भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.116
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.116
- Language
- Hindi
c7.116
तैत्तिरीय संहिता में ऐंद्रवायव नामक ग्रह (सोमपात्र) दोनों देवताओं (इंद्र और वायु) को एक ही दिये जाने के कारण का वर्णन करते समय लिखा है कि ‘[पहले] वाणी अस्पष्ट और अनियमित (बिना व्याकरण के) थी. देवताओं ने इंद्र से कहा कि तुम इसका हमारे लिये व्याकरण (नियमबंधन) कर दो. इंद्र ने कहा कि मैं [इस काम के लिये] यह वर मांगता हूं कि यह (सोम-पात्र) मेरे तथा वायु के लिये एक ही लिया जाय. इससे ऐंद्रवायव ग्रह शामिल ही लिया जाता है. इंद्र ने वाणी को बीच में से पकड़ कर व्याकृत किया. इसलिये वाणी व्याकृत (व्याकरणवाली, नियमबद्ध) कही जाती है’१३. यही कथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलती है परंतु उसमें ‘वि+आ+कृ’ धातु के स्थान पर ‘निर् + वच्’ धातु से बने हुए ‘निर्वचन’ और ‘निरुक्त’ शब्द काम में लिये हैं, और यह कहा है कि इंद्रने पशु, वयस् (पक्षी) और सरीसृपों (रेंगनेवालों) की वाणी को छोड़ कर