भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.165
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.165
- Language
- Hindi
c7.165
वज्र की तरह समर्थ मानी जाती थी१, बिलकुल न होने पावेँ. इसी लिये वैदिक लोग न केवल मंत्रों को, परंतु उनके पदपाठ को, और दो दो पद मिला कर क्रमपाठ को, और इसी तरह पदों के उलट फेर से घन, जटा आदि के पाठों को स्वरसहित कंठस्थ करते थे. गुरु मंत्र का एक एक अंश शिष्यों को सुनाता और वे उसे ज्यों का त्यों रट कर कंठस्थ करते, फिर पूरा मंत्र सुन कर उसे याद कर लेते. ऋग्वेद के समय में वेदों के पढ़ने की यही रीति२ थी और अब तक भी कुछ कुछ चली आती है, परंतु यह पठनशैली केवल वेदों के लिये ही थी, अन्यशास्त्रों के लिये नहीं. वेदों के पठन की यही रीति, जिससे स्वरों का शुद्ध ज्ञान होता था, बनी रहे और श्रोत्रिय ब्राह्मणों का आदर घट न जाय, इसी लिये लिखित पुस्तक पर से वेदों का पढ़ना निषिद्ध माना गया है३, परंतु लिखितपाठक को अधमपाठक४ कहना ही सिद्ध करता है कि पहिले भी वेद के लिखित पुस्तक होते थे और उनपर से पढ़ना सरल समझ कर लोग उधर प्रवृत्त होते थे, इसी लिये निषेध करना पड़ा कि प्राचीन रीति उच्छिन्न न हो और स्वर आदि की मर्यादा नष्ट न हो. इस लिये वेद के पुस्तक लिखने का पेशा करना और पुस्तकों को बेचना पाप माना गया है५. वेद के पुस्तक विस्मृति में सहायता के लिये अवश्य रहते थे और व्याख्यान, टीका, व्याकरण, निरुक्त, प्रातिशाख्य आदि में सुभीते के लिये उनका उपयोग होता था.