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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s7: ७—विक्रम संवत्

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s7

Language
Hindi

Contents

७—विक्रम संवत्

c31.s7.1

**विक्रम संवत् को मालव संवत् (मालव काल४) भी कहते हैं.** इसके संबंध में यह प्रसिद्धि चली आती है कि मालवा के राजा विक्रम या विक्रमादित्य ने शकों का पराजय कर अपने नाम का संवत् चलाया. धौलपुर से मिले हुए चाहमान (चौहान) चंडमहासेन के विक्रम संवत् ८६८ (ई. स. ८४१)

c31.s7.2

१ लोरियन् तंगाई (स्वात ज़िले में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर खुदे हुए सं. ३१८ के खरोष्ठी लेख (सं ३१८ प्रोठवदस दि २७....श्रा. स. रि; ई. स. १६०३-४, पृ. २५१) तथा हश्तनगर (पुष्कलावती) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्ति के आसन पर खुदे सं. ३८४ (सं ३८४ प्रोठवदस मसस दिवसमि पंचमि ५—पं. इं; जि. १२, पृ. ३०२) के लेख में दिया हुआ संवत् कौनसा है यह अनिश्चित है. संभव है कि उनका संवत् मौर्य संवत् हो.

c31.s7.3

४ मालवालाणांस्तरदां षट्विंशत्संयुतेष्वतीतेषु नवसु शतेषु (ग्यारिसपुर का लेख; क; श्रा. स. रि; जि. १०, प्लेट ११).

c31.s7.4

के शिलालेख में पहिले पहिल१ इस संवत् के साथ विक्रम का नाम जुड़ा हुआ मिलता है२. उसके पहिले के अब तक के मिले हुए लेखों में विक्रम का नाम तो नहीं मिलता किंतु संवत् नीचे लिखे अनुसार भिन्न भिन्न रीति से दिया हुआ मिलता है—

c31.s7.5

(१) मंदसौर से मिले हुए नरवर्मन् के समय के लेख में—‘श्रीर्म्मालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञिते [।] एकषष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये [॥] प्रावृक्का(ट्का)ले शुभे प्राप्ते’३, अर्थात् ‘मालवगण के प्रचलित किये हुए प्रशस्त कृत संज्ञावाले ४६१ वें वर्ष के लगने पर वर्षा ऋतु में’.

c31.s7.6

(२) राजपूताना म्यूज़ियम् (अजमेर) में रक्खे हुए नगरी (मध्यमिका, उदयपुर राज्य में) के शिलालेख में—‘कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वेकाशीत्युत्तरेष्वस्यां मालवपूर्व्वायां [४००] ८० १ कार्त्तिकशुक्लपञ्चम्याम्’, अर्थात् ‘कृत [नामक] ४८१ [वें] वर्ष (संवत्) में इस मालवपूर्वा कार्तिक शुक्ला पंचमी के दिन’.

c31.s7.7

(३) मंदसौर से मिले हुए कुमारगुप्त (प्रथम) के समय के शिलालेख में—‘मालवानां गणस्थित्या याते शतचतुष्टये । त्रिनवत्यधिकेब्दान्ध्रि(मृ)तौ सेव्यघनस्तने ॥ सहस्यमासशुक्लस्य प्रशस्तेन्हि त्रयोदशे’४, अर्थात् ‘मालवों के गण (जाति) की स्थिति से ४९३ वर्ष बीतने पर पौष शुक्ल १३ को.’

c31.s7.8

३ पं. इं; जि. १२, पृ. ३२०.

c31.s7.9

(४) मंदसौर से मिले हुए यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के समय के शिलालेख में—‘पञ्चसु शतेषु शरदां यातेष्वेकान्नवतिसहितेषु । मालवगणस्थितिवशात्कालज्ञानाय लिखितेषु’५ अर्थात् ‘मालव गण (जाति) की स्थिति के वश से कालज्ञान के लिये लिखे हुए ५८६ वर्षों के बीतने पर’.

c31.s7.10

४ फ़्ली; गु. इं; पृ. ८३.

