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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.25

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.25

Language
Hindi

c4.25

हिंदी भाषा में इस पुस्तक के लिखे जाने के दो कारण हैं. प्रथम तो यह कि हमारे यहां के केवल संस्कृत जाननेवाले बड़े बड़े पंडितों को जब कोई १००० वर्ष से अधिक प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्का या पुस्तक मिल जाता है तो वे जिस भाषा में वह लिखा गया हो उसके विद्वान् होने पर भी उसको पढ़ नहीं सकते जिससे उसकी लिपि को तिरंगी या कनड़ी आदि कह कर टाल जाते हैं और उसका आशय जान नहीं सकते. यह थोड़े खेद की बात नहीं है. यदि वे इस पुस्तक के सहारे थोड़े से श्रम से सारे भारतवर्ष की नहीं तो अपने प्रदेश की प्राचीन लिपियों का पढ़ना भी सीख जावें तो उनकी विद्वत्ता के लिये सोने के साथ सुगंधि हो जाय और हमारे यहां के प्राचीन शोध को सहायता भी मिले. जिन विद्यापीठों में केवल संस्कृत की पढ़ाई होती है वहां की उच्च श्रेणियों में यदि यह पुस्तक पढ़ाया जावे तो संस्कृतज्ञ विद्वानों में जो इतिहास के ज्ञान की त्रुटि पाई जाती है उसकी कुछ पूर्ति हो जायगी. हिंदी न जाननेवाले जो विद्वान् प्राचीन शोध में अनुराग दिखाते हैं वे संस्कृत तो पढ़े ही होते हैं और देवनागरी लिपि से भी भली भांति परिचित होते हैं. भले ही वे इस पुस्तक