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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4: भूमिका

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4

Language
Hindi

भूमिका

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प्राचीन काल में आर्य जाति विद्या और सभ्यता में सर्वोच्च पद पा चुकी थी और एशिया खंड ही आर्यों की सभ्यता का मूल स्थान था जहांसे बहुधा दुनिया भर में धर्म, विद्या और सभ्यता का प्रचार हुआ. एशिया में भारत, ईरान और असीरिआवाले तथा आफ्रिका में मिसरवाले बड़ी उन्नत दशा को पहुंचे थे, परंतु परिवर्तनशील समय किसी को सर्वदा एक दशा में नहीं रहने देता. अनेक राष्ट्रविप्लव होते होते ईरान, असीरिआ और मिसरवाले तो अपने प्राचीन साहित्य आदि के उत्तराधिकारी न रहे परंतु भारतवर्ष के आर्य लोगों ने वैसी ही अनेक आपत्तियां सहने पर भी अपनी प्राचीन सभ्यता के गौरवरूपी अपने प्राचीन साहित्य को बहुत कुछ बचा रक्खा और विद्या के संबंध में सारे भूमंडल के लोग थोड़े बहुत उनके ऋणी हैं.

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ऐसे प्राचीन गौरववाले भारतवर्ष का मुसलमानों के यहां आने के पहिले का शृंखलाबद्ध इतिहास, जिसे आधुनिक काल के विद्वान् वास्तविक इतिहास कह सकें, नहीं मिलता. भारतवर्ष बड़ा ही विस्तीर्ण देश है, जहां पर प्राचीन काल से ही एक ही राजा का राज्य नहीं रहा किंतु समय समय पर अनेक स्वतंत्र राज्यों का उदय और अस्त होता रहा; विदेशियों के अनेक आक्रमणों से प्राचीन नगर नष्ट होते और उनपर नये बसते गये और मुसलमानों के समय में तो राजपूताने के बड़े अंश को छोड़ कर भारतवर्ष के बहुधा सब हिंदू राज्य अस्त हो गये इतना ही नहीं किंतु बहुत से प्राचीन नगर, मंदिर, मठ आदि धर्मस्थान तथा प्राचीन पुस्तकालय नष्ट कर दिये गये. ऐसी दशा में इस विशाल देश के शृंखलाबद्ध प्राचीन इतिहास का मिलना सर्वथा असंभव है, परंतु यह निर्विवाद है कि यहांवाले इतिहास विद्या के प्रेमी अवश्य थे और समय समय पर इतिहास से संबंध रखनेवाले अनेक ग्रंथ यहां लिखे गये थे. वैदिक साहित्य आर्यों की प्राचीन दशा का विस्तृत हाल प्रकट करता है. रामायण में रघुवंश का और महाभारत में कुरुवंश का विस्तृत इतिहास एवं उस समय की इस देश की दशा तथा लोगों के आचार विचार आदि का वर्णन मिलता है. मत्स्य, वायु, विष्णु और भागवत आदि पुराणों में सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं की प्राचीन काल से लगा कर भारत के युद्ध के पीछे की कई शताब्दियों तक की वंशावलियां, कितने एक राजाओं का कुछ कुछ वृत्तांत एवं नंद, मौर्य, शुंग, कण्व और आंध्रवंशी राजाओं की नामावलियां तथा प्रत्येक राजा के राजत्वकाल के वर्षों की संख्या तक मिलती है. आंध्रों के पीछे के समय में भी अनेक ऐतिहासिक पुस्तक लिखे गये थे जिनमें से बाणभट्टरचित 'हर्षचरित'; वाक्पतिराज का 'गउडवहो'; पद्मगुप्त(परिमल)प्रणीत 'नवसाहसांकचरित'; बिल्हण का 'विक्रमांकदेवचरित'; संध्याकरनंदिरचित 'रामचरित'; कल्हण तथा जोनराज की 'राजतरंगिणी'; हेमचंद्ररचित 'द्व्याश्रयकाव्य' तथा 'कुमारपालचरित'; जयानक (जयरथ) का 'पृथ्वीराजविजय'; सोमेश्वर की 'कीर्तिकौमुदी'; अरिसिंहरचित 'सुकृतसंकीर्तन'; जयसिंहसूरि का 'हंमीरमदमर्दन'; मेरुतुंग का 'प्रबंधचिंतामणि'; राजशेखर का 'चतुर्विंशतिप्रबंध'; चंद्रप्रभसूरिप्रणीत 'प्रभावकचरित'; गंगादेवी रचित 'कंपरायचरितम्' (मधुराविजयम्); जयसिंहसूरि, चारित्रसुंदरगणि तथा जिनमंडनोपाध्याय के भिन्न भिन्न तीन 'कुमारपालचरित'; जिनहर्षगणि का 'वस्तुपालचरित'; नयचंद्रसूरिप्रणीत 'हंभीरमहाकाव्य'; आनंदभट्ट का 'बल्लालचरित'; गंगाधर पंडितरचित 'मंडलीकमहाकाव्य'; राजनाथ का 'अच्युतराजाभ्युदयकाव्य'; तथा 'मूषकवंशम्' आदि कई ग्रंथ अब तक मिल चुके हैं और नये मिलते जाते हैं. इनके अतिरिक्त हिंदी, गुजराती और तामिल आदि भाषाओं में लिखे हुए कई ऐतिहासिक पुस्तक मिले हैं, परंतु ये सब पुस्तक भी इस विस्तीर्ण देश पर राज्य करनेवाले अनेक राजवंशों में से थोड़ोंसों का कुछ इतिहास प्रकट करते हैं. इनमें बड़ी त्रुटि यह है कि बहुधा

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संवतों का तो अभाव ही है, और वे शुद्ध इतिहास की दृष्टि से नहीं किंतु काव्यरूप में अतिशयोक्ति से लिखे गये हैं.