c31.s7.11

(५) कोटा के पास के कणस्वा के शिव मंदिर में लगे हुए शिलालेख में—‘संवत्सरशतैर्यातैः सपञ्चनवत्यर्गलैः [।] सप्तभिर्म्मालवेशानां’६, अर्थात् ‘मालवा या मालव जाति के राजाओं (राजा)७ के ७९५ वर्ष बीतने पर’.

c31.s7.12

५ फ़्ली; गु. इं; पृ. १५४.

c31.s7.13

६ इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५६.

c31.s7.14

७ मैनालगढ़ (उदयपुर राज्य में) से मिले हुए अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वीभट) के समय के लेख के संवत् १२२६ को मालवा के राजा का संवत् कहा है (मालवेशगतवत्सर(रैः) शतैः द्वादशैश्च षट्(ड्)विंशपूर्वकैः) (ज. ए. सो; बंगा. जि. ५५, भाग १, पृ. ४६).

c31.s7.15

इन सब अवतरणों से यही पाया जाता है कि—

c31.s7.16

(अ) मालव गण (जाति) अथवा मालव (मालवा) के राज्य या राजा की स्वतंत्र स्थापना के समय से इस संवत् का प्रारंभ होता था.

c31.s7.17

(आ) अवतरण १ और २ में दिये हुए वर्षों की संज्ञा ‘कृत’८ भी थी.

c31.s7.18

१ धिनिकि गांव (काठियावाड़) से मिले हुए दानपत्र में विक्रम संवत् ७६४ कार्तिक कृष्णा अमावास्या, आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण लिखा है (इं. ऐं; जि. १२, पृ. १५५) परंतु उक्त तिथि को आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण न होने, और उसकी लिपि इतनी प्राचीन न होने से डॉ. फ़्लीट और कीलहॉर्न ने उसको जाली ठहराया है.

c31.s7.19

२ वसु नव [अ]ष्टौ वर्षा गतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य [।] वैशाखस्य सिताया (यां) रविवारयुतद्वितीयायां (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ३५.)

c31.s7.20

८ संवत् के साथ ‘कृत’ शब्द अब तक केवल ४ शिलालेखों में मिला है. डॉ. फ़्लीट ने इसका अर्थ ‘गत’ अर्थात् गुज़रे हुए [वर्ष] अनुमान किया था परंतु गंगधार के शिलालेख में ‘कृतेषु’ और ‘यातेषु’ (=गत) दोनों शब्द होने से इस अनुमान को ठीक न माना. मंदसौर के लेख में ‘कृतसंज्ञिते’ लिखा है (देखो, ऊपर अवतरण १) उसमें ‘कृत’ वर्ष का नाम होना पाया जाता है. जैसे प्राचीन लेखों में १२ वर्ष (महाचैत्रादि) और ६० वर्ष (प्रभवादि) के दो भिन्न भिन्न बार्हस्पत्यमान (चक्र) मिलते हैं वैसे ही वैदिक काल में ४ वर्ष का एक युगमान (चक्र) भी था (देखो, आर. शामशास्त्री का ‘गवामयन’ पृ. ३, १३८). इस युगमान के वर्षों के नाम वैदिक काल के जुए के पासों की नांई (देखो, ऊपर पृ. २१ और उसी के टिप्पण ३-५) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि थे, और उनकी रीति के विषय में यह अनुमान होता है कि जिस गत वर्ष में ४ का भाग देने से कुछ न बचे उस वर्ष की ‘कृत’, ३ बचे उसकी ‘त्रेता’, २ बचे उसकी ‘द्वापर’, और १ बचे उसकी ‘कलि’ संज्ञा होती हो. जैनों के ‘भगवतीसूत्र’ में युगमान का ऐसा ही उल्लेख मिलता है. उसमें लिखा है कि ‘जुग चार हैं कयजुम्म (कृत), दोज (त्रेता), दावरजुम्म (द्वापर) और कलिजुग (कलि). जिस संख्या

c31.s7.21

(इ) इसकी मासपक्षयुक्त तिथिगणना भी **‘मालवपूर्वा’**, अर्थात् मालवे (या मालवों) की गणना१ के अनुसार की, कहलाती थी.

