भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7: १—भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7
- Language
- Hindi
१—भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता
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भारतीय आर्य लोगों का मत यह है कि उनके यहां बहुत प्राचीन काल से लिखने का प्रचार चला आता है और उनकी लिपि (ब्राह्मी), जिसमें प्रत्येक अक्षर या चिन्ह एक ही ध्वनि या उच्चारण का सूचक है और जो संसारभर की लिपियों में सब से सरल और निर्दोष है, स्वयं ब्रह्मा१ ने बनाई है; परंतु कितने एक यूरोपियन विद्वानों का यह कथन है कि भारतीय आर्य लोग पहिले लिखना नहीं जानते थे, उनके वेदादि ग्रंथों का पठनपाठन केवल कथनश्रवणद्वारा ही होता था और पीछे से उन्होंने विदेशियों से लिखना सीखा.
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१ षाण्मासिके तु समये भ्रान्तिः संजायते यतः। धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढान्यतः पुरा॥ ('आन्हिकतत्व' और 'ज्योतिस्तत्व' में वृहस्पति का वचन). नाकरिष्यद्यदि ब्रह्मा लिखितं चक्षुरुत्तमम्। तत्रेयमस्य लोकस्य नाभविष्यत् शुभा गतिः॥ (नारदस्मृति). वृहस्पतिरचित मनु के वार्तिक में भी ऐसा ही लिखा है (से. बु. ई; जिल्द २३, पृ. ३०४); और चीनी यात्री ह्युएन्त्संग, जिसने ई. स. ६२६ से ६४५ तक इस देश की यात्रा की, लिखता है कि 'भारतवासियों की वर्णमाला के अक्षर ब्रह्मा ने बनाये थे और उनके रूप (रूपांतर) पहले से अब तक चले आ रहे हैं' (बी;बु.रे.वे.व; जिल्द १, पृ. ७७).
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मैक्समूलर ने लिखा है कि 'मैं निश्चय के साथ कहता हूं कि पाणिनि की परिभाषा में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो यह सूचित करे कि लिखने की प्रणाली पहिले से थी',२ और वह पाणिनि का समय ईसवी सन् पूर्व की चौथी शताब्दी मानता है.
c7.4
२ मॅ; हि. ए. सं. लि; पृ. २६२ (अलाहाबाद का छुपा.)
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बर्नेल का कथन है कि 'फ़िनिशियन लोगों से भारतवासियों ने लिखना सीखा और फ़िनिशियन३ अक्षरों का, जिनसे दक्षिणी अशोकलिपि (ब्राह्मी) बनी, भारतवर्ष में ई.स. पूर्व ५०० से पहिले प्रवेश नहीं हुआ और संभवतः ई.स. पूर्व ४०० से पहिले नहीं'.४
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३ फ़िनिशियन=फ़िनिशिआ के रहने वाले. एशिया के उत्तरपश्चिमी द्विभाग के 'सीरिआ' नामक देश (तुर्कराज्य में) को ग्रीक (यूनानी) तथा रोमन लोग 'फ़िनिशिआ' कहते थे. वहां के निवासी प्राचीन काल में बड़े व्यवसायी तथा शिक्षित थे. उन्होंने ही यूरोप वालों को लिखना सिखलाया और यूरोप की प्राचीन तथा प्रचलित लिपियां उन्हींकी लिपि से निकली हैं.
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४ ब; सा. इं. पे; पृ. ६.
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प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता बूलर, जो 'सेमिटिक'५ लिपि से ही भारतवर्ष की प्राचीन लिपि (ब्राह्मी) की उत्पत्ति मानता है, मैक्समूलर तथा बर्नेल के निर्णय किये समय को स्वीकार न कर लिखता है कि 'ई.स. पूर्व ५०० के आसपास, अथवा उससे भी पूर्व, ब्राह्मी लिपि का बड़े श्रम से निर्माण करने का कार्य समाप्त हो चुका था और भारतवर्ष में 'सेमिटिक' अक्षरों के प्रवेश का समय ई.स. पूर्व ८०० के क़रीब माना जा सकता है, तो भी यह अनुमान अभी स्थिर नहीं कहा जा सकता. भारतवर्ष या सेमिटिक देशों के और प्राचीन लेखों के मिलने से इसमें परिवर्तन की आवश्यकता हुई तो अभी अभी मिले हुए प्रमाणों से मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि [भारतवर्ष] में लिपि के प्रवेश का समय
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५ अरबी, इथिओपिक, अरमइक, सीरिअक, फ़िनिशियन, हिब्रु आदि पश्चिमी एशिया और आफ़्रिका खंड की भाषाओं तथा उनकी लिपियों को 'सेमिटिक' अर्थात् बाइबलप्रसिद्ध नूह के पुत्र शेम की संतति की भाषाएं और लिपियां कहते ह.
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अधिक प्राचीन सिद्ध होगा। और उसके वास्ते शायद ई. स. पूर्व की १० वीं शताब्दि या उससे भी पूर्व का समय स्थिर करना होगा१।
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अब हमें यह निश्चय करना आवश्यक है कि भारतवर्ष में लिखने के प्रचार की प्राचीनता का पता कहां तक चल सकता है।
c7.12
भोजपत्र२, ताड़पत्र३ या कागज़४ पर लिखे हुए पुस्तक हज़ारों वर्ष रह नहीं सकते, विशेषतः भारतवर्ष के जलवायु में, परंतु पत्थर या धातु पर खुदे हुए अक्षर यत्नपूर्वक रहें और हवा तथा बारिश से बचने पावें तो बहुत समय तक बच सकते हैं। इस देश में जो प्राचीन शिलालेख विशेष संख्या में मिले हैं वे मौर्यवंशी राजा अशोक के समय के, अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दि के हैं, और पाषाण के विशाल स्तंभों अथवा चटानों पर खुदे हुए हैं। ये पेशावर से माहिसोर तक और काठियावाड़ से उड़ीसा तक अर्थात् क़रीब क़रीब सारे भारतवर्ष५ में मिल चुके हैं। इनसे पाया जाता है कि उस समय सारे भारतवर्ष में लिखने का प्रचार भली भांति था, जैसा कि इस समय है। इन लेखों में देशभेद से कितने एक अक्षरों की आकृति में कुछ भिन्नता६ पाई जाती है और किसी किसी अक्षर के कई रूप मिलते हैं; जिससे अनुमान होता है कि उस समय भी लिखने की कला इस देश में नवीन नहीं, किंतु सुदीर्घ काल से चली आती थी।
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२ भोजपत्र पर लिखा हुआ सब से पुराना संस्कृत पुस्तक, जो अब तक मिला है, ‘संयुक्तागम’ नामक, बौद्ध सूत्र है. वह डॉ. स्टाइन को खोतान प्रदेश के खदालिक् स्थान में मिला था. उसकी लिपि ई. स. की चौथी शताब्दि की मानी जाती है.
c7.14
३ ताड़पत्र पर लिखे हुए पुस्तकों में सब से पुराना, जो मिला है, एक नाटक का कुछ त्रुटित अंश है. वह ई. स. की दूसरी शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ माना जाता है, और जिसको डॉ. ल्यूडर्स ने छपवाया है (Kleinere Sanskrit-Texte, part I.).
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५ अशोक के लेख नीचे लिखे हुए स्थानों में मिले हैं:— शाहबाज़गढ़ी (पंजाब के ज़िले यूसुफ़ज़ई में); मान्सेरा (पंजाब के ज़िले हज़ारा में); देहली; खालसी (संयुक्त प्रदेश के ज़िले देहरादून में); सारनाथ (बनारस के पास); लौरिआ अरराज अथवा रधिआ, लौरिआ नवंदगढ़ अथवा मथिआ और रामपुरवा (तीनों उत्तरी बिहार के ज़िले चंपारन में); सहस्राम (बंगाल के ज़िले शाहाबाद में); निग्लिवा और रुमिंदेई (दोनों नेपाल की तराई में); धौली (उड़ीसा के ज़िले कटक में); जौगड़ (मद्रास के ज़िले गंजाम में); बैराट (राजपूताना के जयपुर राज्य में); गिरनार (काठियावाड़ में); सोपारा (बंबई से ३७ मील उत्तर थाना ज़िले में); सांची (भोपाल राज्य में); रूपनाथ (मध्यप्रदेश में); मस्की (हैदराबाद राज्य में) और सिद्धापुर (माइसोर राज्य में).
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६ लिपिपत्र पहिले में केवल गिरनार के लेख से अक्षर छांटे गये हैं और दूसरे में अशोक के अन्य लेखों के मुख्य मुख्य अक्षर. इन दोनों पत्रों को मिलाने से भिन्न भिन्न लेखों में अक्षरों की जो भिन्नता और एक अक्षर के कई रूप पाये जाते हैं वे स्पष्ट होंगे.
c7.17
अशोक से पूर्व के अभी तक केवल दो छोटे छोटे शिलालेख मिले हैं, जिनमें से एक अजमेर ज़िले के बड़ली७ गांव से मिला है और दूसरा नेपाल की तराई के पिप्रावा नामक स्थान के एक स्तूप के भीतर से मिले हुए पात्र पर, जिसमें बुद्धदेव की अस्थि रक्खी गई थी, खुदा है। इनमें से पहिला एक स्तंभ पर खुदे हुए लेख का टुकड़ा है, जिसकी पहिली पंक्ति में ‘वीर[१]य भगव[त]’ और दूसरी में ‘चतुरासिति व[स]’ खुदा है। इस लेख का ८४ वां वर्ष जैनों के अंतिम तीर्थंकर वीर (महावीर) के निर्वाण संवत् का ८४ वां वर्ष होना चाहिये। यदि यह अनुमान ठीक हो तो यह लेख ई. स. पूर्व ' (५२७-८४=) ४४३ का १ होगा. इसकी लिपि अशोक के लेखों की लिपि से पहिले की प्रतीत होती है. इसमें 'वीराय' का 'वी' अक्षर [Image of Brahmi letter vi / curly character] है. उक्त 'वी' में जो 'ई' की मात्रा का चिन्ह ( है वह न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख में मिलता है, अत एव वह चिन्ह अशोक से पूर्व की लिपि का होना चाहिये, जिसका व्यवहार अशोक के समय में मिट कर उसके स्थान में नया चिन्ह [Image of angular bracket or marker] बर्ताव में आने लग गया होगा २.
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१ बू; इं. पे; पृ. १७ (अंग्रेज़ी अनुवाद).
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४ कागज़ पर लिखे हुए सब से पुराने भारतीय प्राचीन लिपि के चार संस्कृत पुस्तक मध्य एशिया में यारकंद नगर से ६० मील दक्षिण ‘कुगियर’ स्थान से वेबर को मिले, जिनका समय डॉ. हॉर्नली ने ई. स. की पांचवीं शताब्दि अनुमान किया है (ज. ए. सो. बंगा; जि. ६२, पृ. ८).