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बुद्ध के समय से इधर का इतिहास जानने के लिये धर्मबुद्धि से अनेक राजवंशियों और धनाढ्य पुरुषों के बनवाये हुए बहुत से स्तूप, मंदिर, गुफा, तालाब, बावड़ी आदि पर लगाये हुए एवं स्तंभों और मूर्तियों के आसनों पर खुदे हुए अनेक लेख, जो मुसलमानों से बचने पाये, तथा मंदिर मठ आदि के अर्पण की हुई अथवा ब्राह्मणादि को दी हुई भूमि के दानपत्र एवं अनेक राजाओं के सिक्के, जो सांप्रतकाल में सत्य इतिहास के मुख्य साधन माने जाते हैं, बहुतायत के साथ उपलब्ध होने से उनके द्वारा बहुत कुछ प्राचीन इतिहास मालूम हो सकता था; परंतु उनकी ओर किसीने दृष्टि न दी और समय के साथ लिपियों में परिवर्तन होते रहने से प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी लोग भूल गये जिससे इतिहास के ये अमूल्य साधन हर एक प्रदेश में, कहीं अधिक कहीं कम, उपस्थित होने पर भी निरुपयोगी हो गये.

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देहली के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने अशोक के लेखवाले दो स्तंभ ला कर देहली में खड़े करवाये. उनपर के लेखों का आशय जानने के लिये सुल्तान ने बहुत से विद्वानों को एकत्र किया; परंतु वे उन लेखों को न पढ़ सके. ऐसा भी कहते हैं कि बादशाह अकबर को भी उन लेखों का आशय जानने की बहुत कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान् ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जिज्ञासा पूर्ण कर सकता. प्राचीन लिपियों का पढ़ना भूल जाने के कारण जब कहीं ऐसा प्राचीन लेख मिल आता है कि जिसके अक्षर पढ़े नहीं जाते तो उसको देख कर लोग अनेक कल्पना करते हैं. कोई उसके अक्षरों को देवताओं के अक्षर बतलाते हैं, कोई गड़े हुए धन का बीजक कहते और कोई उसको सिद्धिदायक यंत्र बतलाते हैं. इस अज्ञान के कारण प्राचीन वस्तुओं की कुछ भी कद्र न रही इतना ही नहीं किंतु टूटे हुए मंदिरों आदि के शिलालेख तोड़ फोड़ कर कहीं मामूली पत्थरों की तरह चुनाई के काम में लाये गये; कहीं उनकी भंग, मसाला आदि पीसने की सिलाएं बनाई गईं; और कहीं नये मंदिर, मकान आदि की सीढ़ियां, छपने आदि बनाने में भी वे काम में लाये गये जिसके अनेक उदाहरण मिले हैं. कई प्राचीन ताम्रपत्र तांबे के भाव बेचे जा कर उनके बरतन बनाये गये. सोने चांदी के असंख्य सिक्के गलाये जा कर उनके जेवर बने और अब तक बनते जाते हैं. तांबे के प्राचीन सिक्के तो अब तक सालाना मनों गलाये जाते हैं.

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विद्या की अवनति के साथ हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बची खुची सामग्री की यह दशा हुई. प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों का मिलना भी सर्व साधारण के लिये कठिन हो गया जिस-से प्रायः १७५ वर्ष ही पहिले तक इस देश के मुसलमानों के पूर्व के इतिहास की यह दशा थी कि विक्रम, बाप्पा रावल, भोज, सिद्धराज जयसिंह, पृथ्वीराज, जयचंद, रावल समरसी (समरसिंह) आदि प्रसिद्ध राजाओं के नाममात्र सुनने में आते थे परंतु यह कोई नहीं जानता था कि वे कब हुए और उनके पहिले उन वंशों में कौन कौन से राजा हुए. भोज का चरित्र लिखनेवाले बल्लाल पंडित को भी यह मालूम न था कि मुंज (वाक्पतिराज) सिंधुराज (सिंधुल) का बड़ा भाई था और उसके मारे जाने पर सिंधुराज को राज्य मिला था, क्यों कि ‘भोजप्रबन्ध’ में सिंधुल (सिंधुराज) के मरने पर उसके छोटे भाई मुंज का राजा होना लिखा है. जब भोज का इतिहास लिखनेवाले को भी भोज के वंश के इतिहास का सामान्य ज्ञान भी न था तब सर्व साधारण में ऐतिहासिक ज्ञान की क्या अवस्था होनी चाहिये यह सहज ही अनुमान हो सकता है. ऐसी दशा में बड़वों (भाटों), जागों आदि ने राजाओं की ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पूर्व की वंशावलियां गढ़ंत कर सैंकड़ों मन-माने नाम उनमें दर्ज कर दिये और वे पुस्तक भी इतिहास के सच्चे साधन और अमूल्य समझे जा कर बहुत गुप्त रक्खे जाने लगे.