c31.s7.22

जयपुर राज्य के नगर (कर्कोट्क नगर) से कुछ सिक्के ऐसे मिले हैं जिन पर **‘मालवानं(नां) जय(य:)’**२ लेख होना बतलाया जाता है. उनकी लिपि ई. स. पूर्व २५० से लगा कर ई. स. २५० के बीच की अर्थात् विक्रम संवत् के प्रारंभ के आस पास की मानी गई है. इन सिक्कों से अनुमान होता है कि मालव जाति के लोगों ने जय प्राप्त करके उसकी यादगार में ये सिक्के चलाये हों. समुद्रगुप्त ने मालव जाति को अपने अधीन किया था३. इससे भी यह अनुमान होता है कि मालवों का उपर्युक्त विजय गुप्तों से पूर्व ही हुआ था. यह भी संभव है कि मालव जाति के लोगों ने अवंति देश को जीत कर अपना राज्य वहां जमाया हो और उसीसे वह देश पीछे से मालव (मालवा) कहलाया हो एवं वहां पर मालव जाति का राज्य स्थिर होने के समय से प्रचलित होने के कारण यह संवत् **‘मालवकाल’** या **‘मालव संवत्’** कहलाया हो.

c31.s7.23

कुछ विद्वानों का मत यह है कि इस संवत् का नाम वास्तव में **‘मालव संवत्’** ही था परंतु पीछे से गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त (दूसरे) का, जिसके विरुद **‘विक्रम’** और **‘विक्रमादित्य’** आदि४ मिलते हैं, नाम इस संवत् के साथ जुड़ जाने से इसका नाम **‘विक्रम संवत्’** हो गया हो. यह कल्पना तभी ठीक कही जा सकती है जब इतिहास से यह सिद्ध हो जावे कि चंद्रगुप्त (दूसरे) के पहिले विक्रम नाम का कोई प्रसिद्ध राजा नहीं हुआ, परंतु हाल (सातवाहन, शालिवाहन) की **‘गाथासप्तशती’** से यह पाया जाता है कि उस पुस्तक के संगृहीत होने के पूर्व विक्रम नामका प्रसिद्ध राजा हुआ था५. हाल का समय ई. स.

c31.s7.24

५ संवाहणसुहरसतोसिएण देन्तेण तुह करे लक्खं । चलणेण विक्कमाइज्चचरियमणुसिक्खियं तिस्सा (गाथा ४६४, वेबर का संस्करण). इस गाथा में विक्रमादित्य की दानशीलता की प्रशंसा है.

c31.s7.25

में ४ का भाग देने से ४ बचे (अर्थात् कुछ न बचे) उसका नाम कृत, ३ बचे उसका त्रेता, २ बचे उसका द्वापर और १ बचे उसका कलि है’[^asterisk]. यह युगमान जिन ४ लेखों में 'कृत' संज्ञा का प्रयोग हुआ है नीचे लिखे अनुसार ठीक घट जाता है—

c31.s7.26

(१) विजयमंदिरगढ़ (बयाना) के लेख के वर्ष ४२८dagger को गत[^ddagger] मान कर ४ का भाग देने से कुछ नहीं बचता इससे उसका नाम ‘कृत’ हुआ.
(२) मंदसौर के वर्ष ४६१ को वर्तमान ('प्राप्ते') कहा ही है इस लिये गत वर्ष ४६० है जो 'कृत' ही है.
(३) गंगधार (झालावाड़ राज्य में) के लेख[^section] के वर्ष ४८० को गत ही लिखा है जिससे वह ‘कृत’ ही है.
(४) नगरी के लेख के वर्ष ४८१ को वर्तमान मानें तो गत ४८० होता है जो ‘कृत’ ही है.

c31.s7.27

१ संभव है कि मालवे की गणना चैत्रादि पूर्णिमांत हो.

c31.s7.28

२ क; आ. स. रि; जि. ६, पृ. १८२.

c31.s7.29

३ फ्ली; गु. इं; पृ. ८.

c31.s7.30

४ चंद्रगुप्त (दूसरे) के सिक्कों पर एक तरफ़ उस राजा के नामवाले लेख और दूसरी ओर 'श्रीविक्रमः', 'विक्रमादित्यः', सिंहविक्रमः', ‘अजितविक्रमः' आदि उसीके विरुद्धसूचक लेख हैं (जॉन ऍलन संपादित, गुप्तों के सिक्कों की सूचि.)