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७ बड़ली गांव से मिला हुआ लेख, जो राजपूताना म्यूज़ियम में सुरक्षित है. उसमें से मुख्य अंश यह मिला था.
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१ महामहोपाध्याय डॉ. सतीशचंद्र विद्याभूषण ने भी इस लेख को वीर संवत् ८४ का माना है.
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२ अशोक के समय अथवा उससे पूर्व व्यंजन के साथ जुड़ने वाली स्वरों की मात्राओं में से केवल 'ई' की प्राचीन मात्रा लुप्त होकर उसके स्थान में नया चिन्ह काम में आने लगा ऐसा ही नहीं, किंतु 'औ' की मात्रा में भी परिव र्तन हुआ होगा, क्योंकि महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के लेख में 'औ' की मात्रा तीन प्रकार से लगी है:—'पौ' के साथ एक प्रकार की, 'नौ' और 'मौ' के साथ दूसरे प्रकार की और 'यौ' के साथ तीसरी तरह की है (देखो लिपिपत्र = वां). इनमें से पहिले प्रकार की मात्रा तो अशोक के लेखों की शैली की ही है ('ओ' की मात्रा की बाईं तरफ एक और आड़ी लकीर जोड़ी गई है), परंतु दूसरे प्रकार की मात्रा की उत्पत्ति का पता अशोक के लेखों में नहीं लगता और न पिछले किसी लेख में उसका प्रचार पाया जाता है, जिससे यही अनुमान होता है कि उसका रूपांतर अशोक से पूर्व ही हो गया हो और किसी लेखक को उसका ज्ञान होने से उसने उसका भी प्रयोग किया हो, जैसे कि कुटिल लिपि की 'आ' की मात्रा [Image of symbol] (जो व्यंजन के ऊपर लगाई जाती थी) का लिखना इस समय से कई शताब्दी पूर्व से ही उठ गया है और उसके स्थान में व्यंजन की दाहिनी ओर एक खड़ी लकीर '।' लगाई जाती है, परंतु कितने एक पुस्तकलेखकों को अब भी उसका ज्ञान है और जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़ जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसके लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उसके ऊपर कुटिल लिपि का [Image of symbol] चिन्ह लगा देते हैं.
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दूसरे अर्थात् पिप्रावा के लेख ३ से प्रकट होता है कि बुद्ध की अस्थि शाक्य जाति के लोगों ने मिलकर उस (स्तूप) में स्थापित की थी. इस लेख को बूलर ने अशोक के समय से ४ पहले का माना है. वास्तव में यह बुद्ध के निर्वाणकाल अर्थात् ई.स. पूर्व ४८७ के ५ कुछ ही पीछे का होना चाहिये.
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३ जिस पत्थर के पात्र पर यह लेख खुदा है वह इस समय कलकत्ते के 'इंडियन म्यूज़िअम्' में है.
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४ ज. रॉ. ए. सो; सन् १८९८, पृ. ३८६.
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५ बुद्ध का देहांत (निर्वाण) ई.स. पूर्व ४८७ के क़रीब कुसिनार नगर में हुआ. उनके शरीर को चन्दन की लकड़ियों से जला कर उनकी जली हुई अस्थियों के ८ हिस्से किये गये और राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अलकप्प, राम-ग्राम, पावा, वेठदीप और कुसिनार वालों ने उन्हें लेकर अपने अपने यहां उनपर स्तूप बनवाये. कपिलवस्तु शाक्यराज्य की राजधानी थी और बुद्ध वहीं के शाक्यजाति के राजा शुद्धोदन का पुत्र था अत एव पिप्रावा के स्तूप से निकली हुई अस्थि कपिलवस्तु के हिस्से की, और वहां का स्तूप बुद्ध के निर्वाण के समय के कुछ ही पीछे का बना हुआ, होना चाहिये. ऐसा मानने में लिपिसंबंधी कोई भी बाधा नहीं आती.
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इन शिलालेखों से प्रकट है कि ई.स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी में लिखने का प्रचार इस देश में कोई नई बात न थी.
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निआर्कस् ६ कहता है कि 'यहां के लोग रूई (या रूई के चिथड़ों) को कूट कूट कर लिखने के वास्ते ७ कागज़ बनाते ८ हैं. मॅगेस्थिनीज़ ९ लिखता है कि 'यहां पर
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६ ई. स. पूर्व ३२६ में भारतवर्ष पर चढ़ाई करनेवाले यूनान के बादशाह अलेक्जेंडर (सिकंदर) के सेनापतियों में से एक निआर्कस् भी था. वह उसके साथ पंजाब में रहा और वहां से नावों द्वारा जो सेना लड़ती भिड़ती सिंधु के मुख तक पहुंची उसका सेनापति भी वही था. उसने इस चढ़ाई का विस्तृत वृत्तांत लिखा था, जिसका खुलासा एरि-अन ने अपनी 'इंडिका' नामक पुस्तक में किया.
c7.30
७ मैक्समुलर का लिखना है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रूई से कागज़ बनाने की कला का जानना प्रकट करता है, मॅ. हि. ए. सं. लि; पृ. ३६७.
c7.31
८ बू; इं. पे; पृ. ६.
c7.32
९ ई.स. पूर्व ३०६ के आसपास सीरिआ के बादशाह सेल्युकस् (Seleukos Nikator) ने मॅगेस्थिनीज़ नामक विद्वान् को अपना राजदूत बना कर मौर्यवंशी राजा चंद्रगुप्त के दरबार (पाटलिपुत्र) में भेजा था. वह ५ वर्ष के लगभग यहां रहा और उसने इस देश के विषय में ‘इंडिका’ नामक पुस्तक ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दि के अंत के आसपास लिखी, जो नष्ट होगई परंतु दूसरे लेखकों ने उससे जो जो अंश उद्धृत किया है वह उपलब्ध है.
c7.33
दस दस स्टेडिया१ के अंतर पर पाषाण लगे हैं२, जिनसे धर्मशालाओं का तथा दूरी का पता लगता है, नये वर्ष के दिन भावी फल (पंचांग) सुनाया जाता है३, जन्मपत्र बनाने के लिये जन्मसमय लिखा जाता है४ और न्याय ‘स्मृति’५ के अनुसार होता है.’
c7.34
४ इं. मं.; पृ. १२६.
c7.35
५ मॅगस्थिनीज़ ने मूल में ‘स्मृति’ (धर्मशास्त्र) शब्द के अर्थ ‘याददाश्त’ का प्रयोग किया है, जिसपर से कितने एक यूरोपियन् विद्वानों ने यहां पर उस समय लिखे हुए क़ानून का न होना मान लिया है, परंतु बूलर ने लिखा है कि मॅगस्थिनीज़ का आशय ‘स्मृति’ के पुस्तकों से है (वृ. इं. पे; पृ. ६).
c7.36
इन दोनों लेखकों के कथन से स्पष्ट है कि ई.स. पूर्व की चौथी शताब्दि में यहां के लोग रूई (या चिथड़ों) से कागज़६ बनाना जानते थे, पंचांग तथा जन्मपत्र बनते थे जैसे कि अब तक चले आते हैं और मीलों के पत्थर तक लगाये जाते थे. ये लेखनकला की प्राचीनता के सूचक हैं.
c7.37
६ विलायती कागज़ों के प्रचार के पूर्व यहां पर चिथड़ों को कूट कूट कर उनके गूदे से काग़ज़ बनाने के पुराने ढंग के कारखाने कई जगह थे, परन्तु विलायती कागज़ अधिक सुंदर और सस्ते होने से वे बंद हो गये, तो भी घोसुंडा (मेवाड़ में) आदि में अब तक पुराने ढंग से काग़ज़ बनते हैं.
c7.38
बौद्धों के ‘शील’७ ग्रंथ में बौद्ध साधुओं (श्रमणों) के लिये जिन जिन बातों का निषेध किया गया है उनमें ‘अक्खविका’ (अक्षरिका) नामक खेल भी शामिल है, जिसे बालक भी खेला करते थे. इस खेल में खेलने वालों को अपनी पीठ पर या आकाश में [अंगुलि से] लिखा हुआ अक्षर बूझना पड़ता था८.
c7.39
७ बौद्ध धर्मग्रंथ ‘सुत्तंत’ (सूत्रांत) के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में जो बुद्ध के कथोपकथन हैं वे ‘शील’ अर्थात ‘आचार के उपदेश’ कहलाते हैं. उसके संग्रह का समय डॉ. राइस डेविड्स ने ई.स. पूर्व ४५० के आस पास बतलाया है (डे; बु. इं; पृ. १०७), किंतु बौद्ध लोग ‘शील’ को स्वयं बुद्ध का वचन मानते हैं.
c7.40
८ ब्रह्मजॉलसुत्त, १४; सामञ्ञफलसुत्त, ४६; डे; बु. इं; पृ. १०८.
c7.41
‘विनय’९ संबंधी पुस्तकों में ‘लेख’ (लिखने की कला) की प्रशंसा की है१० और बौद्ध आर्याओं के लिये सांसारिक कलाओं के सीखने का निषेध होने पर भी ‘लिखना’ सीखने की उनके वास्ते आज्ञा है११. यदि कोई बौद्ध साधु (श्रमण) किसी मनुष्य को आत्मघात की प्रशंसा में कुछ लिखे (लेखं छिन्दति) तो उसे प्रत्येक अक्षर के लिये दुक्कत (दुष्कृत = पाप) होगा१२, और गृहस्थियों के लड़कों के वास्ते लिखने का पेशा सुख से जीवन निर्वाह करने का साधन माना गया है१३.
c7.42
१ एक स्टेडियस् (Stadium) ६०६ फुट ६ इंच का होता है (‘स्टेडिया’, ‘स्टेडियम्’ शब्द का बहुवचन है).
c7.43
२ इं. मं; पृ. १२४-२६.
c7.44
३ इं. मं.; पृ. ६१.
c7.45
९ जिस वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ उसी वर्ष (ई.स. पूर्व ४८७ के आसपास) उनके मुख्य शिष्य काश्यप की इच्छानुसार मगध के राजा अजातशत्रु की सहायता से राजगृह के पास की सप्तपर्ण गुफा के बड़े दालान में बौद्धों का पहिला संघ एकत्र हुआ जिसमें ५०० अर्हत (बड़े दरजे के साधु) उपस्थित थे. वहां पर उपालि ने, जिसको स्वयं बुद्ध ने ‘विनय’ का अद्वितीय ज्ञाता माना था, ‘विनय’ सुनाया, जो बुद्ध का कहा हुआ ‘विनय’ माना गया. बौद्धों के धर्मग्रंथों के तीन विभाग ‘विनय,’ ‘सुत्त’ (सूत्र) और ‘अभिधम्म’ (अभिधर्म) हैं, जिनमें से प्रत्येक को ‘पिटक’ कहते हैं. प्रत्येक पिटक में कई ग्रंथ हैं और तीनों मिलकर ‘त्रिपिटक’ कहलाते हैं. ‘विनय’ में बौद्ध साधुओं के आचार का विषय है. ओल्डनबर्ग के मत में ‘विनय’ के कितने एक अंश ई.स. पूर्व ४०० से पहिले के हैं.
