भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.121
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.121
- Language
- Hindi
c7.121
उपर्युक्त प्रमाणों से पाया जाता है कि उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण और तैत्तिरीय संहिता के समयतक व्याकरण के होने का पता चलता है. यदि उस समय लिखने का प्रचार न होता तो व्याकरण और उसके पारिभाषिक शब्दों की चर्चा भी न होती, क्योंकि जो जातियां लिखना नहीं जानती वे छंदोबद्ध गीत और भजन अवश्य गाती हैं, कथाएं कहती हैं परंतु उनको स्वर, व्यंजन, घोष, संधि, एकवचन, बहुवचन, लिंग आदि व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान सर्वथा नहीं होता. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हिंदुस्तान में ही भली भांति मिल सकता है, जहां ३१३४१५३८६ मनुष्यों की आबादी में से केवल १८४३६५७८ मनुष्य लिखना पढ़ना जानते हैं बाकी के २६४८७५८११ अभी तक लिखना पढ़ना नहीं जानते२. उनमें किसीको भी व्याकरण के पारिभाषिक शब्दों का कुछ भी ज्ञान नहीं है. व्याकरण की रचना लेखनकला की उन्नत दशा में ही होती है और उसके लिये भाषा का सारा साहित्य टटोलना पड़ता है और उसके प्रथम रचयिता को उसके पारिभाषिक शब्द गढ़ने पड़ते हैं. भारतवर्ष की जिन असभ्य और प्राथमिक जातियों के यहां लिखित साहित्य नहीं है उनकी भाषाओं के व्याकरण लिखना जानने वाले यूरोपियन विद्वानों ने अभी अभी बनाये हैं.