c31.s7.31

dagger † कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वष्टाविंशेषु ४०० २० ८ फाल्गुण(न)बहुलस्य पञ्चदश्यामेतस्यां पूर्व्वायाँ (फ्ली; गु. इं; पृ. २५३). [^ddagger]: ‡ शिलालेखादि में विक्रम संवत् के वर्ष बहुधा गत लिखे जाते हैं (ऍ. इं; जि. १, पृ. ४०६) वर्तमान बहुत कम. जब कभी वर्तमान वर्ष लिखा जाता है तब एक वर्ष अधिक लिखा रहता है. [^section]: § यातेषु चतुर्षु कि(कृ)तेषु शतेषु सोस्ये(म्ये)ध्या(ष्ट्रा)शीतसोत्तरपदेष्विह वत्स[रेषु]। शुक्ले त्रयोदशदिने भुवि कार्त्तिकस्य मासस्य सर्व्वजनचित्तसुखावहस्य || (फ्ली; गु. इं; पृ. ७४). प्राचीन होना प्रकट करता है इस लिये दंडी और गुणाढ्य दोनों छठी शताब्दी में हुए ऐसा वेबर पंडित ने किस आधार पर माना यह मालूम नहीं होता. अथवा प्रायः यूरोपियन् विद्वानों का यह स्वभाव ही है कि भारतवर्ष के प्राचीनतम ग्रंथों एवं उनके रचयिताओं को अर्वाचीन सिद्ध करने का जहां तक हो सके वे यत्न करते हैं और उनका प्राचीनत्व सिद्ध करने का दृढ प्रमाण मिल भी जावे तो उसको 'प्रक्षिप्त' कह कर अपने को जो अनुकूल हो उसीको आगे करते हैं (अर्थात् ठीक बतलाते हैं) (बंबई के निर्णयसागर प्रेस का छुपा हुआ 'कथासरित्सागर', तीसरा संस्करण, भूमिका, पृ. २).

c31.s7.32

ऐसी दशा में यह कहा जा सकता है कि मालवा और राजपूताने में कृतादि युगगणना की प्राचीन शैली का प्रचार ई. स. की पांचवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक बना हुआ था.

c31.s7.33

[^asterisk]: * कतियाणं भंते जुम्मा परुवत्ता ? गोयम चत्तारि जुम्मा परुवत्ता। तं जहा। कयजुम्मं तेयोजे दावरजुम्मे कलिनुगे। से केणट्टेणं भंते ? एवं उच्चति जाव कलिनुगे गोयम ! जेणं रासी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे चउपुज्जववोसिये से तं कयजुम्मे। जेणं रासा चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे तिपज्जववोसिये से तं तेयोजे। जेणं रासी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे दुपज्जववोसिये से तं दावरजुम्मे। जेणं राशी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे एकपज्जववोसिये से तं कलिनुगे। से तेणट्टेणं गोयम (१३७२-७२, भगवती सूत्र; 'गवामयन'; पृ. ७२).

c31.s7.34

की दूसरी शताब्दी से इधर का नहीं माना जा सकता. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि या