c7.46
१० डे; बु. इं; पृ. १०८; भिक्खुपाचित्तिय, २,२.
c7.47
११ डे; बु. इं; पृ. १०८.
c7.48
१२ डे; बु. इं; पृ. १०८-६.
c7.49
१३ डे; बु. इं; पृ. १०८.
c7.50
'जातक'१ के पुस्तकों में खानगी२ तथा राजकीय३ पत्रों, कर्ज़ा लेने वालों की तहरीरों४ तथा पोत्थक (पुस्तक) का५, और कुटुंब संबंधी आवश्यकीय विषयों६, राजकीय आदेशों७ तथा धर्म के नियमों८ के सुवर्णपत्रों पर खुदवाये जाने का वर्णन मिलता है.
c7.51
१ बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाओं को जातक कहते हैं. बौद्ध साहित्य में ऐसी प्रायः ५५० कथाओं का २२ निपातों (अध्यायों) में बड़ा संग्रह है. प्रत्येक कथा के आरंभ में लिखा है कि जेतवन में अनाथपिंडिक के बाग में या अन्यत्र जब बुद्ध विहार करते थे तब अमुक प्रसंग उठने पर उन्होंने यह कथा कही. कथा के पूर्ण होने पर बुद्ध ने बताया है कि इस समय के (वर्तमान) मनुष्यों में से इस कथा के समय पूर्व जन्म में कौन कौन किस किस शरीर में थे और अंत में अपना भी पता दिया है कि इस कथा का अमुक पात्र मैं था.
c7.52
२ काशी के एक सेठ के गुलाम कटाहक ने जाली चिट्ठी (पण्ण=पर्ण=पन्ना=पत्र) से अपने आपको सेठ का पुत्र सिद्ध करके एक दूसरे सेठ की पुत्री से विवाह कर लिया. उस पत्र पर उसने सेठ ही की मोहर (मुद्दिका=मुद्रिका) भी कर ली थी (कटाहक जातक).
c7.53
३ एक राजा, जो राज्य छोड़कर वनवासी होगया था, एक ग्राम में जाकर रहा. वहां वालों ने उसका आतिथ्य अच्छा किया जिस पर उसने अपने भाई को. जो राजा था, एक पण्ण भेजा कि इनका राजकर क्षमा कर दिया जावे (कामजातक).
c7.54
८ राजा की आज्ञा से कुरु जाति के पांच प्रधान धर्म (अहिंसा, आस्तेय, परस्त्रीगमननिषेध, मिथ्याभाषणनिषेध और मद्यपाननिषेध) सोने के पत्र पर खुदवाये गये (कुरुधम्म जातक).
c7.55
भरहुत के स्तूप के कटहरों पर इक्कीस जातकों के चित्र खुदे हुए हैं और उनपर नाम भी दिए हैं; एक पर तो जातक में से गाथा का एक पाद ज्यों का त्यों खुदा हुआ है. यह स्तूप ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी का है अतएव जातकों का इससे प्राचीन होना तो सिद्ध ही है; परंतु जिन राजाओं और नगरों का उनमें उल्लेख है वे नंद और मौर्यवंशी राजाओं के पहले के हैं और पात्रों के आचार व्यवहार भी बुद्ध के बहुत पहले के जान पड़ते हैं; इससे यह मानना साहस नहीं है कि ई.स. पूर्व की छठी शताब्दी या उससे भी पहले के समाज के चित्र जातकों की कथाओं में अंकित हैं. प्रोफ़ेसर कॉवेल की संपादकत्ता में ५४७ जातकों का अंगरेज़ी भाषांतर ६ जिल्दों में छप कर प्रकाशित हुआ है. मूल डॉक्टर फॉसबॉल् ने रोमन लिपि में प्रकाशित किया है.
c7.56
५ बूं; इ; पे; पृ. ५.
c7.57
६ एक धनवान् ब्राह्मण का पुत्र अपनी विरासत सम्हालने गया और सोने के पत्र पर अपने पुरखाओं के लिखे धन के बीजक के अक्षर (अक्खरानि) बांच कर उसने अपनी संपत्ति का परिभाण जाना (कण्ह जातक).
c7.58
७ काशी के राजा की रानी खेमा ने स्वप्न में स्वर्णमृग देखा और कहा कि यदि मुझे यह न मिला तो मैं मर जाऊंगी. इस पर राजा ने सोने के पत्र पर एक कविता खुदवा कर मंत्री को दी और कहा कि इसे सारे नगरवासियों को सुना दो. उस कविता का भाव यह था कि जो कोई इस मृग का पता देगा उसे गांव और गहनों से भूषित स्त्रियां दी जायेंगी (रुरुजातक).
c7.59
तक्खसिला (तक्षशिला) के विश्वविद्यालय के एक अध्यापक ने अपने पुराने छात्रों को पण्ण (=पत्र) लिखा (महासुतसोम जातक).
c7.60
काशी के एक राजा ने अपने निकाले हुए पुरोहित को फिर बुलाने के लिये एक गाथा लिख कर पण्ण भेजा और उसपर राजमुद्दिका (राजमुद्रिका) से मोहर की (पुण्णनदी जातक).
पोतलि के राजा अस्सक (अश्मक) के मंत्री नंदिसेन ने एक सासन (शासन) लिख कर दंतपुर के राजा कालिंग का आक्रमण रोका और कालिंग राजा लेख को सुन कर (लेखं सुत्वा) रुक गया (चुल्लकालिंग जातक).
सात राजाओं ने काशी को घेरा देकर राजा ब्रह्मदत्त को पण्ण भेजा कि राज्य छोड़ो या लड़ो. उसके उत्तर में राजा के भाई असदिस (असदृश) ने बाण पर अक्षर (अक्खरानि) खोदे (अच्छिन्दि) और वह बाण ऐसे निशाने से मारा कि उनके भोजनपात्रों पर लगा. उसमें लिखा था कि भाग जाओ नहीं तो मारे जाओगे (असदिस जातक.)
नामी चोर (जैसे आज कल पुलिस के रजिस्टर में 'नंबरी' बदमाश होते हैं) 'लिखितको चोरो,' अर्थात् जिसके बारे में राज की ओर से लिखी हुई आज्ञा निकल चुकी हो, कहलाता था. ऐसे चोर बौद्धसंघ में आ आकर भरती होने लगे, तब बुद्ध ने इस बखेड़े को रोका (महावग्ग १.४३).
c7.61
४ एक देवालिये ने अपने लेवालियों को कर्ज़े की तहरीरें (इणपण्णानि=ऋणपर्ण) लेकर गंगातीर पर आकर अपना पावना लेजाने के लिये बुलाया था (रुरुजातक).
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बोधिसत्त्व की आज्ञा से विनिच्छयधम्म (विनिश्चयधर्म) भी ऐसे ही खुदवाये गये थे (तेसकुन जातक).
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‘महावग्ग’ (विनयपिटक का एक ग्रन्थ) में ‘लेखा’ (लिखना), ‘गणना’ (पहाड़े) और ‘रूप’ (हिसाब) की पढ़ाई का१, जातकों में पाठशालाओं तथा विद्यार्थियों के लिखने के ‘फलक’ (लकड़ी की पाटी) का२ और ‘ललितविस्तर’ में बुद्ध का लिपिशाला में जाकर अध्यापक विश्वामित्र से चंदन की पाटी पर सोने के वर्णक३ (कलम) से लिखना सीखने का वृत्तान्त मिलता है४.
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१ उपासि के मातापिता ने राजगृह में विचार किया कि बच्चे को क्या काम सिखावें. उन्होंने निश्चय किया कि यद्यपि लेखा, गणना और रूप सिखाने से भविष्य में उसको लाभ होगा परंतु इन तीनों से क्रमशः अंगुली, छाती और आंखों को क्लेश होगा, इससे उन्होंने उसे बौद्ध भिक्खु (श्रमण) बनाना निश्चय किया क्योंकि श्रमण सदाचारी होते हैं, खाने पीने को उन्हें अच्छा मिलता है और सोने को अच्छे बिछौने (महावग्ग १.४६; भिक्खुप्राचित्तिय ६५.१). कलिंग के राजा खारवेल के हाथीगुंफा के लेख में उक्त राजा का लेख, रूप और गणना सीखना लिखा है (ततो लेखरूपगणना व्यवहारविधिविशारदेन सर्व्वविद्यावदातेन.........): ‘हाथीगुंफा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स.’ भगवानलाल इंद्रजी संपादित, पृ. २२.
c7.65
३ राजपूताना में अब भी लकड़ी की गोल तीखे मुंह की कलम को, जिससे बच्चे पट्टी पर सुरखी बिछा कर अक्षर बनाना सीखते हैं, बरुणा या वरतना कहते हैं.
c7.66
४ ललितविस्तर, अध्याय १० (अंग्रेज़ी अनुवाद; पृ. १८१-४).
c7.67
ऊपर उद्धृत किये हुए वचन ई. स. पूर्व की छठी शताब्दी के आस पास की दशा के बोधक हैं और उनसे पाया जाता है कि उस समय लिखने का प्रचार एक साधारण बात थी; स्त्रियां तथा बालक भी लिखना जानते थे और प्रारंभिक पाठशालाओं की पढ़ाई ठीक वैसी ही थी जैसी कि अब तक हमारे यहां की देहाती खानगी पाठशालाओं की है, जिनमें लिखना, पट्टीपहाड़े और हिसाब पढ़ाये जाते हैं जब हमारे यहां की प्रारंभिक पढ़ाई का ढंग ई. स. पूर्व की छठी शताब्दी के आसपास से अब तक, अर्थात् क़रीब २५०० वर्ष से, बिना कुछ भी परिवर्त्तन के ज्यों का त्यों चला आया है तब आश्चर्य ही क्या है कि बुद्ध के समय भी बहुत पूर्ववर्ती काल से वैसा ही चला आता रहा हो.
c7.68
२ गुलाम कटाहक सेठ के पुत्र का फलक उठा कर उसके साथ पाठशाला जाया करता था वहीं उसने लिखना पढ़ना सीखा (कटाहक जातक).
c7.69
महाभारत५, स्मृति (धर्मशास्त्र)६, कौटिल्य के अर्थशास्त्र७, वात्स्यायन के कामसूत्र८ आदि ग्रंथों में, जिनमें व्यावहारिक विषयों का विशेष रूप से वर्णन मिलता है, ‘लिखना’ और ‘लिखित पुस्तकों’ का उल्लेख बहुत कुछ मिलता है.
c7.70
५ महाभारत के कर्त्ता व्यास ने स्वयं गणेश को ही उक्त पुस्तक का लेखक बनाया है (आदिपर्व, १. ११२).
