भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s7.20
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s7.20
- Language
- Hindi
c31.s7.20
८ संवत् के साथ ‘कृत’ शब्द अब तक केवल ४ शिलालेखों में मिला है. डॉ. फ़्लीट ने इसका अर्थ ‘गत’ अर्थात् गुज़रे हुए [वर्ष] अनुमान किया था परंतु गंगधार के शिलालेख में ‘कृतेषु’ और ‘यातेषु’ (=गत) दोनों शब्द होने से इस अनुमान को ठीक न माना. मंदसौर के लेख में ‘कृतसंज्ञिते’ लिखा है (देखो, ऊपर अवतरण १) उसमें ‘कृत’ वर्ष का नाम होना पाया जाता है. जैसे प्राचीन लेखों में १२ वर्ष (महाचैत्रादि) और ६० वर्ष (प्रभवादि) के दो भिन्न भिन्न बार्हस्पत्यमान (चक्र) मिलते हैं वैसे ही वैदिक काल में ४ वर्ष का एक युगमान (चक्र) भी था (देखो, आर. शामशास्त्री का ‘गवामयन’ पृ. ३, १३८). इस युगमान के वर्षों के नाम वैदिक काल के जुए के पासों की नांई (देखो, ऊपर पृ. २१ और उसी के टिप्पण ३-५) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि थे, और उनकी रीति के विषय में यह अनुमान होता है कि जिस गत वर्ष में ४ का भाग देने से कुछ न बचे उस वर्ष की ‘कृत’, ३ बचे उसकी ‘त्रेता’, २ बचे उसकी ‘द्वापर’, और १ बचे उसकी ‘कलि’ संज्ञा होती हो. जैनों के ‘भगवतीसूत्र’ में युगमान का ऐसा ही उल्लेख मिलता है. उसमें लिखा है कि ‘जुग चार हैं कयजुम्म (कृत), दोज (त्रेता), दावरजुम्म (द्वापर) और कलिजुग (कलि). जिस संख्या
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