c31.s7.35.1

१० 'गाथासप्तशती' के अंत में सातवाहन को कुंतल देश का राजा, प्रतिष्ठान (पैठण) नगर का अधीश, शतकर्ण (शातकर्णि) उपनामवाला, द्वीपिकर्ण का पुत्र, मलयवती का पति और हालादि उपनामवाला लिखा है (प्रॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८४-८६ तक की रिपोर्ट, पृ. ३४६). शिलालेखों में आंध्र (आंध्रभृत्य) वंश के लिये सातवाहन नाम का प्रयोग मिलता है. नानाघाट के लेख में उक्त वंश के मूल पुरुष सिमुक को सातवाहन कहा है और उक्त वंश के राज्य का अंत ई. स. २२५ के आस पास होना (स्मिथ; अ. हि. इं; पृ. २१८ के पास का नक्शा) माना जाता है. ऐसी दशा में 'गाथासप्तशती' का समय उक्त सन से पूर्व का ही होना चाहिये. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने विक्रम संवत्संबंधी अपने लेख में 'गाथासप्तशती' के राजा विक्रम के विषय में लिखते हुए उक्त पुस्तक के रचनाकाल के संबंध में लिखा है कि 'क्या गाथासप्तशति वास्तव में उतना पुराना ग्रंथ है जितना कि माना जाता है?.......बाण के हर्षचरित के प्रारंभ के १३ वें श्लोक में सातवाहन के द्वारा गीतों के 'कोश' के बनाये जाने का उल्लेख अवश्य है परंतु इस 'कोश' को हाल की सप्तशति मानने के लिये कोई कारण नहीं है जैसा कि प्रॉ. वेबर ने अच्छी तरह बतलाया है. उसी पुस्तक में मिलनेवाले प्रमाण उसकी रचना का समय बहुत पीछे का होना बतलाते हैं. यहां पर केवल दो बातों का विचार किया जाता है. एक तो उस (पुस्तक) में कृष्ण और राधिका का (१। ८६) और दूसरा मंगलवार (३। ६१) का उल्लेख है. राधिका का सब से पुराना उल्लेख जो मुझे मिल सका वह पंचतंत्र में है जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी का बना हुआ है. ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति ६ वीं शताब्दी से प्रचलित हुई, यद्यपि उसका सब से पुराना उदाहरण बुधगुप्त के ई. स.

c31.s7.35.2

४८४ के एरण के लेख में मिलता है. यदि हम गाथासप्तशति के हाल का समय छठी शताब्दी का प्रारंभ मानें तो अधिक अनुचित न होगा' (आर. जी. भंडारकर कोम्मेमोरेशन वॉल्यूम, पृ. १८८-८६). हम उक्त विद्वान् के इस कथन से सर्वथा सहमत नहीं हो सकते क्योंकि बाणभट्ट सातवाहन के जिस सुभाषितरूपी उज्ज्वलरत्नों के कोश (संग्रह, खज़ाने) की प्रशंसा करता है (अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः । विशुद्धजातिभिः कोषं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३) वह 'गाथासप्तशति' ही है, जिसमें सुभाषित रूपी रत्नों का ही संग्रह है. यह कोई प्रमाण नहीं कि प्रॉ. वेबर ने उसे गाथासप्तशति नहीं माना इस लिये वह उससे भिन्न पुस्तक होना चाहिये. वेबर ने ऐसी ऐसी कई प्रमाणशून्य कल्पनाएं की हैं जो अब मानी नहीं जातीं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉक्टर सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी वेबर के उक्त कथन के विरुद्ध वाणभट्ट के उपर्युक्त श्लोक का संबंध हाल की सप्तशति से होना ही माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१). ऐसा ही डॉ० फ़्लीट ने (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८२०) और 'प्रबंधचिंतामणि' के कर्ता मेरुतुंग ने माना है (प्रबंधचिंतामणि, पृ. २६). पांचवीं शताब्दी के बने हुए 'पंचतंत्र' में कृष्ण और राधिका का उल्लेख होना तो उलटा यह सिद्ध करता है कि उस समय कृष्ण और राधिका की कथा लोगों में भलीभांति प्रसिद्ध थी अर्थात् उक्त समय के पहिले से चली आती थी. यदि ऐसा न होता तो पंचतंत्र का कर्ता उसका उल्लेख ही कैसे करता? ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति का ६ वीं शताब्दी में प्रचलित होना बतलाना भी ठीक नहीं हो सकता, क्यों कि कच्छ राज्य के अंधौ गांव से मिले हुए क्षत्रप रुद्रदामन् के समय के [शक] संवत् ५२ (ई. स.

