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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.16

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.16

Language
Hindi

c4.16

जब सरकार अंग्रेज़ी की तरफ से प्राचीन शोध का प्रशंसनीय कार्य होने लगा तब कितने एक विद्याप्रेमी देशी राज्यों ने भी अपने यहां प्राचीन शोधसंबंधी कार्यालय स्थापित किये. भावनगर दरबार ने अपने पंडितों के द्वारा काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना के अनेक शिलालेख और दानपत्रों की नकलें तय्यार करवा कर उनमें से कई एक 'भावनगर प्राचीनशोधसंग्रह' (भाग प्रथम) और 'भावनगर इन्स्क्रिप्शनस्' नामक पुस्तकों में प्रकट किये. काठियावाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल वॉटसन् का प्राचीन वस्तुओं का प्रेम देख कर काठियावाड़ के राजाओं ने मिल कर राजकोट में 'वॉटसन म्यूज़िअम्' स्थापित किया जिसमें कई प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों और पुस्तकों आदि का अच्छा संग्रह है. माईसोर राज्य ने ऐसी वस्तुओं का संग्रह किया इतना ही नहीं किंतु प्राचीन शोध के लिये आर्किऑलॉजिकल विभाग स्थापित कर अपने विस्तृत राज्य में मिलनेवाले हज़ारों शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों को 'एपिप्राफ़िया कर्नाटिका' नामक ग्रंथमाला की कई बड़ी बड़ी जिल्दों में प्रसिद्ध किया और ई. स. १८८५ से अपने प्राचीन शोध विभाग की सालाना रिपोर्टें भी, जो बड़े महत्व की हैं, छपाना आरंभ किया. चंबा राज्य ने प्राचीन वस्तुओं का अच्छा संग्रह किया जिसके प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों को प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. फोजल ने 'ऐंटिकिटीज़ ऑफ़ दी चंबा स्टेट' नामक अमूल्य ग्रंथ में प्रसिद्ध कर प्राचीन लिपियों का अभ्यास करनेवालों के लिये शारदा लिपि की बड़ी सामग्री एकत्रित कर दी. ट्रावनकोर तथा हैदराबाद राज्यों ने भी अपने यहां वैसा ही प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ कर दिया है. उदयपुर (मेवाड़), झालावाड़, ग्वालियर, धार, भोपाल, बड़ौदा, जूनागढ़, भावनगर आदि राज्यों में भी प्राचीन वस्तुओं के संग्रह हुए हैं और होते जाते हैं.