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इस देश पर सर्कार अंग्रेज़ी का राज्य होने पर देश भर में फिर शांति का प्रचार हुआ, कलकत्ता सर्कार अंग्रेज़ी की राजधानी बना और विद्या का सूर्य, जो कई शताब्दियों से अस्त सा हो रहा था, फिर उदय हुआ. पश्चिमी शैली से अंग्रेज़ी की पढ़ाई शुरू होने के साथ संस्कृत और देशी भाषाओं की पढ़ाई भी होने लगी. कई अंग्रेज़ों ने केवल विद्यानुराग से संस्कृत पढ़ना शुरू किया और सर विलियम जोन्स ने शाकुंतल नाटक का अंग्रेज़ी अनुवाद किया जिससे कविकुलगुरु कालिदास को यूरोप के सर्वोत्तम कवि शेक्सपिअर का पद मिला इतना ही नहीं किंतु हिंदुओं का संस्कृत साहित्य कितनी उच्च कोटि का है यह दुनिया को मालूम हुआ और क्रमशः यूरोप में भी संस्कृत का पठनपाठन शुरू हुआ.

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ई. स. १७८४ में सर विलियम जोन्स के यत्न से एशिया के इतिहास, शिल्प, साहित्य आदि के शोध के लिये कलकत्ते में 'एशियाटिक सोसाइटी बंगाल' नाम का समाज स्थापित हुआ. तब से ही भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की खोज का प्रारंभ हुआ मानना चाहिये. कई अंग्रेज़ और देशी विद्वानों ने समाज का उद्देश सफल करने को लेख लिखे जो ई. स. १७८८ में 'एशियाटिक रिसर्चेस' (एशियासंबंधी शोध) नामक ग्रंथमाला की पहिली जिल्द में प्रकाशित हुए और ई. स. १७६७ तक उक्त ग्रंथमाला की ५ जिल्दें प्रकट हुई. ई. स. १७६८ में उनका नया संस्करण चोरी से ही इंग्लैंड में छापा गया. उनकी मांग यहां तक बढ़ी कि पांच छः बरसों में ही उनके दो और संस्करण छप गये और ऍम. ए. लंबॉम् नामक विद्वान् ने 'रिसर्चेज् एशियाटिक्स' नाम से उनका फ्रेंच अनुवाद भी छाप डाला जिसकी बहुत कुछ प्रशंसा हुई. ई. स. १८३६ तक उक्त ग्रंथमाला की २० जिल्दें छप गईं फिर उसका छपना तो बंद हो गया परंतु ई. स. १८३२ से 'जर्नल ऑफ़ दी एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल' नामक उक्त समाज का सामयिक पत्र निकलना प्रारंभ हुआ जो अब तक साक्षर वर्ग की बड़ी सेवा कर रहा है.

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इस प्रकार उक्त समाज के द्वारा एशिया के प्राचीन शोध की ओर यूरोप में भी विद्वानों का ध्यान गया और ई. स. १८२३ के मार्च में लंदन नगर में उसी उद्देश से 'रॉयल एशियाटिक सोसाइटी' नामक समाज स्थापित हुआ और उसकी शाखाएं बंबई और सीलोन में भी स्थापित हुईं. ऐसे ही समय समय पर फ्रान्स, जर्मनी, इटली आदि यूरोप के अन्य देशों तथा अमेरिका, जापान आदि में भी एशियासंबंधी भिन्न भिन्न विषयों के शोध के लिये समाज स्थापित हुए जिनके जर्नलों (सामयिक पुस्तकों) में भारतवर्ष के प्राचीन शोधसंबंधी विषयों पर अनेक लेख प्रकट हुए और होते ही जा रहे हैं. यूरोप के कई विद्वानों ने चीनी, तिब्बती, पाली, अरबी आदि भाषाएं पढ़ कर उनमें से जो कुछ सामग्री भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश डालनेवाली थी वह एकत्रित कर बहुत कुछ प्रकाशित की.

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एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के द्वारा कार्य आरंभ होते ही कई विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों के शोध में लगे. कितने एक विद्वानों ने यहां के ऐतिहासिक शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्कों का टटोलना शुरू किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर विद्वानों की दृष्टि पड़ी. भारतवर्ष जैसे विशाल देश में लेखनशैली के प्रवाह ने लेखकों की भिन्न रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण किये थे जिससे प्राचीन ब्राह्मी लिपि से गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा, बंगला, पश्चिमी, मध्यदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग तामिळ आदि अनेक लिपियां निकलीं और समय समय पर उनके कई रूपांतर होते गये जिससे सारे देश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना कठिन हो गया था; परंतु चार्ल्स विल्किन्स, पंडित राधाकांत शर्मा, कर्नल जेम्स टॉड के गुरु यति ज्ञानचंद्र, डॉक्टर बी. जी. बॅबिंगटन्, वॉल्टर इलिअट्, डा. मिल, डब्लयू. ऍच. वॅथन्, जेम्स प्रिन्सेप आदि विद्वानों ने ब्राह्मी और उससे निकली हुई उपर्युक्त लिपियों को बड़े परिश्रम से पढ़ कर उनकी वर्ण- मालाओं का ज्ञान प्राप्त किया. इसी तरह जेम्स प्रिन्सेप, मि॰ नॉरिस तथा जनरल कर्निंगहाम आदि विद्वानों के श्रम से विदेशी खरोष्ठी लिपि की वर्णमाला भी मालूम हो गई. इन सब विद्वानों का यत्न प्रशंसनीय है परंतु जेम्स प्रिन्सेप का अगाध श्रम, जिससे अशोक के समय की ब्राह्मी लिपि का तथा खरोष्ठी लिपि के कई अक्षरों का ज्ञान प्राप्त हुआ, विशेष प्रशंसा के योग्य है. (प्राचीन लिपियों के पढ़े जाने के वृत्तान्त के लिये देखो, इस पुस्तक के पृष्ठ ३७-४१).