c31.s7.35.3

१३०) के ४ लेखों में से एक लेख में 'गुरुवार' लिखा है (वर्षे द्विपंचाशे ५० २ फागुणाबहुलस द्वितीया वी २ गुरुवास[रे] सिंहलपुत्रस ओपशतस गोत्रस० स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई उक्त लेख की छाप से) जिससे सिद्ध है कि ई. स. की दूसरी शताब्दी में वार लिखने की रीति परंपरागत प्रचलित थी. राधिका और बुधवार के उल्लेख से ही 'गाथासप्तशति' का छठी शताब्दी में बनना किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता. डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी गाथासप्तशति के कर्त्ता हाल को आंध्रभृत्य वंश के राजाओं में से एक माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१) जिससे भी उसका आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंशियों के राज्यकाल में अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी में बनना मानना पड़ता है. केवल 'गाथासप्तशति' से ही चंद्रगुप्त (दूसरे) से पूर्व के राजा विक्रम का पता लगता है इतना ही नहीं किंतु राजा सातवाहन (हाल) के समय के महाकवि गुणाढ्य रचित पैशाची (कश्मीर तरफ की प्राकृत) भाषा के 'बृहत्कथा' नामक ग्रंथ से भी, जिसकी प्रशंसा बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित के प्रारंभ के १७ वें श्लोक (समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा) में की है. वह पुस्तक अब तक नहीं मिला परंतु उसके संस्कृत अनुवाद रूपी सोमदेव भट्ट के 'कथासरित्सागर' में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह (लंबक ६, तरंग १), पाटलीपुत्र के राजा विक्रमर्तुग (लंबक ७, तरंग १) आदि विक्रम नाम के राजाओं की कई कथाएं मिलती हैं. इस पुस्तक को भी वेबर ने ई. स. की छठी शताब्दी का माना है परंतु डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने उपर्युक्त सातवाहन के समय का अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी का माना है (बंब. गे; जि. १ भा. २, पृ.

c31.s7.35.4

१७०-७१) और काव्यमाला के विद्वान् संपादक स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं. दुर्गाप्रसाद और पांडुरंग परब ने उसका ई. स. की पहिली शताब्दी में बनना बतलाया है इतना ही नहीं किंतु वेबर के माने हुए उसके समय के विषय में लिखा है कि "वेबर पंडित 'हिस्टरी ऑफ संस्कृत लिटरेचर' नामक पुस्तक में गुणाढ्य का ई. स. की छठी शताब्दी में होना बतलाता है और दशकुमारचरित के रचयिता आचार्य दंडी का भी छठी शताब्दी में होना स्वीकार करता है. किंतु आचार्य दंडी काव्यदर्श में 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थां बृहत्कथाम्' में 'प्राहुः' पद से बृहत्कथा का अपने से बहुत

c31.s7.36

तो विक्रम१, जिसका नाम इस संवत् के साथ जुड़ा है, मालव जाति का मुखिया या राजा हो, अथवा चंद्रगुप्त (दूसरे) से पहिले का उससे भिन्न कोई राजा हो.

c31.s7.37

विक्रम संवत् का प्रारंभ कलियुग संवत् के (५०१६-१६७५=) ३०४४ वर्ष व्यतीत होने पर माना जाता है जिससे इसका गत वर्ष १ कलियुग संवत् ३०४५ के बराबर होता है. इस संवत् में से ५७ या ५६ घटाने से ईसवी सन् और १३५ घटाने से शक संवत् आता है. इसका प्रारंभ उत्तरी हिंदुस्तान में चैत्र शुक्ला १ से और दक्षिण में कार्तिक शुक्ला १ से होता है जिससे उत्तरी (चैत्रादि) विक्रम संवत् दक्षिणी (कार्तिकादि२) विक्रम संवत् से ७ महीने पहिले प्रारंभ होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में महीनों का प्रारंभ कृष्णा १ से और अंत शुक्ला १५ को होता है, परंतु दक्षिण में महीनों का प्रारंभ शुक्ला १ से और अंत कृष्णा अमावास्या को होता है. इस लिये उत्तरी विक्रम संवत् के महीने पूर्णिमांत और दक्षिणी के अमांत (दर्शांत) कहलाते हैं. शुक्ल पक्ष तो उत्तरी और दक्षिणी हिंदुस्तान में एक ही होता है परंतु उत्तरी हिंदुस्तान का कृष्ण पक्ष दक्षिणी से १ महीना पहिले रहता है अर्थात् जिस पक्ष को हम उत्तरी हिंदुस्तानवाले वैशाख कृष्ण कहते हैं उसीको दक्षिणवाले चैत्र कृष्ण लिखते हैं. काठियावाड़, गुजरात तथा राजपूताने के कुछ अंश में विक्रम३ संवत् का प्रारंभ आषाढ शुक्ला १ (अमांत) से भी होता था जिससे उसको 'आषाढादि' संवत्' कहते थे. राजपुताने के उदयपुर आदि राज्यों में राजकीय विक्रम संवत् अब श्रावण कृष्णा (पूर्णिमांत) से प्रारंभ होता है.