c7.71
६ वसिष्ठधर्मसूत्र (१६.१०, १४-१५) में न्यायकर्त्ता के पास लिखित प्रमाण पेश करना और मनुस्मृति (८.१६८) में ज़बरन लिखवाये हुए लेख को अप्रमाणित करना लिखा है. सारी स्मृतियों में जहां जहां लेख का विषय है उसकी परिसंख्या नहीं हो सकती, केवल दो उदाहरण दिये गये हैं.
c7.72
७ अर्थशास्त्र में बहुत जगह लिखने का वर्णन है, जिसमें से थोड़े से उदाहरण यहां दिये जाते हैं. वृत्तचौलकर्मा लिपिं संख्यानं चोपयुंजीत (१.५.२); संज्ञा लिपिभिश्चारसञ्चारं कुर्य्युः (१.१२.८); पत्रञ्च संचिपपरिषदा पत्रसम्प्रेषणेन मंत्रयेत (१.१५.६); अमात्यसम्पदोपेतः सर्व्वसमयविदाशुग्रन्थश्चारुक्षरो लेखवाचनसमर्थो लेखकः स्यात् (२.९.२८). यह पिछला अवतरण शासनाधिकार में से है जिसमें राजशासनों के लिखने का ही विषय है. अर्थशास्त्र का कर्ता कौटिल्य मौर्य्य चंद्रगुप्त का मंत्री विष्णुगुप्त चाणक्य ही था.
c7.73
८ चौंसठ कलाओं में ‘पुस्तकवाचनम्’ (पृ. ३३); घर में रखने की सामग्री में ‘यः कश्चित्पुस्तकः’ (पृ. ४५); भार्या के प्रतिदिन के कामों में आमद और खर्च का हिसाब रखना ‘दैवसिकायव्ययपिण्डीकरणम्’ (पृ. २३८).
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पाणिनि९ ने ‘अष्टाध्यायी’ नामक व्याकरण का ग्रन्थ लिखा, जिसमें ‘लिपि’ और , 'लिपि'१ शब्द (जिनका अर्थ 'लिखना' है) और 'लिपिकर'१ (लिखने वाला) तथा 'यवनानी'२ (जिसका अर्थ कात्यायन३ और पतंजलि ने४ 'यवनों की लिपि' किया है) शब्द बनाने के नियम दिये हैं और 'स्वरित' के चिह्न५ तथा 'ग्रंथ'६ (पुस्तक) का भी उल्लेख किया है. उसी पुस्तक से
c7.75
९ मैक्समुलर, बूलर आदि कितने येक यूरोपियन विद्वान् पाणिनि का ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में होना मानते हैं और पाणिनीय व्याकरण के अद्वितीय ज्ञाता गोल्डस्टूकर ने पाणिनि का बुद्ध से पूर्व होना माना है. इनमें से गोल्डस्टूकर का लिखना ठीक जचता है, क्योंकि पाणिनि से बहुत समय पीछे कात्यायन ने उसके सूत्रों पर ‘वार्तिक’ लिखे. इसका प्रमाण यह है कि वार्तिकों में न केवल पाणिनि के छोड़े हुए प्रयोगों और अर्थों का स्पष्टीकरण है वरन बहुत से नये प्रयोगों और नये अर्थों का भी विचार है, जो पाणिनि के पीछे व्यवहार में आये होंगे. पाणिनि से [कमसे कम तीन पीढ़ी] पीछे दाक्षायण व्याडि ने पाणिनि के सूत्रों पर ‘संग्रह’ नामक व्याख्यानरूप ग्रंथ रचा. भर्तृहरि ने अपने ‘वाक्यपदीय’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि 'संग्रह' के, जो 'वाक्यपदीय' के टीकाकार पुण्यराज के लेखानुसार एक लाख श्लोक का था, अस्त हो जाने पर पतंजलि ने 'महाभाष्य' लिखकर 'संग्रह' के आशय का संक्षेप किया. पतंजलि का समय ई.स. पूर्व की दूसरी शताब्दी निश्चित है. ऐसी दशा में पाणिनि और पतंजलि के बीच कई शताब्दियों का अन्तर होना चाहिये.
c7.76
१ दिवाविभानिशा…………'लिपिलिबिवलि………… (३.२.२१).
c7.77
२ इन्द्रवरुणभव…………'यवयवन………… (४.१.४६).
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३ यवनाँल्लिप्याम (४.१.४६ पर वार्तिक ३).
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४ यवनाल्लिप्यामिति वक्तव्यम् यवनानी लिपिः (४.१.४६ पर भाष्य).
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५ स्वरितेनाधिकारः (१.३.११).
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एक ही बात बार बार दोहराना न पड़े इस लिये पाणिनि ने कुछ बातें शीर्षक की तरह स्थान स्थान पर लिख कर नियम कर दिया है कि इसके आगे यह सिलसिला चलेगा. इसको अधिकार कहते हैं और यह अधिकार स्वरित चिह्न से जतलाया गया है. यह स्वरित वेद के उच्चारण के उदात्त, अनुदात्त, स्वरित की तरह उच्चारण का ऊंचा या नीचा स्वर नहीं किंतु वर्ण पर का लिखित चिह्न है (स्वरितो नाम स्वरविशेषो वर्णधर्मो न खरधर्मः पा. १.३.११ पर काशिका) क्योंकि अष्टाध्यायी का सूत्रपाठ एकश्रुति या एकस्वर का पाठ माना जाता है, उसमें उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का भेद नहीं हो सकता (एकश्रुत्या सूत्राणां पाठात्, पतंजलि के महाभाष्य के पहले आह्निक पर कैयट की टीका). पतंजलि ने इस सूत्र (१.३.११) के व्याख्यान में यह शंका उठाई है कि स्वरित से हम यह नहीं जान सकते कि यह अधिकार कहां तक जायेगा और इस शंका पर कात्यायन का समाधान लिखा है कि जितने सूत्रों तक अधिकार चलाना हो उतनी ही संख्या का वर्ण उसपर लिख दिया जाय (नावतिथोऽल्लब्धसंख्यातवो योगा्नितिवचनात्सिद्धम् ). कैयट ने इसपर दृष्टांत दिया है कि पा. सू. ५.१.३० पर 'इ' अनुबंध लगा देने से यह जाना जायगा कि यह अधिकार दो सूत्रों तक चलेगा. यों शिवसूत्रों में जो वर्णों का क्रम है उसके स्थानीय मान से अ = १, इ = २, उ = ३. इत्यादि गिनती के संकेत पाणिनि के स्वरित चिह्न में होना कात्यायन ने माना है. आगे चल कर यह भी कहा है कि जहां अधिकार अधिक संख्या के सूत्रों में जाने वाला है और अल् (= वर्ण) कम हैं वहां अधिकार जतलाने वाले सूत्र में पाणिनि ने 'प्राक्' (अमुक शब्द या सूत्र से पहले पहले) लगाया है (पतंजलि — अथेदानों यत्राल्पोयांसोऽलः भूयस्य योगानधिकारोऽनुवर्त्तते कथं तत्र कर्तव्यम् ! कात्यायन — भूयसि प्राग्वचनम्. पतंजलि — भूयसि प्राग्वचनं कर्तव्यम्. भूयसि प्रागभूत इति वक्तव्यम्). जहां पर 'प्राक्' शब्द काम में नहीं लिया है और जहां पर सूत्रों की संख्या अल् (वर्ण) से अधिक है (जैसे ३.१.६१ का अधिकार ५४१ सूत्रों पर है) वहां कोई और स्वरित चिह्न काम में आता होगा. इसीके अनुसार पाणिनि ने जहां यह अधिकार किया है कि 'रीश्वर' के पहले सब निपात कहावेंगे (प्रागरीश्वरान्निपाताः पा. १.४.५६) वहां शुद्ध 'ईश्वर' शब्द काम में न लाकर कृत्रिम 'रीश्वर' काम में लिया है क्योंकि रीश्वर शब्द जहां आता है वहीं यह अधिकार समाप्त होता है (अधिरीश्वरे १.४.६७), आगे जहां 'ईश्वर' शब्द आया है (ईश्वरे तोसुन्कसुनौ ३.४.१३) वहां तक यह अधिकार नहीं चलता. यों 'रीश्वर' शब्द काम में लाने से दो ही बातें प्रकट होती हैं, या तो पाणिनि ने अपने आगे के सूत्र तोते की तरह रट लिये थे इससे 'रीश्वर' पद का प्रयोग किया, या उसने अपना व्याकरण लिख कर तैयार किया जिसकी लिखित प्रति के सहारे अधिकार सूत्र के शब्द स्थिर किये. पाठकों से यह कहना व्यर्थ है कि इन दोनों अनुमानों में से कौन सा मानना उचित है.
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ऐसे ही पाणिनि ने अपने सूत्रों में अपने ही बनाये धातुपाठ में से 'फण आदि सात धातुओं को' (फणां च सप्तानां ६.४.१२५) 'जक्षिति आदि ६ धातु' (जक्षित्यादयः षट् ६.१.६) आदि उल्लेख किया है. वहां यह मानना उचित है कि पाणिनि ने सूत्र बनाने के पहिले धातुपाठ रट रक्खा था, या यह कि धातुपाठ की लिखित पुस्तक उसके सामने थी ?
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६ 'ग्रंथ' शब्द पाणिनि ने रचित पुस्तक के अर्थ में लिया है (समुदायो यसोऽग्रन्थे १.३.७५; अधिकृत्य कृते ग्रंथे ४.३.८७; कृते ग्रन्थे ४.३.११६ आदि). वेद की शाखाओं के लिये, जो ऋषियों से कही गई हैं (जिन्हें आस्तिक हिन्दू ऋषियों की बनाई हुई नहीं मानते) 'प्रोक्त' शब्द काम में लाया गया है, 'कृत' नहीं (तेन प्रोक्तम् ४.३.१०१) और 'प्रोक्त' ग्रंथों में 'पुराणप्रोक्त' शब्द के प्रयोग से दिखाया है कि कुछ वेद के ब्राह्मण पाणिनि के पहिले के थे और कुछ उन्हीं के काल के (पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ४.३.१०५; वार्तिक 'तुल्यकालत्वात्'), किंतु पाराशर्य (पराशर के पुत्र) और कर्मंद के 'भिक्षुसूत्र,' तथा शिलालि और कृशाश्व के 'नटसूत्रों' को न मालूम क्यों 'प्रोक्त' में गिनाया है. जो हो, 'भिक्षुशास्त्र' और 'नाट्यशास्त्र' के दो दो सूत्र-ग्रंथ उस समय विद्यमान थे (पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः। कर्मन्दकृशाश्वाद्भिनिः ४.३.११०-११). नवीन विषय पर पहिले पहिल बनाये हुए ग्रंथ को 'उपज्ञात' कहा है (उपज्ञाते ४.३.११५; उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायां २.४.२१). किसी विषय को लेकर (अधिकृत्य) बने हुए ग्रंथों में 'शिशुक्रन्दीय' (बच्चों के रोने के संबंध का ग्रंथ), 'यमसदीय' (यम की सभा के विषय का ग्रंथ), 'दो नाम मिला कर बना ग्रंथ' (जैसे 'अग्निकाश्यपीय'-यह नाम पाणिनि ने नहीं दिया) और 'इंद्र- जननीय' (इन्द्र के जन्म पर ग्रंथ) के नाम दिये हैं और अंत में 'आदि' लगाकर बतलाया है कि ऐसे ग्रंथ बहुत से होंगे (शिशुकन्दयमसभार्हेन्द्र जननादिभ्यश्छः ४.३.८८). इस प्रकार पाणिनि ने केवल 'ग्रंथ' शब्द ही नहीं दिया वरन कई ग्रंथों के नाम और उनके विषयों का पता भी दिया है. पाणिनि के सूत्र 'कृते ग्रंथे' (४.३.८७) के वार्तिक पर कात्यायन ने आख्यायिका का भी उल्लेख किया है और भाष्यकार पतंजलि ने 'वासवदत्ता', 'सुमनोत्तरा' और 'भैमरथी' आख्यायिकाओं के नाम दिये हैं.
