भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.142
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.142
- Language
- Hindi
c7.142
५ कृतं यजमानो विजिनाति (आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, ५.२०.१); कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः (अथर्व. सं. ७. ५० (५२) ८); ससंतु विश्वतो भगो ऽनर्वाञ्च्छतं कृतं मम (अथ. सं. ७.५० (५२). २); चतुरश्चिद्ददमानाद्विभीयादा निधातोः (ऋग्वेद सं. १. ४१. ९), यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किं च प्रजाः साधु कुर्वन्ति (छान्दोग्य उपनि., ४. १. ४. ६.) इस का शंकराचार्य का भाष्य—'कृतो नाम अयो द्यूतसमये प्रसिद्धश्चतुरङ्कः स यदा जयति तते ग्रद्रस्तानां तस्मै विजिताय तदर्थमितरे चित्वे वाङ्काः अधरेयाः चेताद्वापरकलिनामानः संयन्ति संगच्छन्ते अन्तर्भवन्ति,' इस पर आनंदगिरि की टीका से जान पड़ता है कि एक ही पासे के चारों ओर ४, ३, २, १ अंक बने होते थे. वैदिक काल में एक ही पासे के चारों ओर अंक होते थे, या एक एक अंक वाला पासा अलग होता था यह गौण विषय है. वैदिक समय के पासे बिभीदक (बहेड़ा) के फल के होते थे (ऋग्वेद सं. ७. ८६. ६; १०. ३४. १). उनके चौरस न होने तथा पासों के लिये बहुवचन आदि का प्रयोग (अक्षरे अक्षाः, ऊपर देखो) यही दिखाता है कि पासे का एक पार्श्व ही अंक से चिह्निंत होता होगा.