c31.s7.38

१ 'ज्योतिर्विदाभरण' का कर्त्ता कालिदास नामक ज्योतिषी उक्त पुस्तक के २२ वें अध्याय में अपने को उज्जैन के राजा विक्रम का मित्र (श्लोक १६) और 'रघुवंश' आदि तीन काव्यों का कर्ता बतला कर (श्लो. २०) गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) के वैशाख में उक्त पुस्तक का प्रारंभ और कार्तिक में उसकी समाप्ति होना (श्लो. २१) लिखता है. उसमें विक्रम के विषय में यह भी लिखा है कि 'उसकी सभा में शंकु, वररुचि, मणि, अंशु, जिष्णु, त्रिलोचन, हरि, घटखर्पर और अमरसिंह आदि कवि (श्लो. ८); सत्य, वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ और कुमारसिंह आदि ज्योतिषी थे (श्लो. ६). धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि ये नव विक्रम की सभा के रत्न थे. उसके पास ३००००००० पैदल, १०००००००० सवार, २४३०० हाथी और ४००००० नाव थीं (श्लो. १२). उसने ६५ शक राजाओं को मार कर अपना शक अर्थात् संवत् चलाया (श्लो. १३) और रूम देश के शक राजा को जीत कर उज्जैन में लाया परंतु फिर उसको छोड़ दिया' (श्लो. १७). यह सारा कथन मनघडंत ही है क्यों कि 'ज्योतिर्विदाभरण' की कविता मामूली है और रघुवंश आदि के कर्ता कविशिरोमणि कालिदास की अलौकिक सुंदरतावाली कविता के आगे तुच्छ है. ऐसे ही गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) में उक्त पुस्तक की रचना करने का कथन भी कृत्रिम ही है क्यों कि उसी पुस्तक में अयनांश निकालने के लिये यह नियम दिया है कि 'शक संवत् में से ४४५ घटाकर शेष में ६० का भाग देने से अयनांश आते हैं' (शाकः शराम्भोधिधुगोनिता हृता मानं खतर्कैरयनांशकाः स्मृताः । १२ । १६). विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला था अत एव यदि वह पुस्तक वि. सं. २४ में बना होता तो उसमें शक संवत् का नाम भी नहीं होना चाहिये था. वास्तव में वह पुस्तक श. सं. १२१४ (वि. सं. १२६६=ई. स. १२९२) के आसपास का बना हुआ है (देखो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित का 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र', पृ. ४७६). ऐसी दशा में उक्त पुस्तक का विक्रमसंबंधी सारा कथन कल्पित ही मानना पड़ता है.

c31.s7.39

२ वास्तव में विक्रम संवत् का प्रारंभ कार्तिक शुक्ला १ से और शक संवत् का चैत्र शुक्ला १ से है. उत्तरी हिंदुस्तान के भी पंचांग शक संवत् के आधार पर बनने से उनमें वर्ष चैत्र शुक्ला १ से प्रारंभ होता है, जिससे वहांवालों ने पीछे से विक्रम संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से भी मानना शुरू कर दिया हो. उत्तरी भारत के लेखों में संवत् दोनों तरह से (कार्तिकादि और चैत्रादि) मिल आते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी तक के लेखों में कार्तिकादि संवत् अधिक परंतु १३ वीं से १६ वीं शताब्दी तक के लेखों में चैत्रादि अधिक मिलते हैं (इं. पं; जि. २०, पृ. ३६६).