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यह भी पाया जाता है कि उस समय चौपायों के कानों पर सुव, स्वस्तिक आदि के और पांच तथा आठ के अंकों के चिह्न भी बनाये जाते थे और उनके कान काटे तथा छेदे भी जाते थे १.
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पृष्ठ ७ वें के टिप्पण ६ में दिये हुए ग्रंथों के अतिरिक्त 'महाभारत' ग्रंथ' और आपिशलि२, स्फोटायन४, गार्ग्य५, शाकल्य६, शाकटायन७, गालव८, भारद्वाज९, काश्यप१०, चाक्रवर्मण११ और सेनक१२ नामक वैयाकरणों के नाम भी पाणिनि ने दिये हैं और उनका मत प्रकट किया है.
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२ महान् व्रीह्यपराह्ण······भारत······ (६.२.३८).
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६ लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९).
c7.88
७ लङः शाकटायनस्यैव (३.४.१११). डा. ऑपर्ट ने जो शाकटायन का व्याकरण अभयचंद्रसूरि की टीका सहित छपाया है वह पाणिनि के उल्लेख किये हुए प्राचीन शाकटायन का नहीं किंतु जैन शाकटायन का नवीन व्याकरण है जो ई.स. की नवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा अमोघवर्ष (प्रथम) के समय में बना था.
c7.89
८ इको ह्रस्वोऽङ्यो गालवस्य (६.३.६१.).
c7.90
९ ऋतो भारद्वाजस्य (७.२.६३).
c7.91
१० तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य (१.२.२५).
c7.92
११ ई चाक्रवर्मणस्य (६.१.१३०).
c7.93
१२ गिरेव सेन कस्य (५.४.११२.)
c7.94
पाणिनि से पूर्व यास्क१३ ने निरुक्त लिखा जिसमें औदुंबरायण, क्रौष्टुकी, शतबलाक्ष मौद्गल्य, शाकपूणि, शाकटायन, स्थौलाष्ठीवी, आग्रायण, औपमन्यव, और्णवाभ, कात्थक्य, कौत्स, गार्ग्य, गालव, चर्मशिरस्, तैटीकि, वाष्र्यायणि और शाकल्य नामक वैयाकरणों और निरुक्तकारों के नाम और मत का उल्लेख मिलता है१४, जिनमें से केवल गार्ग्य, शाकटायन, गालव और शाकल्य के नाम पाणिनि में मिलते हैं, जिससे अनुमान होता है कि पाणिनि और यास्क के पूर्व व्याकरण और निरुक्त के बहुत से ग्रंथ उपलब्ध१५ थे, जिनमें से अब एक भी उपलब्ध नहीं है.
c7.95
१ कर्णे लक्षणस्याविष्टाष्टपञ्चमणिभिन्नच्छिन्नच्छिद्र स्त्रुवस्वस्तिकस्य ६. ३. ११५; कर्णाद्वर्णाल्लक्षणात् कृतः ६. २. ११२. इन सूत्रों पर काशिकाकारों ने लिखा है कि पशुओं के स्वामि का संबंध बतलाने या उनका विभाग जतलाने के वास्ते दांतली आदि के जो चिह्न उनके कानों पर किये जाते हैं उनको लक्षण कहते हैं. पाणिनि के इन सूत्रों के अनुसार 'अष्टकर्णः गौः' या 'अष्टकर्णी गौः' का अर्थ यही है कि जिस बैल या गौ के कान पर पहचान के लिये 'आठ' का चिह्न बना हो. ऐसे ही पञ्चकर्णी, स्वस्तिककर्णी आदि. ऐसे शब्दों का अर्थ 'आठ कान वाली' आदि नहीं हो सकता. जानवरों के कानों पर इस प्रकार के तरह तरह के चिह्न करने की प्रथा वेदों के समय में भी प्रचलित थी. अथर्ववेद संहिता में तांबे के छुरे से दोनों कानों पर 'मिथुन' (स्त्रीपुरुष) का चिह्न बनाने का विधान है (अथर्व. सं. ६.१४१) और दूसरी जगह कानों के छेदने और उनपर चिह्न करने की प्रथा को बुरा बतलाया है (१२. ४. ६). मैत्रायणी संहिता में इस विषय का एक प्रकरण का प्रकरण है जिससे पाया जाता है कि रेवती नक्षत्र में यह कर्म करना चाहिये तब इससे समृद्धि होती है. केवल दाहिने कान पर भी चिह्न होता था और दोनों कानों पर भी, और उन चिह्नों के नाम से गौओं के नाम पड़ते थे—'स्थूणाकर्णी' (थंभे के चिह्नवाली), 'दात्राकर्णी' (दांतली के चिह्नवाली), 'कर्करिकर्णी' (वीणा के चिह्नवाली) आदि. अलग अलग पुरुषों के अलग अलग चिह्न होते थे—वसिष्ठ की 'स्थूणाकर्णी', जमदग्नि की 'कर्करिकर्णी' आदि. दाण के फल से या लोहे से चिह्न करने का निषेध किया गया है; या तो चिह्न तांबे से बनाया जाय या सांठे को पानी में सिगोकर उसके डंठल से (मैत्रायणी संहिता; ४.२.६.).
c7.96
३ वा सुप्यापिशलेः (६.१.९२).
c7.97
४ अवङ् स्फोटायनस्य (६.१.१२३).
c7.98
५ ओतो गार्ग्यस्य (८.३.२०).
c7.99
१३ पाणिनि ने 'यस्कादिभ्यो गोत्रे' (२.४.६३.) सूत्र से 'यास्क' नाम सिद्ध किया है.
c7.100
१४ देखो, क्रमशः, यास्क का निरुक्त—१.२.१७; ८.२.१; ११.६.३; ७.१४.६; १.३.३; १०.१.३; १०.८.६; १०.८.१०; ७.१५.१; ८.५.३; १.१५.२; १.३.४; ४.३.२; ३.१५.१; ४.३.२; १.२.८; और ६. २८. ३.
c7.101
१५ यह संभव नहीं कि यास्क अथवा पाणिनि ने इतने आचार्यों के एक विषय के ग्रंथ कंठस्थ करके उनका तारतम्य विचार कर नया निरुक्त अथवा व्याकरण बनाया हो. यदि उस समय लिखना या लिखित ग्रंथ न थे तो क्या पाणिनि और यास्क इन सब आचार्यों के ग्रंथों को वेद के सूक्तों की तरह कंठस्थ करने वालों को सामने बिठाकर उनके मत सुनते गये होंगे और अपना निबंध बना कर स्वयं रटते और शिष्यों को रटाते गये होंगे?
c7.102
छांदोग्य उपनिषद्१ में ‘अक्षर’२ शब्द मिलता है तथा ‘ई,’ ‘ऊँ’ और ‘ए’ स्वर, ईकार, ऊकार और एकार शब्दों से सूचित किये हैं३ और स्वरों का संबंध इंद्र से, ऊष्मन् का प्रजापति से और स्पर्शवर्णों का मृत्यु से बतलाया है४. ऐसे ही तैत्तिरीय उपनिषद् में वर्ण और मात्रा का उल्लेख मिलता है५.
c7.103
४ सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानः यदि खरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं... (छांदोग्य उप. २. २२. ३).
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५ वर्णः खरः । मात्रा बलम् (तैत्तिरीय उप. १. १).
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ऐतरेय आरण्यक में ऊष्मन्, स्पर्श, स्वर और अंतःस्थ६ का; व्यंजन और घोष७ का; णकार और षकार (मूर्धन्य) के नकार और सकार (दंत्य) से भेद८ का तथा ‘संधि’९ का विवेचन मिलता है. ये सब बहुधा शांखायन आरण्यक में भी हैं.
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६ तस्यैतस्यात्मनः प्राण ऊष्मरूपमस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तःस्था रूपमिति (ऐ. आ. ३.२.१).
c7.107
७ तस्य यानि व्यंजनानि तच्छरीरं यो घोषः स आत्मा य ऊष्माणः स प्राणः (ऐ. आ. २. २. ४.)
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८ स यदि विचिकित्सेत्सणकारं ब्रवा३णी ३ अणकारा ३ इति ... सषकारं ब्रवा३णो ३ अपकारा ३ इति (ऐ. आ. ३. २. ६).
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९ पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपमुत्तरमुत्तररूपं योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्तयति येन खराखरं विजानाति येन मात्रामात्रां विभजते ... संधिर्विज्ञपनी सान... (ऐ. आ. ३. १. ५).
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ऐतरेय ब्राह्मण में ‘ॐ’ अक्षर, को अकार, उकार और मकार वर्णों के संयोग से बना हुआ बतलाया है१०.
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१० तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयो वर्णा अजायन्ताकार उकारो मकार इति तानेकधा समभरत्तदेतदो३मिति (ऐ. ब्रा. ५. ३२). ऐसा ही कौषीतकी ब्राह्मण (२६.४) और आश्वलायन श्रौतसूत्र (१०.४) में भी लिखा मिलता है.