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प्रारंभ में इस देश में प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य हुआ वह भिन्न भिन्न विद्वानों और समाजों के द्वारा ही होता रहा. ई. स. १८४४ में रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने सरकारी तौर से भी इस कार्य का किया जाना आवश्यक समझ कर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में निवेदन किया और ई. स. १८४७ में लॉर्ड हार्डिंग्ज के प्रस्ताव पर ‘बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर्स’ ने इस काम के लिये खर्च की मंजूरी दी परंतु ई. स. १८६० तक उसका वास्तविक फल कुछ भी न हुआ. ई. स. १८६१ में संयुक्त प्रदेश के चीफ़ इंजीनियर कर्नल ए. कनिंगहाम ने इस विषय की योजना तय्यार कर भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग की सेवा में पेश की जो स्वीकृत हुई और सरकार की ओर से ‘आर्किऑलॉजिकल सर्वे’ नामक महकमा कायम हुआ तथा जनरल कनिंगहाम उसके अध्यक्ष नियत हुए. सरकार के इस बड़े उपयोगी कार्य को हाथ में लेने से प्राचीन शोध के काम में बहुत कुछ उन्नति हुई. जनरल कनिंगहाम ने उत्तरी और डॉ. जेम्स बर्जेस ने पश्चिमी व दक्षिणी भारत में प्राचीन शोध का कार्य किया. इन दोनों विद्वानों ने कई उत्तम रिपोर्टें छाप कर बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की. ई. स. १८७२ से डॉ. बर्जेस ने ‘इंडियन ऐंटिक्वेरी’ नामक भारतीय प्राचीन शोध का मासिक पत्र निकालना प्रारंभ किया जो अब तक चल रहा है और जिसमें प्राचीन शोध संबंधी लेखों के अतिरिक्त अनेक शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्के छप चुके हैं. ई. स. १८७७ में गवर्नमेंट की तरफ से जनरल कनिंगहाम ने उस समय तक मौर्य वंशी राजा अशोक के जितने शिलालेख मालूम हुए थे उनका एक पुस्तक और ई. स. १८८८ में जे. एफ़. फ्लीट ने गुप्तों और उनके समकालीन राजाओं के शिलालेखों तथा दानपत्रों का अनुपम ग्रंथ प्रकट किया. उसी वर्ष से आर्किऑलॉजिकल सर्वे के महकमे से ‘ऐपियाफ़िआ इंडिका’ नामक त्रैमासिक पुस्तक का छपना प्रारंभ हुआ, जिसमें केवल शिलालेख और दानपत्र ही प्रकट होते हैं. इस समय इसकी १४ वीं जिल्द छप रही है. प्राचीन इतिहास के लिये ये जिल्दें रत्नाकर के समान हैं. ऐसे ही उसी महकमे की ओर से ई. स. १८६० से ‘साउथ इंडियन इन्स्क्रिप्शन्स’ नामक पुस्तक का छपना भी प्रारंभ हुआ, जिसमें दक्षिण के संस्कृत, तामिळ आदि भाषाओं के शिलालेख और दानपत्र छपते हैं और जिसकी ८ हिस्सों में ३ जिल्दें अब तक छप चुकी हैं. ये भी बड़े महत्व की हैं.

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प्राचीन विषयों के प्रेमी लॉर्ड कर्जन ने आर्किऑलॉकिल विभाग को विशेष उन्नति दी और डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्किऑलॉजी की अध्यक्षता में भारत के प्रत्येक विभाग के लिये अलग अलग सुपरिंटेंडेंट नियत किये. तब से प्राचीन शोध के इस विभाग का कार्य विशेष उत्तमता से चल रहा है और डाइरेक्टर जनरल एवं भिन्न भिन्न विभागों के सुपरिंटेंडेंटों की सालाना रिपोर्टों में बहुतसे उपयोगी विषय भरे रहते हैं.

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प्राचीन शोध के कार्य के संबंध में भिन्न भिन्न समाजों तथा सरकार ने प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्के, मुद्राएं, प्राचीन मूर्तियां तथा शिल्प के उत्तम उत्तम नमूने आदि प्राचीन वस्तुओं का संग्रह करना भी शुरू किया और ऐसी वस्तुओं के बड़े बड़े संग्रह बंबई (एशियाटिक सोसाइटी में), कलकत्ता (इंडियन म्यूज़िअम और एशियाटिक सोसाइटी बंगाल में), मद्रास, नागपुर, अजमेर, लाहोर, पेशावर, मथुरा, लखनऊ आदि के म्यूज़िममों (अजायबघरों) में संगृहीत हो चुके हैं और

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उनमें से कई एक की सूचियां भी छप गई हैं. जनरल कनिंगहाम ने अपने संग्रह के भारतीय प्राचीन सिक्कों की चार जिल्दें१ और लंदन के ब्रिटिश म्यूज़िअम् ने अपने संग्रह की तीन२ जिल्दें छपवाईं. ऐसे ही पंजाब म्यूज़िअम् (लाहोर), इंडियन म्यूज़िअम् आदि के संग्रहों के सिक्कों की चित्रों सहित सूचियां छप चुकी हैं. इंडियन ऐंटिकेरी, आर्किऑलॉजिकल सर्वे की भिन्न भिन्न रिपोर्टों, एशियाटिक सोसाइटियों के जर्नलों तथा कई स्वतंत्र पुस्तकों में भी कई सिक्के प्रकट हुए हैं.

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२ 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी ग्रीक ऐंड सीथिक किंग्स ऑफ़ बाकट्रिया ऐंड इंडिया'; 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी आन्ध्र डाइनेस्टी, दी वेस्टर्न क्षत्रप्स, दी त्रैकूटक डाइनेस्टी ऐंड दी बोधि डाइनेस्टी'; और 'दी कॉइन्स ऑफ़ दी गुप्त डाइनेस्टीज़'.

