Pramāṇa · Search · About · API

भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.140

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.140

Language
Hindi

c7.140

३ कलिः शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठं स्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन्॥ चरैवे॥ (ऐतरेय ब्रा. ७. १५). (कलि [नामक पासा] सो गया है, द्वापर स्थान छोड़ चुका है, त्रेता अभी खड़ा है, कृत चल रहा है [तेरी सफलता की संभावना है] परिश्रम करता जा). नाक्षान्क्षिपत्ति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च। ज्वलतो निशितान्बाणांस्तांस्तान् क्षिपति गाण्डिवम्॥ (महाभारत, विराटपर्व, कुंभकोणं संस्करण, ५०. ३७); (इस पर टीका—चकारात् चेतापि समुच्चीयते. कृतादयो द्यूतशास्त्रप्रसिद्धाः पाशकाः). 'कृतमयानां...त्रेतायानां...द्वापरोऽयानां...आस्कन्दोऽयानां...अभिभूरयानां' (तैत्ति.सं.४.३.३). 'अक्षराजाय कितवं कतायादि-नवदर्श चेतायै कल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुं' (यजु. वाज. सं. ३०.१८). शतपथ ब्राह्मण (५.४.४.६) से जाना जाता है कि कलि का ही नाम अभिभू था (एष वा अयानभिभूर्यत्कलिरेष हि सर्वानयानभिभवति) और तैत्तिरीय ब्राह्मण ३. ४. १. १६ को यजु. वाज. सं. ३०.१८ से मिलाने से स्पष्ट है कि कलि = अभिभू = अक्षराज. ये यजुर्वेद के ग्रन्थों में दिए हुए नाम एक दूसरे पांच पासे वाले खेल के सूचक हैं जिसमें कलि पर ५ का अंक होता था और वह सब को जीतता (अभिभू) था. 'अथ ये पञ्च कलिः सः' (तैत्ति. ब्रा. १. ५. ११. १).