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शतपथ ब्राह्मण में ‘एकवचन,’ ‘बहुवचन’११ तथा तीनों ‘लिंगों’१२ के भेद का विवेचन मिलता है.
c7.113
२ हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समं । १ । आदिरिति द्वयक्षरं (छांदोग्य उप. २. १०). ‘अक्षर’ शब्द तो संस्कृत के प्राचीन साहित्य में दोनों अर्थों में मिलता है अर्थात् ध्वन्यात्मक (उच्चारित) और संकेतात्मक (लिखित), परंतु ‘वर्ण’ शब्द केवल संकेतात्मक चिह्न के लिये (‘वर्ण’ धातु से = रंगना या बनाना) आता है और ईकार, ऊकार आदि में ‘कार’ (‘कृ’ धातु से = करना) केवल वर्ण के लिये; अतएव ‘वर्ण’ और ‘कार’ प्रत्ययवाले शब्द लिखित संकेतों के ही सूचक हैं.
c7.114
११ अथो नेदेकवचनेन बहुवचनं व्यवायामेति (शतपथ ब्रा. १३.४.१.१८).
c7.115
१२ त्रेधाविहिता इटका उपधीयन्ते पुंनाम्न्यः स्त्रीनाम्न्यो नपुंसकनाम्न्य स्तेधाविहितानि उ एवेमानि पुरुषस्याङ्गानि पुंनामानि स्त्रीनामानि नपुंसकनामानि (शतपथ ब्रा. १०. ५. १. २). वाक् च एवैतत्सर्वं यत्स्त्री पुमान् नपुंसकं (शतपथ ब्रा. १०. ५. २. ३).
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तैत्तिरीय संहिता में ऐंद्रवायव नामक ग्रह (सोमपात्र) दोनों देवताओं (इंद्र और वायु) को एक ही दिये जाने के कारण का वर्णन करते समय लिखा है कि ‘[पहले] वाणी अस्पष्ट और अनियमित (बिना व्याकरण के) थी. देवताओं ने इंद्र से कहा कि तुम इसका हमारे लिये व्याकरण (नियमबंधन) कर दो. इंद्र ने कहा कि मैं [इस काम के लिये] यह वर मांगता हूं कि यह (सोम-पात्र) मेरे तथा वायु के लिये एक ही लिया जाय. इससे ऐंद्रवायव ग्रह शामिल ही लिया जाता है. इंद्र ने वाणी को बीच में से पकड़ कर व्याकृत किया. इसलिये वाणी व्याकृत (व्याकरणवाली, नियमबद्ध) कही जाती है’१३. यही कथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलती है परंतु उसमें ‘वि+आ+कृ’ धातु के स्थान पर ‘निर् + वच्’ धातु से बने हुए ‘निर्वचन’ और ‘निरुक्त’ शब्द काम में लिये हैं, और यह कहा है कि इंद्रने पशु, वयस् (पक्षी) और सरीसृपों (रेंगनेवालों) की वाणी को छोड़ कर
c7.117
१ पाणिनि के सूत्रपाठ में एक जगह (१. ४. ७६) और गणपाठ में दो जगह (ऋगयनादि ४. ३. ७३, और वेतनादि ४. ४ १२ में) उपनिषद् शब्द आता है.
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३ अग्निरोकारः आदित्य ऊकारो निहव एकारः (छांदोग्य उप. १. १३).
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१३ वाग्वै पराच्यव्याकृतावदत् ते. देवा इन्द्रमब्रुवन् ‘इमां नो व्याकुरु’ इति सोऽब्रवीदरं वृणै मह्यं चैवैष वायवे च सह गृह्याता’ इति तस्मादैन्द्रवायवः सह गृह्यते. तामिन्द्रो मध्यतोऽवक्रम्य व्याकरोत्तस्मादियं व्याकृता वागुद्यते. तस्मात्सकृदिन्द्राय मध्यतो गृह्यते...... (तैत्ति. सं. ६. ४. ७).
c7.120
उसके चौथे अंश अर्थात् मनुष्यों की ही वाणी का निर्वचन ( व्याकरण ) किया क्योंकि उसको ग्रह में से चतुर्थांश ही मिला था१.
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उपर्युक्त प्रमाणों से पाया जाता है कि उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता के समयतक व्याकरण के होने का पता चलता है. यदि उस समय लिखने का प्रचार न होता तो व्याकरण और उसके पारिभाषिक शब्दों की चर्चा भी न होती, क्योंकि जो जातियां लिखना नहीं जानती वे छंदोबद्ध गीत और भजन अवश्य गाती हैं, कथाएं कहती हैं परंतु उनको स्वर, व्यंजन, घोष, संधि, एकवचन, बहुवचन, लिंग आदि व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान सर्वथा नहीं होता. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हिंदुस्तान में ही भली भांति मिल सकता है, जहां ३१३४१५३८६ मनुष्यों की आबादी में से केवल १८४३६५७८ मनुष्य लिखना पढ़ना जानते हैं बाकी के २६४८७५८११ अभी तक लिखना पढ़ना नहीं जानते२. उनमें किसीको भी व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का कुछ भी ज्ञान नहीं है. व्याकरण की रचना लेखनकला की उन्नत दशा में ही होती है और उसके लिये भाषा का सारा साहित्य टटोलना पड़ता है और उसके प्रथम रचयिता को उसके पारिभाषिक शब्द गढ़ने पड़ते हैं. भारतवर्ष की जिन असभ्य और प्राथमिक जातियों के यहां लिखित साहित्य नहीं है उनकी भाषाओं के व्याकरण लिखना जानने वाले यूरोपियन विद्वानों ने अभी अभी बनाये हैं.
c7.122
२ ई. स. १८११ की हिन्दुस्तान की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृ. ७०-७१.
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ऋग्वेद में गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, विराज्, त्रिष्टुभ् और जगती छंदों के नाम मिलते हैं३. वाजसनेयि संहिता में इनके अतिरिक्त 'पंक्ति' छंद का भी नाम मिलता है और द्विपदा, त्रिपदा, चतुष्पदा, षट्पदा, ककुभ् आदि छंदों के भेद भी लिखे हैं४. अथर्ववेद में भिन्न भिन्न स्थानों में पृथक् नामों के अतिरिक्त एक स्थान पर छंदों की संख्या ११ लिखी है५. शतपथ ब्राह्मण में मुख्य छंदों की संख्या ८ दी है६; और तैत्तिरीय संहिता७, मैत्रायणी संहिता८, काठक संहिता९ तथा शतपथ ब्राह्मण१० में कई छंदों और उनके पादों के अक्षरों की संख्या तक गिनाई है.
c7.124
३ ऋग्वे. सं. (१०.१४.१६; १०.१३२.३.४).
c7.125
४ यजु. वाज. सं. (११.८; १४. १६; २३.३३, २८. १४ आदि ).
c7.126
७ सप्तच्छरा' प्रथमं पदं अष्टाक्षराणि त्रीणि..... षडष्टाक्षरा तेन गायत्री यदेकादशाक्षरा तेन त्रिष्टुब्यद् द्वादशाक्षरा तेन जगती त्रयपदा शक्करी (तै. सं. ६.१.१.६-७).
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८ अनुष्टुभं चतुर्थ्या द्योतयत्यष्टा अष्टा अक्षराणि बृहतीं चतुर्थ्या द्योतयत्या नव नवाक्षराणि। इत्यादि (मै. सं. १.११.१०)
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९ गायत्री चतुर्थ्या वि तस्याष्टौ षडक्षराणि उष्णिक चतुर्थ्या वि तस्यास्सप्त सप्ताक्षराणि । इत्यादि (का. सं. १४.४. )
c7.129
१० द्वादशाक्षरा वै जगती। ४। षट्त्रिंशदक्षरा बृहती... ८..... दशाक्षरा विराट्र ।११। (श. ब्रा. ८. ३. ३.) इत्यादि कई जगह.
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लिखना न जाननेवाली जातियां छंदोबद्ध गीत और भजन गाती हैं, और हमारे यहां की स्त्रियां, जिनमें केवल ६५ पीछे एक लिखना जानती है११ और जिनकी स्मरणशक्ति बहुधा पुरुषों की अपेक्षा प्रबल होती हैं, विवाह आदि सांसारिक उत्सवों के प्रसंग प्रसंग के, एवं चौमासा, होली आदि त्यौहारों के गीत और बहुतेरे भजन, जिनमें विशेष कर ईश्वरोपासना, देवी देवताओं की स्तुति या वेदांत के उपदेश हैं, गाती हैं. यदि उनका संग्रह किया जावे तो संभव है कि वेदों की संहिताओं से भी उनका प्रमाण बढ़ जावे, परंतु उनको उनके छंदों के नामों का लेश मात्र भी ज्ञान नहीं होता. छंदःशास्त्र का प्रथम रचयिता ही छंदोबद्ध साहित्यसमुद्र को मथ कर प्रत्येक छंद के अक्षर या मात्राओं की संख्या के अनुसार उनके वर्ग नियत कर उनके नाम अपनी तरफ से स्थिर करता है, तभी लोगों में उनकी प्रवृत्ति होती है. लिखना न जानने वाली जातियों में छंदों का नामज्ञान नहीं होता. वैदिक
c7.131
१ शतपथ ब्रा. ४. १. ३. १२, १५-१६.
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५ अथ. सं. (८.६.१६).
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६ विराडष्टमानि छन्दांसि (श. ब्रा. ८. ३. ३.६).
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११ हिन्दुस्तान की ई. स. १८११ की मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट, जिल्द १, भाग २, पृष्ठ ७०-७१.
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तथा लौकिक संस्कृत का छन्दःशास्त्र बड़ा ही.जटिल है, एक एक छंद के अनेक भेद हैं और उन भेदों के अनुसार उनके नाम भिन्न भिन्न हैं. ब्राह्मण और वेदों में मिलने वाले छंदों के नाम आदि उस समय में लेखनकला की उन्नत दशा के सूचक हैं.
c7.136
ऋग्वेद में ऋषि नाभानेदिष्ठ हज़ार अष्टकर्णी गौएं दान करने के कारण राजा सावर्णि की स्तुति करता है१. यहां पर 'अष्टकर्णी' शब्द का अर्थ यही है कि जिसके कान पर आठ'के अंक का चिन्ह हो२.
c7.137
वैदिक काल में जुआ खेलने का प्रचार बहुत था. एक प्रकार के खेल में चार पासे होते थे जिनके नाम कृत, त्रेता, द्वापर और कलि३ थे और जिनपर क्रमश: ४, ३, २, १ के अंक या चिह्न लिखे या खुदे होते थे४. चार के चिह्न वाला पासा या कृत जिताने वाला पासा था५. ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त६ जुआरी (कितव) के विलाप का है जिसमें वह कहता है कि एकपर७ पासे के कारण मैंने अपनी पतिव्रता स्त्री खो दी. यहां एकपर का अर्थ यही है कि जिसपर एक का चिह्न बना हुआ हो८ (अर्थात् हराने वाला पासा).
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१ 'सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्यः' (ऋग्वेद सं. १०. ६२. ७).
