यह वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से करीब १ दिन अधिक बड़ा था. इस वर्षगणना से २६ वर्ष में करीब २६ दिन का अंतर पड़ गया जिससे ग्रीकों के वर्षमान का अनुकरण किया गया जिसमें समय समय पर अधिक मास मानना पड़ता था. इससे भी अंतर बढ़ता ही चला और जुलिअस सीज़र के समय वह अंतर ६० दिन का हो गया जिससे उसने ई. स. पूर्व ४६ को ४५५ दिन का वर्ष मान कर वह अंतर मिटा दिया, क्विंक्टिलिस मास का नाम अपने नाम पर से 'जुलाई' रक्खा और आगे के लिये अधिक मास का झगड़ा मिटा कर ३६५ ¼ दिन का वर्ष नियत कर जैन्युअरी, मार्च, मे, जुलाई, सेप्टेंवर और नवेंबर महीने तो ३१, ३१ दिन के, बाकी के, फेब्रुअरी (फरवरी) के सिवाय, ३०, ३० दिन के और फेब्रुअरी २६ दिन का, परंतु प्रति चौथे वर्ष ३० दिन का, स्थिर किया. जुलिअस् सीज़र के पीछे ऑगस्टस् ने, जो रोम का पहिला बादशाह हुआ, सेक्स्टाइलिस मास का नाम अपने नाम से ऑगस्ट रक्खा और उसको ३१ दिन का, फेब्रुअरी को २८ दिन का, सप्टेंबर और नवेंबर को ३०, ३० दिन का और दिसंबर को ३१ का बनाया. इसी परिवर्तन के अनुसार ई. स. के महीनों के दिनों की संख्या अब तक चली आ रही है.