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जब सरकार अंग्रेज़ी की तरफ से प्राचीन शोध का प्रशंसनीय कार्य होने लगा तब कितने एक विद्याप्रेमी देशी राज्यों ने भी अपने यहां प्राचीन शोधसंबंधी कार्यालय स्थापित किये. भावनगर दरबार ने अपने पंडितों के द्वारा काठियावाड़, गुजरात और राजपूताना के अनेक शिलालेख और दानपत्रों की नकलें तय्यार करवा कर उनमें से कई एक 'भावनगर प्राचीनशोधसंग्रह' (भाग प्रथम) और 'भावनगर इन्स्क्रिप्शनस्' नामक पुस्तकों में प्रकट किये. काठियावाड़ के पोलिटिकल एजेंट कर्नल वॉटसन् का प्राचीन वस्तुओं का प्रेम देख कर काठियावाड़ के राजाओं ने मिल कर राजकोट में 'वॉटसन म्यूज़िअम्' स्थापित किया जिसमें कई प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों और पुस्तकों आदि का अच्छा संग्रह है. माईसोर राज्य ने ऐसी वस्तुओं का संग्रह किया इतना ही नहीं किंतु प्राचीन शोध के लिये आर्किऑलॉजिकल विभाग स्थापित कर अपने विस्तृत राज्य में मिलनेवाले हज़ारों शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों को 'एपिप्राफ़िया कर्नाटिका' नामक ग्रंथमाला की कई बड़ी बड़ी जिल्दों में प्रसिद्ध किया और ई. स. १८८५ से अपने प्राचीन शोध विभाग की सालाना रिपोर्टें भी, जो बड़े महत्व की हैं, छपाना आरंभ किया. चंबा राज्य ने प्राचीन वस्तुओं का अच्छा संग्रह किया जिसके प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों को प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. फोजल ने 'ऐंटिकिटीज़ ऑफ़ दी चंबा स्टेट' नामक अमूल्य ग्रंथ में प्रसिद्ध कर प्राचीन लिपियों का अभ्यास करनेवालों के लिये शारदा लिपि की बड़ी सामग्री एकत्रित कर दी. ट्रावनकोर तथा हैदराबाद राज्यों ने भी अपने यहां वैसा ही प्रशंसनीय कार्य प्रारंभ कर दिया है. उदयपुर (मेवाड़), झालावाड़, ग्वालियर, धार, भोपाल, बड़ौदा, जूनागढ़, भावनगर आदि राज्यों में भी प्राचीन वस्तुओं के संग्रह हुए हैं और होते जाते हैं.

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१ 'कॉइन्स ऑफ़ एन्श्यंट इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ मिडिएवल् इंडिया'; 'कॉइन्स ऑफ़ दी इंडोसीथियन्स'; और 'कॉइन्स ऑफ़ दी लेटर इंडोसीथियन्स'.

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इस प्रकार सरकार अंग्रेज़ी की उदार सहायता, और एशियाटिक सोसाइटियों, देशी राज्यों, साधारण गृहस्थों तथा विद्वानों के श्रम से हमारे यहां के प्राचीन इतिहास की बहुत कुछ सामग्री उपलब्ध हुई है जिससे नंद, मौर्य, ग्रीक, शातकर्णी (आंध्रभृत्य), शक, पार्थिअन, कुशन, क्षत्रप, अभीर, गुप्त, हूण, यौधेय, बैस, लिच्छिवि, परिव्राजक, राजर्षितुल्य, वाकाटक, मुखर (मौखरी), मैत्रक, गुहिल, चापोट्कट (चावड़े), चालुक्य (सोलंकी), प्रतिहार (पड़िहार), परमार, चाहमान (चौहान), राष्ट्रकूट (राठौड़), कच्छपघात (कछवाहा), तोमर (तंवर), कलचुरि (हैहय), त्रैकूटक, चंद्रात्रेय (चंदेल), यादव, गुर्जर, मिहिर, पाल, सेन, पल्लव, चोल, कदंब, शिलार, सेंद्रक, काकतीय, नाग, निकुंभ, बाण, मत्स्य, शालंकायन, शैल, मूषक, चतुर्थवर्ण (रेड्डि) आदि अनेक राजवंशों का बहुत कुछ वृत्तांत, उनकी वंशावलियां एवं कई एक राजाओं का निश्चित समय भी मालूम होता है इतना ही नहीं, किंतु अनेक विद्वानों, धर्माचार्यों, धनाढ्यों, दानी, वीर आदि प्रसिद्ध पुरुषों के नाम, उनके वृत्तांत तथा समय

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आदि का पता चलता है. ऐसे ही भारत के भिन्न भिन्न प्रदेशों में चलनेवाले भिन्न भिन्न संवतों के प्रारंभ का निश्चय होता है. इसी तरह प्राचीन काल के देशों, ज़िलों, नगरों, गांवों आदि भूगोल से संबंध रखनेवाले नामों तथा उनके वर्तमान स्थलों का ज्ञान हो सकता है. प्राचीन शोध के संबंध में जो कुछ कार्य अब तक हुआ है वह बड़े महत्व का है तो भी यह कहना अनुचित न होगा कि वह अब तक प्रारंभिक दशा में है और इस विशाल देश के किभी किभी अंश में ही हुआ है. आगे के लिये इतना विस्तीर्ण क्षेत्र बिना टटोला हुआ पड़ा है कि सैकड़ों विद्वान् बहुत वर्षों तक लगे रहें तो भी उसकी समाप्ति होना कठिन है.