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२ देखो ऊपर पृ. ८, टिप्पण १.
c7.140
३ कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठं स्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन्॥ चरैवे॥ (ऐतरेय ब्रा. ७. १५). (कलि [नामक पासा] सो गया है, द्वापर स्थान छोड़ चुका है, त्रेता अभी खड़ा है, कृत चल रहा है [तेरी सफलता की संभावना है] परिश्रम करता जा). नाक्षान्क्षिपत्ति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च। ज्वलतो निशितान्बाणांस्तांस्तान् क्षिपति गाण्डिवम्॥ (महाभारत, विराटपर्व, कुंभकोणं संस्करण, ५०. ३७); (इस पर टीका—चकारात् चेतापि समुच्चीयते. कृतादयो द्यूतशास्त्रप्रसिद्धाः पाशकाः). 'कृतमयानां...त्रेतायानां...द्वापरोऽयानां...आस्कन्दोऽयानां...अभिभूरयानां' (तैत्ति.सं.४.३.३). 'अक्षराजाय कितवं कतायादि-नवदर्श चेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुं' (यजु. वाज. सं. ३०.१८). शतपथ ब्राह्मण (५.४.४.६) से जाना जाता है कि कलि का ही नाम अभिभू था (एष वा अयानभिभूर्यत्कलिरेष हि सर्वानयानभिभवति) और तैत्तिरीय ब्राह्मण ३. ४. १. १६ को यजु. वाज. सं. ३०.१८ से मिलाने से स्पष्ट है कि कलि = अभिभू = अक्षराज. ये यजुर्वेद के ग्रन्थों में दिए हुए नाम एक दूसरे पांच पासे वाले खेल के सूचक हैं जिसमें कलि पर ५ का अंक होता था और वह सब को जीतता (अभिभू) था. 'अथ ये पञ्च कलिः सः' (तैत्ति. ब्रा. १. ५. ११. १).
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४ रॉथ और बोथलिङ्क का संस्कृत कोश (वाटैंबुर्ख).
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५ कृतं यजमानो विजिनाति (आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, ५.२०.१); कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः (अथर्व. सं. ७. ५० (५२) ८); ससंतु विश्वतो भगो ऽनर्वाञ्च्छतं कृतं मम (अथ. सं. ७.५० (५२). २); चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः (ऋग्वेद सं. १. ४१. ९), यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किं च प्रजाः साधु कुर्वन्ति (छान्दोग्य उपनि., ४. १. ४. ६.) इस का शंकराचार्य का भाष्य—'कृतो नाम अयो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः स यदा जयति तते ग्रद्रस्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे चित्वे वाङ्काः अधरेयाः चेताद्वापरकलिनामानः संयन्ति संगच्छन्ते अन्तर्भवन्ति,' इस पर आनंदगिरि की टीका से जान पड़ता है कि एक ही पासे के चारों ओर ४, ३, २, १ अंक बने होते थे. वैदिक काल में एक ही पासे के चारों ओर अंक होते थे, या एक एक अंक वाला पासा अलग होता था यह गौण विषय है. वैदिक समय के पासे बिभीदक (बहेड़ा) के फल के होते थे (ऋग्वेद सं. ७. ८६. ६; १०. ३४. १). उनके चौरस न होने तथा पासों के लिये बहुवचन आदि का प्रयोग (अक्षरे अक्षाः, ऊपर देखो) यही दिखाता है कि पासे का एक पार्श्व ही अंक से चिह्निंत होता होगा.
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६ ऋग्वेद सं. १०. ३४.
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७ अक्षस्याहमकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम् (ऋग्वेद सं. १०. ३४. २).
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राजसूय यज्ञ में यजमान के हाथ में पांच पासे 'अभिभूरसि' (तू जीतने वाला है) इस मन्त्र (यजु. वाज. सं. १०. २८) से दिए जाते थे. फिर वहीं यज्ञभूमि में जुआ खिलाया जाता था. या तो वेही पांच पासे डलाये जाते थे (शतपथ ब्राह्मण, ५. ४. ४. २३) या 'कृतादि (चार पासे का) द्यूत' कराया जाता था जिसमें राजा के हाथ से कृत और सजात (उसी गोत्र के ज़मींदार) से कलि का पासा डलवाते, जिससे सजात की हार हो जाती (क्योंकि सजातों पर ही राजा की प्रधानता दिखाना उद्देश्य था) और उसकी गौ, जो जूए में लगाई थी, जीत ली जाती. (द्यूतभूमौ हिरण्यं निधायाभिजुहोति......'अक्षाशिवप-ति......मां दीव्यध्वमित्याह. कृतादि वा निदध्याद्। अप्स्रतिभ्यः सजाताय कलिम्. गामस्य घ्नन्ति. कात्यायन श्रौतसूत्र, १५. १५-२०).
'कृत' शब्द चार के अर्थ में भी इसी से आने लगा, जैसे शतपथ ब्राह्मण में 'चतुष्टोमेन कृतेनायनानां' (१३. ३. २. १); तैत्तिरीय ब्राह्मण में 'ये वै चत्वारः स्तोमाः कृतं तत्' (१.५. ११. १).
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८ एक-पर, द्वा-पर, त्रे-ता के अर्थ स्पष्ट हैं. पाणिनि के एक सूत्र अक्षशलाकासंख्याः परिणा २. १. १०) से जाना जाता है कि अक्ष-परि, शलाका-परि, और संख्यावाचक शब्दों के साथ 'परि' के समास से बने हुए (एकपरि, द्विपारि, आदि) शब्द काम में आते थे. इस सूत्र के व्याख्यान में कात्यायन और पतंजलि ने लिखा है कि जुआरियों के (सांकेतिक) व्यवहार में ये प्रयोग काम में आते थे और इनका भाव यह है कि पहले का सा जुआ नहीं हुआ (अर्थात् खेल में हार गये). अक्ष और शलाका शब्दों से 'परि' का समास एकवचन में ही होता है. इससे सिद्ध है कि द्वि-परि का अर्थ 'दो पासों से पहले का सा खेल नहीं हुआ' यह नहीं है किंतु 'दो के अङ्क से पहले का सा खेल न हुआ' (अर्थात् हार हुई) यही है. ऐसे एकपरि (या एक-पर), द्विपारि (या द्वापरि, या द्वापर) या त्रिकरि शब्द ही हारने के सूचक हैं क्योंकि चार (कृत) में तो जीत ही होती थी. काशिका ने 'पंचिका' नामक पांच पासों के खेल का उल्लेख करके लिखा है कि उसमें अधिक से अधिक (परंपरेण) चतुष्परि शब्द [इस अर्थ में] बन सकता है, क्योंकि पांच में तो जय ही होता है.
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अथर्ववेद में जुए में जीत की प्रार्थना करने का एक सूक्त१ है जिसमें लिखा है२ कि मैंने तुम से संलिखित (अर्थात् जुए के हिसाव में तेरी जीत का लिखा हुआ धन) और संरुध (जुए में धरा हुआ धन) जीत लिया. इससे पाया जाता है कि पशुओं के कानों की तरह पासों पर भी अंक रहते थे और जुए में जीते धन का हिसाव लिखा जाता था.
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यजुर्वेद संहिता (वाजसनेयि) के पुरुषमेध प्रकरण में जहां भिन्न भिन्न पेशे वाले बहुत से पुरुष गिनाये हैं वहां 'गणक' भी लिखा है३, जिसका अर्थ गणित करने वाला (गण् धातु से) अर्थात् ज्योतिषी होता है. उसी संहिता में एक, दश (१०), शत (१००), सहस्र (१०००), अयुत (१००००), नियुत (१०००००), प्रयुत (१००००००), अर्बुद (१०००००००), न्यर्बुद (१००००००००), समुद्र (१०००००००००), मध्य (१००००००००००), अन्त (१०००००००००००) और परार्ध (१००००००००००००) तक की संख्या दी है४ और ठीक यही संख्या तैत्तिरीय संहिता में भी मिलती है५.
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सामवेद के पंचविंश ब्राह्मण में यज्ञ की दक्षिणाओं का विधान हैं, जिसमें सब से छोटी दक्षिणा १२ [कृष्णल] भर सोना है और आगे की दक्षिणाएं द्विगुणित क्रम से बढ़ती हुई २४, ४८, ६६, १६२, ३८४, ७६८, १५३६, ३०७२, ६१४४, १२२८८, २४५७६, ४६१५२, ६८३०४, १६६६०८ और ३६३२१६ भर तक की बतलाई हैं६. इसमें श्रेढीगणित का बड़ा अच्छा उदाहरण है और इस प्रकार का लाखों का गणित लिखने और गणित के ज्ञान के बिना हो ही नहीं सकता.
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शतपथ ब्राह्मण के अग्निचयन प्रकरण में हिसाब लगाया है कि ऋग्वेद के अक्षरों से १२-००० बृहती (३६ अक्षर का) छंद प्रजापति ने बनाए अर्थात् ऋग्वेद के कुल अक्षर (१२-००० × ३६=) ४३२००० हुए. इसी तरह यजु के ८००० और साम के ४००० बृहती छंद बनने से उन दोनों के भी ४३२००० अक्षर हुए. इन्हीं अक्षरों से पंक्ति छंद (जिसमें आठ आठ अक्षरों के पांच पद अर्थात् ४० अक्षर होते हैं) बनाने से ऋग्वेद के (४३२०००÷४०=) १०८०० पंक्ति छंद हुए और उतने ही यजु और साम के मिल कर हुए. एक वर्ष के ३६० दिन और एक दिन के ३० मुहूर्त्त होने से वर्ष भर के मुहूर्त्त भी १०८०० होते हैं अर्थात् तीनों वेदों से उतने पंक्ति छंद दुबारा बनते हैं जितने कि वर्ष के मुहूर्त्त होते हैं७.
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२ अजैषं त्वा संलिखित मजैषमुत संरुधम् (अथर्व. सं. ७. ५० (५२). ५).
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४ यजु. वाज. सं १७. २.
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६ पंचविंश ब्रा. १८. ३.
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उसी ब्राह्मण में समयविभाग के विषय में लिखा है कि रातदिन के ३० मुहूर्त्त, एक मुहूर्त्त के १५ क्षिप्र, एक क्षिप्र के १५ एतर्हि, एक एतर्हि के १५ इदानीं और एक इदानीं के १५ प्राण होते हैं८ अर्थात् रातदिन के (३० × १५ × १५ × १५ × १५=) १५१८७५० प्राण होते हैं. इस गणना के अनुसार एक प्राण एक सेकंड के ८/१७ के लगभग आता है.
c7.155
१ अथर्व. सं., ७. ५० (५२).
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३ ग्रामण्यं गणकमभिक्रेशकं तान्महसे (यजु. वाज. सं. ३०. २०).
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५ तै. सं. ४. ४०. ११. ४; ७. २. २०.१. यही संख्या कुछ फेर फार के साथ मैत्रायणी (२.८. १४) और काठक (३९.६) संहिता में मिलती है.