c31.s7.40

३ 'पृथ्वीराजरासो' में दिये हुए कितनी एक घटनाओं के अशुद्ध संवतों का ठीक होना सिद्ध करने की खींचतान में स्वर्गीय पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने पृथ्वीराज के जन्म संवत् संबंधी दोहे (एकादस सै पंच दह विक्रम साक अनंद । तिहि रिपु जय पुर हरन कौं भय प्रथिराज नरिंद। मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या संपादित 'पृथ्वीराजरासो' आदिपर्व, पृ. १३८), के 'अनंद' शब्द पर से 'अनंद विक्रम शक' (संवत्) की कल्पना कर लिखा है कि 'विक्रम साक अनन्द को क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनंद साक करके उसका अर्थ करे कि नव-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम का नव-रहित शक अर्थात् १००-६=६० । ६१ अर्थात विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ६० । ६१ से प्रारंभ हुआ है। यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा (?) करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैकड़ों वर्षों से यह कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तौ अब तक प्रचलित है और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह अब अप्रचलित हो गया है.........अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं। एक तौ सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है' (पृथ्वीराजरासा, आदि पर्व, पृ. १३६). पं. मोहनलाल पंड्या का यह सारा कथन सर्वथा स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि रासे के 'अनंद' शब्द का अर्थ 'आनंददायक' या 'शुभ' ही है जैसा कि भाषा के अन्य काव्यों में मिलता है*. उसको वास्तविक अर्थ में न ले कर 'विक्रम के राज्य के ६० वे या ६१ वे वर्ष से चलनेवाला अनंद विक्रम संवत्' अर्थ निकालना हठधर्मी से खाली नहीं है. ज्योतिषियों ने विक्रम के दो संवतों का होना कभी नहीं माना और न किसी वृद्ध पुरुष को ऐसा कहते हुए सुना. पं. मोहनलाल की यह कल्पना भी ठीक वैसी ही है जैसी कि 'राजप्रशस्ति' में खुदे हुए 'भाषारासापुस्तकेस्य' के 'भाव-नगर प्राचीनशोधसंग्रह' में छपे हुए अशुद्ध पाठ 'भीपारासापुस्तकेस्य' पर से 'भीपारासा' नामक ऐतिहासिक पुस्तक की सृष्टि खड़ी कर दी गई. पं. मोहनलाल पंड्या के इस मनघडंत कथन के आधार पर डॉ. ग्रीअर्सन (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ४२, टिप्पण २), वी. ए. स्मिथ (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ३८७, टिप्पण २) और डॉ. बार्नेट ने (वा; ऐ. इं; पृ. ६५) 'अनंद विक्रम संवत्' का ई. स. ३३ से चलना माना है परंतु हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि राजपुताने में विक्रम के दो संवतों का होना कभी माना नहीं गया, न वहां से मिले हुए शिलालेखों, दानपत्रों, हस्तलिखित पुस्तकों, भाटों तथा चारणों के लिखे हुए भाषा कविता के ग्रंथों या ख्यातों में कहीं भी अनंद विक्रम संवत् का उल्लेख मिलता है, न 'पृथ्वीराजरासे' के उपर्युक्त दोहे में 'अनंद विक्रम संवत्' की कल्पना पाई जाती है और न 'पृथ्वीराजविजय' महाकाव्य से, जो चौहानों के इतिहास का प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तक है, वि. सं. १२२० (ई. स. ११६३) के पूर्व पृथ्वीराज का जन्म होना माना जा सकता है.

c31.s7.41

१ आषाढादि विक्रम संवत शिलालेखों तथा पुस्तकों में मिलता है. अडालिज (अहमदाबाद से १२ मील पर) की बावड़ी के लेख में 'श्रीमन्नृपविक्रमसमयातीता (त) आषाढादिसंवत् १५५५ वर्षे शाके १४२०....माघमासे पंचम्यां तिथौ बुधवासरे' (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१). डुंगरपुर राज्य के डेसां गांव के पास के शिवमंदिर के लेख में-' श्रीमन्नृ(न्नृ)पविक्रमार्क (र्क)राज्यसम-यातीतसंवत् १६ आषादादि २३ वर्षे शाके १४८८ प्रवर्त्तमाने । युवसंवत्सराभिध संवत्सरे....वैशाखमासे । कृष्णपक्षे । प्रतिपति (त्ति) या । गुरुवासरे.' डुंगरपुर राज्य से मिले हुए कई शिलालेखों में 'आषाढादि' संवत् लिखा मिलता है. 'प्रभावसक्षेत्रतीर्थयात्राक्रम' नामक पुस्तक के अंत में-'संवत् १५ आषाढादि ३४ वरुपे (वर्षे) श्रावणशुदि ५ बु(धो) मे'-लिखा मिला है (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१).

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