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हमारे यहां प्राचीन शोध का कार्य बहुत ही आवश्यक है और जितने अधिक विद्वान् उधर प्रवृत्त हों उतना ही अधिक लाभकारी होगा परंतु अभी तक उसमें बहुत ही कम विद्वानों की रुचि प्रवृत्त हुई है. इसका मुख्य कारण यही है कि तत्संबंधी साहित्य इतने भिन्न भिन्न पुस्तकों में बिखरा हुआ है कि बंबई, कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को, जहां पर उत्तम पुस्तकालय हैं, छोड़ कर अन्यत्र उन सब पुस्तकों का दर्शन होना भी कठिन है.

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ई. स. १८६३ तक कोई ऐसा पुस्तक नहीं बना था कि केवल उस एक ही पुस्तक की सहायता से हिमालय से कन्याकुमारी तक और द्वारिका से उड़ीसे तक की समस्त प्राचीन लिपियों का पढ़ना कोई भी विद्वान् आसानी के साथ सीख सके. इस अभाव को मिटाने के लिये मैंने ई. स. १८६४ में 'प्राचीन लिपिमाला' नामक छोटासा पुस्तक प्रकट किया, जिसको यहां के और यूरोप के विद्वानों ने उपयोगी बतलाया इतना ही नहीं किंतु उसको इस विषय का प्रथम पुस्तक प्रकट कर उसका आदर किया. उस समय तक इस विषय का कोई पाठ्य पुस्तक न होने के कारण विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में प्राचीन लिपियों को स्थान नहीं मिला था परंतु उक्त पुस्तक के प्रसिद्ध होने के पीछे प्राचीन लिपियों का विषय विश्वविद्यालयों की एम. ए. की पढ़ाई में रक्खा गया और कलकत्ता युनिवर्सिटी ने इस पुस्तक को उक्त विषय का पाठ्य पुस्तक स्थिर किया. ऐसे ही अन्य युनिवर्सिटियों के विद्यार्थी लोग भी अपनी पढ़ाई में उक्त पुस्तक का सहारा लेने लगे. कई देशी एवं यूरोपियन् विद्वानों ने उससे भारतीय प्राचीन लिपियों का पढ़ना सुगमता के साथ सीखा. थोड़े ही बरसों में उसकी सब प्रतियां उठ गई इतना ही नहीं, किंतु उसकी मांग यहां तक बढ़ी कि बीस गुना मूल्य देने पर भी उसका मिलना कठिन हो गया. इसपर मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने उसका नवीन संस्करण छपवाने का आग्रह किया; परंतु गत २५ वर्षों में प्राचीन शोध में बहुत कुछ उन्नति हुई जिससे उसी को दुबारा छपवाना ठीक न समझ कर मैंने अब तक के शोध के साथ यह विस्तृत नवीन संस्करण तय्यार किया है जो प्रथम संस्करण से करीब तिगुने से भी अधिक बढ़ गया है. इसमें पहिले संस्करण से बहुत अधिक शिलालेखों, दानपत्रों और सिक्कों से वर्णमालाएं बनाई गई हैं और वे लिपियों के विकासक्रम के अनुसार जमाई गई हैं जिससे गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा (कश्मीरी), बंगला, पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग, तामिळ आदि लिपियों का एक ही सामान्य लिपि ब्राह्मी से क्रमशः विकास कैसे हुआ एवं भारतवर्ष की सब वर्तमान आर्य लिपियों की उत्पत्ति कैसे हुई यह आसानी से मालूम हो सकता है.

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इस बड़े ग्रंथ को देख कर कोई विद्वान् यह शंका न करें कि इतनी बहुत लिपियों का ज्ञान संपादन कर भारत के प्राचीन लेखादि का पढ़ना बहुत ही कठिन है, क्योंकि वास्तव में यह बात नहीं है केवल एक प्रारंभ की ब्राह्मी लिपि को समझते ही आगे के लिये मार्ग बहुत ही सुगम हो जाता है जिस का कारण यही है कि आगे की लिपियों में बहुत ही थोड़ा थोड़ा अंतर पड़ता जाता है जिससे उनके सीखने में अधिक श्रम नहीं पड़ता. मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि संस्कृतज्ञ विद्वान् छः मास से भी कम समय में इस पुस्तक के सहारे प्राचीन लिपियों के पढ़ने का ज्ञान अच्छी तरह

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संपादन कर सकता है. मेरे पास आकर पढ़नेवालों में से एक विद्वान् ने तो उससे भी थोड़े समय में अच्छी तरह पढ़ना सीख लिया.

