भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s9: ९—कलचुरि संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s9
- Language
- Hindi
९—कलचुरि संवत्
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कलचुरि१ संवत् को ‘चेदि संवत्’२ और ‘त्रैकूटक संवत्’३ भी कहते हैं. यह संवत् किस राजा ने चलाया इसका कुछ भी पता नहीं चलता. डॉ. भगवानलाल इंद्रजी ने महाक्षत्रप ईश्वरदत्त को४ और डॉ. फ़्लीट ने अभीर ईश्वरदत्त या उसके पिता शिवदत्त५ को इसका प्रवर्तक बतलाया है. रमेशचंद्र मजुमदार ने इसको कुशन(तुर्क)वंशी राजा कनिष्क का चलाया हुआ६ मान कर कनिष्क, वासिष्क, हुविष्क और वासुदेव के लेखों में मिलनेवाले वर्षों का कलचुरि संवत् का होना अनुमान किया है. परंतु ये सब अटकलें ही हैं और इनके लिये कोई निश्चित प्रमाण नहीं है.
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५ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८०५, पृ. ५६८.
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यह संवत् दक्षिणी गुजरात, कोंकण एवं मध्यप्रदेश के लेखादि में मिलता है. ये लेख गुजरात आदि के चालुक्य, गुर्जर, सेंद्रक, कलचुरि और त्रैकूटक वंशियों के एवं चेदि देश (मध्यप्रदेश के उत्तरी हिस्से) पर राज्य करनेवाले कलचुरि(हैहय)वंशी राजाओं के हैं. इस संवतवाले अधिकतर लेख कलचुरियों (हैहयों) के मिलते हैं और उन्हींमें इसका नाम ‘कलचुरि’ या ‘चेदि’ संवत् लिखा मिलता है जिससे यह भी संभव है कि यह संवत् उक्त वंश के किसी राजा ने चलाया हो.
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त्रिपुरी के कलचुरि राजा नरसिंहदेव के दो लेखों में कलचुरि संवत् ६०७७ और ६०६८ और तीसरे में विक्रम संवत् १२१६६ मिलने से स्पष्ट है कि कलचुरि संवत् ६०६, विक्रम संवत् १२१६ के निकट होना चाहिये. इससे विक्रम संवत् और कलचुरि संवत् के बीच का अंतर (१२१६-६०६=) ३०७ के लगभग आता है. डॉ. कीलहार्न ने कलचुरि संवत्वाले शिलालेख और दानपत्रों के महीने, तिथि और वार आदि को गणित से जांच कर ई. स. २४६ तारीख २६ आंगस्ट अर्थात् वि. सं. ३०६
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१ कलचुरिसंवत्सरे ८६३ राजश्रीमत्पृथ्वीदेव[राज्ये] (इं. एँ; जि. २०, पृ. ८४). कलचुरिसंवत्सरे ६१० राजश्रीमत्पृथ्वीदेवविजयराज्ये (क; आ. स. रि; जि. १७, सेट २०).
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२ नवस(श)तयुगला[ब्दा]धिक्यगे चेदिदिष्टे ज[न]पदमवतीर्णं श्रीगयाकर्णदेवे। प्रतिपदि शुचिमासश्वेतपक्षेर्कवारे शिवशरणसमीपे स्थापितयं प्रशस्तिः ॥ (इं. ऍ; जि. १८, पृ. २११). चेदिसंवत् ६३३ (इं. ऍ; जि. २५, पृ. ८२).
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३ त्रैकूटकानां प्रवर्द्धमानराज्यसंवत्सरशतद्वये पञ्चचत्वारिंशदुत्तरे (कॅवेटॅप्लस ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, पृ. ५८ और सेट).
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४ ज. रां. ए. सो; ई. स. १८०५, पृ. ५६६. डॉ. भगवानलाल इंद्रजी ने नासिक के लेखवाले अभीर ईश्वरसेन और महाक्षत्रप ईश्वरदत्त को, जिसके केवल पहिले और दूसरे राज्यवर्ष के सिक्के मिलते हैं, एक ही माना था
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६ इं. ऍ; जि. ४६, पृ. २६६-७०.
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७ ऍ. इं; जि. २, पृ. १०-२३.
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८ इं. ऍ; जि. १८, पृ. २१२-१३.
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६ इं. ऍ; जि. १८, पृ. २१४.
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आश्विन शुक्ला ११ से इसका प्रारंभ होना निश्चय किया है जिससे वर्तमान चेदि संवत् में २४८-४६२ जोड़ने से ईसवी सन, और ३०५-६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् आता है. इस संवत्वाला सब से पहिला लेख कलचुरि संवत् २४५३ (ई. स. ४६४) का और अंतिम ६५८४ (ई. स. १२०७) का मिला है, जिसके पीछे यह संवत् अस्त हो गया. इसके वर्ष बहुधा वर्तमान५ लिखे मिलते हैं.
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४ क; आ. स. रि; जि. २१, पृ. १०२, सेट २७.
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५ इं. ऐं; जि. १७, पृ. २१५, टिप्पण ५.