भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.171
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.171
- Language
- Hindi
c7.171
वेद के पठनपाठन में लिखित पुस्तक का अनादर एक प्राचीन रीति हो गई और उसीकी देखादेखी और शास्त्र भी जहां तक हो सके कंठस्थ किये जाने लगे, और अबतक जो विद्या मुखस्थ हो वही विद्या मानी जाती है६., कोई श्रोत्रिय पुस्तक हाथ में लेकर मंत्र नहीं पढ़ता था, होता स्तोत्र ज़बानी सुनाता और उद्गाता समय समय पर साम भी मुख से सुनाता. अबतक भी अच्छे कर्मकांडी सारी विधि और सारे मंत्र मुख से पढ़ते हैं, ज्योतिषी या वैद्य या धर्मशास्त्री फल कहने, निदान करने और व्यवस्था देने में श्लोक सुनाना ही पांडित्य का लक्षण समझते हैं, यहां तक कि वैयाकरण भी वही सराहा जाता है जो बिना पुस्तक देखे महाभाष्य पढ़ा दे. वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण की और यज्ञादि कर्मों में जहां जो प्रसंग पड़े वहां तत्क्षण उस विषय के मंत्रों को पढ़ने की आवश्यकता तथा वेदसंबंधी प्राचीन रीति का अनुकरण करने की रुचि, इन तीन कारणों से हिंदुओं की परिपाटी शताब्दियों से ऐसी हो गई कि मस्तिष्क और स्मृति ही पुस्तकालय का काम दे. इसी लिये सूत्रग्रंथों७ की संक्षेपशैली से