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७ शतपथ ब्रा; १०.४.२.२२-२५.
c7.159
८ शतपथ ब्रा. १२. ३. २. १.
c7.160
लिखना न जानने वालों को न तो परार्ध तक की संख्या का ज्ञान होता है और न उनको 'प्रयुत,' 'अयुत' आदि बड़ी संख्याओं के सूचक शब्दों के गढ़ने या जानने की आवश्यकता होती है. ऐसी संख्या का जानना लिखना जानने के पीछे भी केवल उस दशा में होता है जब गणितविद्या अच्छी अवस्था को पहुंच जाती है. ग्रीक लोग जब लिखना नहीं जानते थे उस समय उनको अधिक से अधिक १०००० तक का ज्ञान था और रोमन् लोग ऐसी दशा में केवल १००० तक ही जानते थे. इस समय भी हमारे यहां के जो मनुष्य लिखना नहीं जानते वे बहुधा १०० तक भी अच्छी तरह नहीं गिन सकते; यदि उनसे पचासी कहा जावे तो वे कुछ न समझेंगे और यही प्रश्न करेंगे कि पचासी कितने होते हैं? जब उनको यह कहा जायगा कि 'चार बीसी और पांच' तभी उनको उक्त संख्या का ठीक ज्ञान होगा. वे २० तक की गिनती जानते हैं जिसको 'बीसी' कहते हैं; फिर एके बीसी और सात (२७), चार बीसी और पांच (८५), इस तरह गिनते हैं.
c7.161
यदि हम यह चेष्टा करें कि लिखना न जानने वाले दो पुरुषों को बिठला कर एक से कहें कि 'तुम कोई एक लंबा गीत गाओ' और दूसरे से कहें कि 'यह जो गीत गाता है उसके तुम अक्षर गिन कर बतलाओ कि वे कितने हुए और फिर छत्तीस छत्तीस अक्षरों से एक छंद बनाया जावे तो उन अक्षरों से ऐसे कितने छंद होंगे?' यदि वह गीत एक या दो पृष्ठों में लिखा जावे इतना छोटा भी हो तो भी वह न तो अक्षरों की और न छंदों की संख्या ठीक ठीक बतला सकेगा, तो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जैसे पुस्तकों के, जो १००० पृष्ठ में भी लिख कर पूरे नहीं होते और जिनके सुनने में कई दिन लग सकते हैं, अक्षरों की तथा उनसे बन सकने वाले छंदों की गिनती बिना लिखित पुस्तक की तथा गणित की सहायता के करना मनुष्य की शक्ति के बाहर है. अत एव यह मानना पड़ेगा कि जिसने तीनों वेदों के अक्षरों की संख्या और उनसे बनने वाले बृहती और पंक्ति छंदों की संख्या बतलाई है उसके पास उक्त तीनों वेदों के लिखित पुस्तक अवश्य होंगे, वह छंदःशास्त्र से परिचित होगा और कम से कम भाग तक का गणित भी जानता होगा. ऐसे ही ऊपर लिखे हुए यज्ञ की दक्षिणा तथा समयविभाग आदि के विषयों से अंक-विद्या की उन्नत दशा का होना मानना ही पड़ता है.
c7.162
लिखना न जानने की दशा में भी छंदोबद्ध मंत्र, गीत, भजन आदि बन सकते हैं और बहुत समय तक वे कंठस्थ भी रह सकते हैं परंतु उस दशा में बड़े बड़े गद्यग्रंथों का बनना और सैंकड़ों बरसों तक उनका अक्षरशः कंठ रहना किसी तरह संभव नहीं. वेदों की संहिताओं में कितना एक अंश और ब्राह्मणों का बहुत बड़ा भाग गद्य ही है और वे वेदों के टीकारूप हैं. लिखना न जानने और वेदों के लिखित पुस्तक पास न होने की दशा में ब्राह्मण ग्रंथों आदि की रचना की कल्पना भी असंभव है.
c7.163
ऊपर हम बतला चुके हैं कि ई. स. पूर्व छठी शताब्दी के आस पास पाठशालाएं विद्यमान थीं. पाणिनि और यास्क के समय अनेक विषयों के ग्रंथ विद्यमान थे. उनसे पूर्व ब्राह्मण और वेदों के समय में भी व्याकरण की चर्चा थी, छंदःशास्त्र बन चुके थे, अंकविद्या की अच्छी दशा थी, वेदों के अनुव्याख्यान भी थे, गणक (गणित करने वाले) होते थे, जानवरों के कानों और जुए के पासों पर अंक भी लिखे जाने थे, जुए में हारे या जीते हुए धन का हिसाब रहता था और समय के एक सेकंड के १७ वें हिस्से तक के सूक्ष्म विभाग बने हुए थे; ये सब लिखने के स्पष्ट उदाहरण हैं.
c7.164
प्राचीन हिंदुओं के समाज में वेद और यज्ञ ये दो वस्तु मुख्य थीं, और सब सांसारिक विषय वहीं तक सम्हाले जाते थे जहां तक वे इनके सहायक होते थे. यज्ञ में वेद के मंत्रों के शुद्ध प्रयोग की बड़ी आवश्यकता थी. इस लिये उनका शुद्ध उच्चारण गुरु के मुख से ही पढ़ा जाता था कि पाठ में स्वर और वर्ण की अशुद्धि, जो यजमान के नाश के लिये
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वज्र की तरह समर्थ मानी जाती थी१, बिलकुल न होने पावेँ. इसी लिये वैदिक लोग न केवल मंत्रों को, परंतु उनके पदपाठ को, और दो दो पद मिला कर क्रमपाठ को, और इसी तरह पदों के उलट फेर से घन, जटा आदि के पाठों को स्वरसहित कंठस्थ करते थे. गुरु मंत्र का एक एक अंश शिष्यों को सुनाता और वे उसे ज्यों का त्यों रट कर कंठस्थ करते, फिर पूरा मंत्र सुन कर उसे याद कर लेते. ऋग्वेद के समय में वेदों के पढ़ने की यही रीति२ थी और अब तक भी कुछ कुछ चली आती है, परंतु यह पठनशैली केवल वेदों के लिये ही थी, अन्यशास्त्रों के लिये नहीं. वेदों के पठन की यही रीति, जिससे स्वरों का शुद्ध ज्ञान होता था, बनी रहे और श्रोत्रिय ब्राह्मणों का आदर घट न जाय, इसी लिये लिखित पुस्तक पर से वेदों का पढ़ना निषिद्ध माना गया है३, परंतु लिखितपाठक को अधमपाठक४ कहना ही सिद्ध करता है कि पहिले भी वेद के लिखित पुस्तक होते थे और उनपर से पढ़ना सरल समझ कर लोग उधर प्रवृत्त होते थे, इसी लिये निषेध करना पड़ा कि प्राचीन रीति उच्छिन्न न हो और स्वर आदि की मर्यादा नष्ट न हो. इस लिये वेद के पुस्तक लिखने का पेशा करना और पुस्तकों को बेचना पाप माना गया है५. वेद के पुस्तक विस्मृति में सहायता के लिये अवश्य रहते थे और व्याख्यान, टीका, व्याकरण, निरुक्त, प्रातिशाख्य आदि में सुभीते के लिये उनका उपयोग होता था.
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१ दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ पतंजलि का महाभाष्य, प्रथम आह्निक).
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२ ऋग्वेद, ७ १०३ ५. 'एक मेंढक दूसरे की बोली के पीछे यों बोलता है जैसे गुरु के पीछे सीखने वाला' (यदेषामन्यो अन्यस्य वाचं शाक्तस्येव वदति शिक्षमाणः).
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३ यद्यप्यन्यार्थविज्ञाताद दालभ्योऽादिपूर्वकात् । शूद्ररणाधिगतादापि धर्मज्ञानं न संसतम् ॥ (कुमारिल का तंत्रवार्तिक, १. ३)
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४ गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः । अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ (याज्ञवल्क्य शिक्षा).
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५ वेदविक्रयिणश्चैव वेदानां चैव दूषकाः। वेदानां लेखकाश्चैव ते वै निरयगामिनः (महाभारत, अनुशासनपर्व, ६३. २८). महाभारत में जिस प्रसंग में यह श्लोक है वह दानपात्र ब्राह्मणों के विषय में है. यहां पर 'वेदानां दूषकाः' का अर्थ 'वेदों में हेरफेर आदि मिलाने वाले' ही है, क्योंकि इस श्लोक से कुछ ही ऊपर इससे मिलता हुआ 'समयानां च दूषकाः' है जिस का अर्थ 'प्रतिज्ञापत्र या इक़रारनामों में घटा बढ़ा कर जाल करने वाले' है.
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वेद के पठनपाठन में लिखित पुस्तक का अनादर एक प्राचीन रीति हो गई और उसीकी देखादेखी और शास्त्र भी जहां तक हो सके कंठस्थ किये जाने लगे, और अबतक जो विद्या मुखस्थ हो वही विद्या मानी जाती है६., कोई श्रोत्रिय पुस्तक हाथ में लेकर मंत्र नहीं पढ़ता था, होता स्तोत्र ज़बानी सुनाता और उद्गाता समय समय पर साम भी मुख से सुनाता. अबतक भी अच्छे कर्मकांडी सारी विधि और सारे मंत्र मुख से पढ़ते हैं, ज्योतिषी या वैद्य या धर्मशास्त्री फल कहने, निदान करने और व्यवस्था देने में श्लोक सुनाना ही पांडित्य का लक्षण समझते हैं, यहां तक कि वैयाकरण भी वही सराहा जाता है जो बिना पुस्तक देखे महाभाष्य पढ़ा दे. वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण की और यज्ञादि कर्मों में जहां जो प्रसंग पड़े वहां तत्क्षण उस विषय के मंत्रों को पढ़ने की आवश्यकता तथा वेदसंबंधी प्राचीन रीति का अनुकरण करने की रुचि, इन तीन कारणों से हिंदुओं की परिपाटी शताब्दियों से ऐसी हो गई कि मस्तिष्क और स्मृति ही पुस्तकालय का काम दे. इसी लिये सूत्रग्रंथों७ की संक्षेपशैली से
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६ पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले तु संप्राप्ते न सा विद्या न तद्धनम् ॥ (चाणक्यनीति).
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७ जो लोग श्रौतसूत्र, समयाचार (धर्म) सूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्वसूत्र और व्याकरण आदि शास्त्रों के सूत्रों की संक्षिप्त प्रणाली को देख कर यह अटकल लगाते हैं कि लेखनसामग्री की कमी से ये इतने संक्षिप्त और क्लिष्ट बनाये गये और पिछले वैयाकरणों ने आधी मात्रा की किफ़ायत को पुत्रोत्सव के समान हर्षदायक माना वे भूल करते हैं. यदि लेखनसामग्री की कमी से ऐसा करते तो ब्राह्मण ग्रंथ इतने विस्तार से क्यों लिखे जाते ? यह शैली केवल इसी लिये काम में लाई गई कि
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रचना हुई और इसी लिये ज्योतिष, वैद्यक आदि के ग्रंथ भी बहुधा श्लोकबद्ध लिखे जाने लगे. और तो और, कोश के सदृश ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे गये कि कंठस्थ किये जा सकें और अंकगणित तथा बीजगणित के नियम और उदाहरण भी श्लोकों में लिखे गये.
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