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मनुष्य की बुद्धि के सब से बड़े महत्व के दो कार्य भारतीय ब्राह्मी लिपि और वर्तमान शैली के अंकों की कल्पना हैं. इस बीसवीं शताब्दी में भी हम संसार की बड़ी उन्नतिशील जातियों की लिपियां की तरफ़ देखते हैं तो उनमें उन्नति की गंध भी नहीं पाई जाती. कहीं तो ध्वनि और उसके सूचक चिह्नों (अक्षरों) में साम्य ही नहीं है जिससे एक ही चिह्न से एक से अधिक ध्वनियां प्रकट होती हैं और कहीं एक ही ध्वनि के लिये एक से अधिक चिह्नों का व्यवहार होता है और अक्षरों के लिये कोई शास्त्रीय क्रम ही नहीं. कहीं लिपि वर्णात्मक नहीं किंतु चित्रात्मक ही है. ये लिपियां मनुष्य जाति के ज्ञान की प्रारंभिक दशा की निर्माण स्थिति से अब तक कुछ भी आगे नहीं बढ़ सकीं परंतु भारतवर्ष की लिपि हजारों वर्षों पहिले भी इतनी उच्च कोटि को पहुंच गई थी कि उसकी उत्तमता की कुछ भी समानता संसार भर की कोई दूसरी लिपि अब तक नहीं कर सकती. इसमें ध्वनि और लिखितवर्ण का संबंध ठीक वैसा ही है जैसा कि फोनोग्राफ़ की ध्वनि और उसकी चूड़ियों पर के चिह्नों के बीच है. इसमें प्रत्येक आर्य ध्वनि के लिये अलग अलग चिह्न होने से जैसा बोला जावे वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जावे वैसा ही पढ़ा जाता है तथा वर्णक्रम वैज्ञानिक रीति से स्थिर किया गया है. यह उत्तमता किसी अन्य लिपि में नहीं है. ऐसे ही प्राचीन काल में संसार भर की अंक विद्या भी प्रारंभिक दशा में थी. कहीं अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों के लिये काम में लाते थे, तो कहीं इकाई के १ से ६ तक के ६ चिह्न, एवं दहाइयों के १० से ६० तक के ६, और सैकड़ा, हज़ार आदि के भिन्न भिन्न चिह्न थे. उन २० चिह्नों से केवल एक लाख के नीचे की ही संख्या प्रकट होती थी और प्रत्येक चिह्न अपनी नियत संख्या ही प्रकट कर सकता था. भारतवर्ष में भी अंकों का प्राचीन क्रम यही था परंतु इस जटिल अंकक्रम से गणित विद्या में विशेष उन्नति नहीं हो सकती थी जिससे यहांवालों ने ही वर्तमान अंकक्रम निकाला जिसमें १ से ६ तक के नव अंक और खाली स्थानसूचक शून्य इन दस चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चल सकता है. भारतवर्ष से ही यह अंकक्रम संसार भर ने सीखा और वर्तमान समय में गणित और उससे संबंध रखनेवाले अन्य शास्त्रों में जो उन्नति हुई है वह इसी क्रम के कारण से ही है. इन्हीं दोनों बातों से प्राचीन काल के भारतीय आर्य लोगों की बुद्धि और विद्यासंबंधी उन्नत दशा का अनुमान होता है. इन्हीं दोनों विषयों एवं उनके समय समय के भिन्न भिन्न रूपोंतरों के संबंध का यह पुस्तक है.

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हिंदी भाषा में इस पुस्तक के लिखे जाने के दो कारण हैं. प्रथम तो यह कि हमारे यहां के केवल संस्कृत जाननेवाले बड़े बड़े पंडितों को जब कोई १००० वर्ष से अधिक प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्का या पुस्तक मिल जाता है तो वे जिस भाषा में वह लिखा गया हो उसके विद्वान् होने पर भी उसको पढ़ नहीं सकते जिससे उसकी लिपि को तिरंगी या कनड़ी आदि कह कर टाल जाते हैं और उसका आशय जान नहीं सकते. यह थोड़े खेद की बात नहीं है. यदि वे इस पुस्तक के सहारे थोड़े से श्रम से सारे भारतवर्ष की नहीं तो अपने प्रदेश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी सीख जावें तो उनकी विद्वत्ता के लिये सोने के साथ सुगंधि हो जाय और हमारे यहां के प्राचीन शोध को सहायता भी मिले. जिन विद्यापीठों में केवल संस्कृत की पढ़ाई होती है वहां की उच्च श्रेणियों में यदि यह पुस्तक पढ़ाया जावे तो संस्कृतज्ञ विद्वानों में जो इतिहास के ज्ञान की त्रुटि पाई जाती है उसकी कुछ पूर्ति हो जायगी. हिंदी न जाननेवाले जो विद्वान् प्राचीन शोध में अनुराग दिखाते हैं वे संस्कृत तो पढ़े ही होते हैं और देवनागरी लिपि से भी भली भांति परिचित होते हैं. भले ही वे इस पुस्तक

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के प्रारंभ के लेखों को न समझ सकें, तो भी लिपिपत्रों की सहायता से वे प्राचीन लिपियों का पढ़ना सीख सकते हैं. दूसरा कारण यह है कि हिंदी साहित्य में अब तक प्राचीन शोधसंबंधी साहित्य का अभाव सा ही है. यदि इस पुस्तक से उक्त अभाव के एक अणुमात्र अंश की भी पूर्ति हुई तो मुझ जैसे हिंदी के तुच्छ सेवक के लिये विशेष आनंद की बात होगी.

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इस पुस्तक का क्रम ऐसा रक्खा गया है कि ई. स. की चौथी शताब्दी के मध्य के आसपास तक की समस्त भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी रक्खी है. उसके बाद लेखनप्रवाह स्पष्ट रूप से दो स्रोतों में विभक्त होता है, जिनके नाम 'उत्तरी' और 'दक्षिणी' रक्खे हैं. उत्तरी शैली में गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा और बंगला लिपियों का समावेश होता है और दक्षिणी में पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग और तामिळ लिपियां हैं. इन्हीं मुख्य लिपियों से भारतवर्ष की समस्त वर्तमान (उर्दू के अतिरिक्त) लिपियां निकली हैं. अंत में खरोष्ठी लिपि दी गई है. १ से ७० तक के लिपिपत्रों के बनाने में क्रम ऐसा रक्खा गया है कि प्रथम स्वर, फिर व्यंजन, उसके पीछे क्रम से हलंत व्यंजन, स्वरमिलित व्यंजन, संयुक्त व्यंजन, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के चिह्नों सहित व्यंजन और अंत में 'ओं' का सांकेतिक चिह्न (यदि हो तो) दिया गया है. १ से ५६ तक और ६५ से ७० तक के लिपिपत्रों में से प्रत्येक के अंत में अभ्यास के लिये कुछ पंक्तियां मूल लेखादि से उद्धृत की गई हैं. उनमें शब्द समासों के अनुसार अलग अलग इस विचार से रक्खे गये हैं कि विद्यार्थियों को उनके पढ़ने में सुभीता हो. उक्त पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर भी पंक्ति क्रम से प्रत्येक लिपिपत्र के वर्णन के अंत में दे दिया है जिससे पढ़नेवालों को उन पंक्तियों के पढ़ने में कहीं संदेह रह जाय तो उसका निराकरण हो सकेगा. उन पंक्तियों में जहां कोई अक्षर अस्पष्ट है अथवा छूट गया है अक्षरांतर में उसको [ ] चिह्न के भीतर, और जहां कोई अशुद्धि है उसका शुद्ध रूप ( ) चिह्न के भीतर लिखा है. जहां मूल का कोई अंश जाता रहा है वहां......ऐसी बिंदियां बनादी हैं. जहां कहीं 'ङ्ख' और 'ङ्घ' संयुक्त व्यंजन मूल में संयुक्त लिखे हुए हैं वहां उनके संयुक्त टाइप न होने से प्रथम अक्षर को हलंत रखना पड़ा है परंतु उनके नीचे आड़ी लकीर बहुधा रख दी गई है जिससे पाठकों को मालूम हो सकेगा कि मूल में ये अक्षर एक दूसरे से मिला कर लिखे गये हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि उक्त लिपिपत्रों के अंत में दी हुई मूल पंक्तियों को पढ़ लेनेवाले को कोई भी अन्य लेख पढ़ लेने में कठिनता न होगी. लिपिपत्र ६० से ६४ में मूल पंक्तियां नहीं दी गईं जिसका कारण यह है कि उनमें तामिळ तथा वट्टेलुत्तु लिपियां दी गई हैं. वर्णों की कमी के कारण उन लिपियों में संस्कृत भाषा लिखी नहीं जा सकती, वे केवल तामिळ ही में काम दे सकती हैं और उनको तामिळ भाषा जाननेवाले ही समझ सकते हैं, तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं, जिनसे तामिळ जाननेवालों को उन लिपियों के लेखादि के पढ़ने में सहायता मिल सकेगी.

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लिपिपत्रों में दिये हुए अक्षरों तथा अंकों का समय निर्णय करने में जिन लेखादि में निश्चित संवत् मिले उनके तो वे ही संवत् दिये गये हैं, परंतु जिनमें कोई निश्चित संवत् नहीं है उनका समय बहुधा लिपियों के आधार पर ही या अन्य साधनों से लिखा गया है जिससे उसमें अंतर होना संभव है; क्योंकि किसी लेख या दानपत्र में निश्चित संवत् न होने की दशा में केवल उसकी लिपि के आधार पर ही उसका समय स्थिर करने का मार्ग निष्कंटक नहीं है. उसमें पचीस पचास ही नहीं किंतु कभी कभी तो सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की चूक हो जाना संभव है ऐसा मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं.

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टिप्पणों में दिये हुए संस्कृत के अवतरणों को हिंदी से भिन्न बतलाने के लिये बारीक टाइप में छापना आरंभ किया था परंतु टाइप कमज़ोर होने के कारण छपते समय कई अक्षरों के साथ की मात्राएं, और विशेष कर 'उ' की मात्राएं, टूट गईं जिससे परिशिष्ट में ऐसे अवतरणों के लिये पहिले से भिन्न टाइप काम में लाना पड़ा है.

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इस प्रकार के पुस्तक की रचना के लिये बहुत अधिक सामग्री एकत्र करने की आवश्यकता पड़ी. इस कार्य में मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने मेरी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका उपकार मानता हूं. उनमें से मुंशी हरबिलास सारडा बी. ए., जज, स्माल काज़ेज़ कोर्ट, अजमेर; प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता मुंशी देवीप्रसादजी जोधपुरवाले, और बाबू पूर्णचंद्र नाहर एम. ए., बी. एल., कलकत्ता, विशेष धन्यवाद के पात्र हैं.

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इस पुस्तक के संबंध में मेरे विद्वान मित्र पंडित चंद्रधरशर्मा गुलेरी, बी. ए., हेड पंडित, मेयो कॉलेज, अजमेर, ने बड़ी सहायता की है जिसके लिये मैं उनका विशेष रूप से अनुगृहीत हूं. जिन विद्वानों के लेख और ग्रंथों से मैंने सहायता ली है उनके नाम यथास्थान दिये गये हैं. उन सब का भी मैं ऋणी हूं. पंडित जीयालालशर्मा ने लिपिपत्र बनाने और मि. जे. इंगलिस, मैनेजर, स्कॉटिश मिशन प्रेस, अजमेर, ने इस पुस्तक को उत्तमता से छापने में बड़ा परिश्रम उठाया है इस लिये मैं उनको भी धन्यवाद देना अपना कर्तव्य समझता हूं.

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राजपूताना म्यूज़िअम्, अजमेर, वि. सं. १६७५ श्रावण शुक्ला ६, ता. १३ ऑगस्ट ई. स. १६१८.

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गौरीशंकर हीराचंद ओझा.

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